ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ प्रमाणं विमर्शश्च शब्दजीवितः शब्दैश्च आभासान्तरैः देशकालादिरूपैरनामृष्टे एकत्रैव आभासमात्रे प्रवर्तते—घट इति लोहित इति, ततो देशकालाभासयोः स्वलक्षणत्वार्पणप्रवणयोः अनामिश्रणात् सामान्यीयमाने आभासे प्रमाणं प्रवर्तते, 'अयम्' इत्यपि हि अवभास आभासान्तरानामित्रे पुरोव- स्थितावभासमात्रे, इति उक्तं श्रीमदाचार्यपादैरेव—'नियतेऽप्ययमित्येव परामर्शः पुरःस्थिते । सर्वभावगतेदन्तासामान्येनैव जायते ।।' इति, तत एव आभासमात्रं वस्तु, स्वलक्षणं तु तदाभास- के बल से प्रमाण और विमर्श शब्द प्रमाणित होता है और शब्द भी भिन्न-भिन्न आभासों से देश- कालादि के द्वारा अनवभासित होकर एक आभास में ही केवल स्थिर रहता है—जैसे घट में लालिमा का आभास, इसलिए अपने स्वरूप को देनेवाले देश-काल के आभास का मिश्रण न होने से सामान्य आभास ही प्रमाण माना जाता है। 'अयम्' यह आभास दूसरे आभास से न मिला हुआ विद्यमान हो आभास है, जिसको कि आचार्यपाद ने कहा है— निश्चित सामने स्थित पदार्थ में जो परामर्श है वह सब भावों में रहनेवाले सामान्य इदन्ता भास से उत्पन्न होता है। सामान्यरूप से प्रमाण की स्थिति होने से ही आभासमात्र वस्तु का धर्म होता है, स्वलक्षण सभी लौकिक ज्ञान शब्द के बिना बोध के विषय नहीं हो सकते हैं। सब ज्ञान शब्द से अनुगत होकर ही गृहीत होते हैं। अतः विमर्श ही फल है उसके सामर्थ्य से ज्ञान का उपाय प्रमाण माना जाता है। १. जैसे पुरुष है अथवा घट है इस निरतिशय ज्ञान उत्पादन में मात्र उतनी ही विषय की प्रत्यक्षता रहती है, उसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं होता है, ज्ञान का ग्रहण न होने पर भी ज्ञान में तो केवल विषय ही प्रति- भासित होता है, वैसे ही दिशा, काल इत्यादि विशिष्ट अतिशय ज्ञान के उत्पादन में भी जानना चाहिए। पूर्वापरचिरक्षिप्रक्रमाद्यवगमेष्वपि । दिक्कालादि विशिष्टोऽर्थः स्फुरत्यतिशयात्मकः ॥ प्रत्यक्षं किं स कालादिः प्रतीतिं पृच्छ किं मया । गृह्यते तद्विशिष्टोऽर्थः स च नोत्यद्भुतं महत् ॥ एतेन समवायेऽपि प्रत्यक्षत्वं प्रकाशितम् । इहेति तन्तुसंबद्धपटप्रत्ययदर्शनात् ॥ पूर्वोत्तर, शीघ्र एवं चिरकाल इत्यादि क्रम का ज्ञान होने पर भी अतिशयात्मक दिशा-कालादि से युक्त अर्थ स्फुरित होता है। क्या वह कालादि प्रत्यक्ष होते हैं; क्या हम लोग ग्रहण करते हैं? नहीं ग्रहण होते हैं ? यही बड़ी विचित्रता है। इससे समवाय में भी प्रत्यक्षत्व प्रकाशित हो जाता है; क्योंकि 'तन्तुषु पटः' इसमें तन्तु से सम्बन्ध रखनेवाले पर का ज्ञान देखा जाता है। २. केवल विशेष संनिवेश रूप ही घट शब्द का वाच्य होता है, 'एष' ऐसा कहने पर तो देश का आभास होने लगता है, 'इदानीं' इससे काल का अवभास दिखाई देने लगता है, 'मृन्मय' इस कथन में विशिष्ट स्वभाव झलकता है, इस प्रकार भिन्न-भिन्न वाचकों से उपलक्षित होता हुआ उस-उसमें भिन्न-भिन्न अभि- संधान से युक्त होकर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार वालों की परस्पर निरपेक्ष भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ होती हैं। ३. आभास मात्र वस्तु है—ऐसा सिद्धान्ती का कहना है, अब स्वलक्षण किसको कहोगे ? इसका समाधान करते हैं—आभास सामानाधिकरण्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं। जैसे जाति, गुण, क्रिया, नाम और द्रव्य भेद से और वे कल्पनाएँ कहीं अभेद रहने पर भी भेद से युक्त नहीं होती हैं और कहीं अभेद