भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९७ एवं क्रियाशक्तिविस्फारनिरूपणप्रसङ्गेन सम्बन्धपुरःसरं सामान्यादीनां तत्त्वम् उपपादि- तम्, अधुना तु सम्बन्धतत्त्वमेव एकघनतया व्युत्पादनीयम् । तच्च द्विविधमेव परमार्थतो— ज्ञाप्यज्ञापकता कार्यकारणता च, तत्र पूर्वस्यां मानमेयभावादिचिन्तास्पदभूतायां सर्वम् उक्तचरं इस प्रकार क्रियाशक्ति का ही यह सारा का सारा विस्तार-स्फुरित होता है; क्रिया-शक्ति के निरूपणके प्रसंग से सामान्यादिकों के सम्बन्ध उपक्रम का पारमार्थिक तत्त्व दिखा दिया गया, अब तो सम्बन्ध तत्त्व को ही मुख्यरूप से प्रतिपादन करना है । परमार्थतः सम्बन्ध दो प्रकार के हैं । एक तो ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव है दूसरा कार्य-कारणभाव वाला है, [ ज्ञाप्य-ज्ञापक सम्बन्ध तो जड और चेतन इन दोनों में रहता है एवं कार्य-कारणरूप सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है । ] प्रमाण, हैं कि किस प्रमाण से उस महेश्वर का प्रमाणित होना सिद्ध होता है, प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वरता की सिद्धि के लिए कोई भी प्रमाण उपयुक्त नहीं दिखायी पड़ता है और न तो प्राप्त ही हो रहा है। इस आशय को लेकर कहते हैं कि— प्रमाणान्यपि वस्तूनां जीवितं यानि तन्वते । तेषामपि परो जीवः स एव परमेश्वरः ॥ उन वस्तुओं का प्रमाण ही जीवन है कि जिसका शास्त्रकार लोग विस्तार करते हैं प्रमाणों से भी बढ कर जीव होता है और वही परमेश्वर है। इस प्रकार आगम की युक्ति से आह्निक के अर्थ का आशय आक्षेप किया जाता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रमा जीवित होकर उसमें रह कर अपने बल के आक्रमण के अधीन रहती है जिसका मुख परिकर वर्ग अधिकार समर्पणार्थ, जैसे राजा के मुख की ओर देखते रहते हैं उसी प्रकार प्रमेय विषयमें भी प्रत्यक्षादि प्रमाण को देखते हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं । १. इत्थं च अत्र मुख्यया वृत्त्या प्रस्तुतेश्वरसत्तासिद्धतारूपतया प्रमाणार्थत्वासंभवेऽपि । अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः । तस्यानुषङ्गिकैश्वाशा कुशकाशावलम्बनम् ॥ इस प्रकार मुख्य वृत्ति से प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि में प्रमाण का अर्थित्व भाव न रहने पर भी मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व जिसका न होता हो तो भी उसका आनुषङ्गिकों में आशा रखना कुश के सहारे सागर पार करने के समान है । नैयायिकों द्वारा दी गई उक्ति से प्रमा का यथार्थ लक्षण करना अयुक्त ही सिद्ध होगा, फिर भी यदि कोई कैसा प्रमाण या उसका फल अनुपपत्ति या अनुप्रयोग से महेश्वरता की सिद्धि के विषय में बतलायेगा, उसके विषय में प्रमाण और उसके फल के कथन काल में ही प्रमाणादि की सम्बन्धरूपता घोषित करने के लिए क्रिया-शक्ति ऐसा अवतरण देकर कहते है— अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः । तस्यापि कथनं युक्तमानुषङ्गिकसिद्धये ॥ मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व होता हो, तो भी उसका कथन आनुषङ्गिक की सिद्धि के लिए युक्त ही है । २. ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव सम्बन्ध जड और चेतन में रहता है एवं कार्य-कारणभाव सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है ।