ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ वक्ष्यमाणं च आयत्तं—प्रमाणाधीना वस्तुसिद्धिः इति तत्र तत्र प्रसिद्धेः, एवं च प्रकृतसमर्थनीय- वस्तूपयोगितया स्वयं च सम्बन्धस्वरूपतया अवश्यविचार्य्या मानादिस्थितिं निरूपयितुम् 'इद- मेतादृक् ................' इत्यावि, '............ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥' इत्यन्तं श्लोकसप्तदशकेन आह्निकान्तरमारभ्यते । तत्र श्लोकद्वयेन प्रमाणतत्फलस्वरूपं ततः प्रमेयस्य स्वरूपं निरूपयितुं प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारो न तु स्वलक्षणात्मकवस्त्वेकनिष्ठतानियमेन—इति दर्शयितुं प्रत्यव- मर्शबलेन आभासव्यवस्था, इति दशभिः श्लोकैः उच्यते, तत्प्रसंगात् मिथ्याज्ञानस्वरूपं श्लोकेन, प्रमेयस्वरूपसिद्धिश्च प्रकृतमपि ईश्वरवादम् अवलम्ब्य घटते—इति श्लोकेन उपदर्श्यते, स च एष सर्वः प्रमाणतत्फलप्रमेयादिप्रविभागः सति प्रमातरि प्रदर्शितरूपे ततो न तस्य प्रमेयंता येन अत्रापि प्रमाणव्यापारसम्भवः केवलं व्यवहारमात्रसिद्धिफलं प्रमाणम् अत्र, इति श्लोकत्रयेण—इति तात्पर्यार्थः । यदुक्तम् 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' इति, तदेव निर्णेतुं प्रमाण- तत्फलस्वरूपं तावत् प्रसिद्धमनुवदति— प्रमेयभाव आदि का विचार-विमर्श करते समय पूर्व में ही सब कुछ दिखा दिया है एवं आगे भी इस पर विचार प्रकट किया जायेगा । तथा प्रमाण के अधीन ही वस्तु की सिद्धि होती है, यह तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है । प्रकृत विषय में समर्थन करने कारण तथा उस समर्थनीय वस्तु के उपयोगी होने से, प्रत्यक्षादि प्रमाणों की स्थिति अवश्य विचारणीय है। इसका निरूपण करने के लिए कहते हैं-'इदमेतादृक्...।' इत्यादि से लेकर'...'ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ।।' यहाँ तक, सत्रह श्लोकों से दूसरा आह्निक प्रारम्भ किया जाता है। दो श्लोकों से प्रमाण और उसके प्रमाणरूप फल का स्वरूप, इसके बाद प्रमेय के स्वरूप का निरूपण करने के लिए प्रत्याभास प्रमाण का व्यापार नहीं होता, किन्तु स्वरूपात्मक वस्तु पदार्थ की विश्रान्ति होने से ही है, प्रत्यवमर्श [विमर्श] के बल से आभास व्यवस्था होती है—ऐसा दश श्लोकों से दिखाया जायेगा—उसके प्रसंग को लेकर मिथ्या-ज्ञान के स्वरूप को एक श्लोक से से बतायेंगे और प्रमेय के स्वरूप की सिद्धि प्रकृत एक ईश्वरवाद का अवलम्बन करके ही घटित होती है, यह एक श्लोक से दिखाया जायेगा और वही यह सब प्रदर्शित प्रमाता के रहने पर ही प्रमाण, प्रमा और प्रमेयादि है, इसलिए प्रमाता की प्रमेयता नहीं होती है जिससे कि भगवान् में भी प्रमाण का व्यापार सम्भव हो सके; भगवान् में तो केवल व्यवहार की सिद्धिके लिए प्रमाण होता है तीन श्लोकों से तात्पर्यार्थ दिखायेंगे । 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' अर्थात् क्रिया सम्बन्ध आदि की बुद्धियाँ भ्रान्ति स्वभाववाली नहीं होती हैं उसे दिखाने के वास्ते प्रमाण और उसका जो प्रमाणरूप फल है उसे कहते हैं [ प्रसिद्ध वस्तु को फिर से संस्काररूप से कहने का नाम अनुवाद कहलाता है । ] १. जाति, व्यक्ति, लिङ्ग, संख्यादि में उपयोगी होने के कारण परम्परा से ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में भी इसका उपयोग सिद्ध होता है, आनुषङ्गिक जाति आदि पदार्थ के व्यवस्थापन करने में और ईश्वर के व्यवहार साधन में भी इसका उपयोग होता है—इसलिए इसमें लक्षण के निर्माण की उपेक्षा नहीं की जाती है ।