ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०१ स्वभावा इति चेत्, आह—स एव बोधरूप आभासो मितिः प्रमाणफलम् इति सम्बन्धः । ननु एवं पर्यायत्वं स्यात् भवेत् न तु फलस्वरूपम्, आह—बाह्योन्मुखतया प्रकाशरूपतया तत्र तत् प्रमाणं, या तु तस्यैव अन्तर्मुखात्मा विमर्शरूपता प्राक् उपपादिता तत्स्वभावेन केवलं विषयदशासंकुचितेन स एव बोधः फलं, यथा हि 'यः शूरोऽहं स एव विजयी' इति एकनिष्ठे शूर- त्वविजयत्वे विवेकवता हेतुफलभावेन व्यवस्थाप्येते, यतो हि 'अहं शूरः ततो विजयी' इत्येवं, यतो नीलप्रकाशः ततो 'नीलमिदम्' इति परामर्श इति एकरूपत्वेऽपि हेतुफलभावः, यथोक्तं 'तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्........'४ इति । किं च इह व्यापाररूपमेव फलं, व्यापारश्च व्याप्रीयमाणात् व्यापार्यमाणात् वा अनन्याकार एव सिद्धः, इति—अभेदः प्रमाणफलयोः, विमर्शबलेन च यतः प्रमेयों के उन्मुख होते रहने के कारण नये-नये वे प्रमाण हैं, जिस से कि प्रमा होती है। वह कैसी प्रमा है ? यदि फल स्वभाववाली प्रमा मानी जाय, तो इस पर कहते हैं कि वही बोधरूप आभास ही प्रमा है—जो कि प्रमाण का फल मानी जाती है। अब इस प्रकार प्रश्न करते हैं कि प्रमा और फलस्वभाव इन दोनों को पर्यायत्व ( अनर्थान्तरत्व ) माना जाये, वह फलस्वरूप नहीं बन सकता; क्योंकि दूसरा अनर्थ हो जायेगा, इसका उत्तर देते हैं—बाह्यरूप से उन्मुख होने के कारण प्रकाशरूप होने से वह वहाँ पर उस आभास में प्रमाण माना जाता है; जिसे हम कह चुके हैं, वही अन्तर्मुख होकर विमर्शरूप होने से वही बोध प्रमा और फल कहा जाता है, जैसे 'जो मैं शूरवीर था—वही मैं विजयी हूँ, इस प्रकार एक में ही शूरत्व और विजयत्व को विवेकी पुरुष हेतु एवं फल इन दोनों में रखते हैं; क्योंकि मैं शूरवीर था तभी मैं विजयी हुआ, जब कि नील प्रकाश यह है इसीसे 'नीलमिदम्' यह नील है ऐसा प्रकाशित होना है तब तो फिर नील ही है, एक ही आधार में हेतु और फल ( प्रमाण एवं प्रमा ) ये दोनों रह गये, जैसे कहा जाता है कि [ तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्...... ] प्रकाश विमर्श के द्वारा ही ..... इस प्रकार यहाँ पर व्यापाररूप ही फल है और व्यापार कर्ता तथा करण से भिन्न नहीं सिद्ध होता, वह अभेद प्रमाण और फल का ही मानना चाहिए, विमर्श १. माया प्रमाता का अनन्तकाल पर्यन्त अन्तर्मुख संवेदन-ज्ञानरूप से आभास है वह प्रमेय की ओर उन्मुख स्वभाववाला रहता है इसी से देश, काल और आकार में आभासों का भेद हो जाने के कारण भिन्न-भिन्न रूपों में नया-नया सा अभ्युदय होता है, वही अन्तर्मुख स्वभाव कहलाता है इसलिए प्रमेय की उन्मुखता से रहित होने के कारण देश, काल एवं आकार के भेद का अभाव से बोधरूप नया अभ्युदय नहीं होता है ? २. समान अर्थक है । ३. जैसे दुग्ध और जल आपस में मिल जाने पर किस भाग में दुग्ध है और किस अंश में जल है । वैसे ही सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर भी हेतु और फल में भेद का ज्ञान नहीं हो पाता है । ४. वाचक से अवच्छिन्न वाच्य का प्रतिभास ऐसी बुद्धियों में होता है, वही यह शब्दविशिष्ट अर्थ के प्रतिभास से शब्द जीव कहलाता है, शब्द के अनुसंधान से रहित कुछ भी ज्ञान नहीं देखा जाता—अनुल्लिखित शब्दवाले ज्ञानों में भी सामान्यतः शब्द का कुछ न कुछ उल्लेख रहता ही हैं; क्योंकि उल्लेख के बिना प्रकाशात्मक प्रवृत्ति का उदय नहीं होता । इस विषय में भर्तृहरि ने कहा है कि न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गृह्यते ॥ २६