ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३ सामानाधिकरण्याभासरूपम् आभासान्तरम् एकम् अन्यदेव, तत्रे च पृथगेव च प्रमाणं, तत्परं तो उन आभासों का सामानाधिकरण्यरूप आभास हो होता है । दूसरा आभास तो दूसरा ही कहा जायेगा और वहाँ पर प्रमाण भी भिन्न ही माना जायेगा, मिले हुए आभासों में गृहीत को ग्रहण में भी भेद से कल्पना कही जाती है, इनमें सामानाधिकरण्य दिखाते हैं, जैसे- जाति जातिमतोर्भेदो न कश्चित्परमार्थतः । भेदारोपणरूपा च जायते भेदकल्पना ॥ वस्तुतः जाति और जातिवान् में कोई भेद नहीं होता है, इन दोनों में जो भेद की प्रतीति हो रही है, वह तो कल्पना मात्र ही है अविद्यमान भेद का आरोप किया गया है। गौ और गोत्व में कोई भेद नहीं हैं, इसलिए अभेद कल्पना होती है- एतया सदृशन्याया मन्तव्या गुणकल्पना । तत्राप्यभिन्नयोर्भेदः कल्प्यते गुणतद्वतोः ॥ इस प्रकार गुण और गुणी में भी कोई भेद नहीं है, गुण और गुणी के विषय में भी भेद की कल्पना मात्र रहती है, परमार्थतः गुण और गुणी अभिन्न ही है। भेदारोपणरूपैव गुणकर्मवत्कल्पना । तत्स्वरूपातिरिक्ता हि न क्रिया नाम काचन ॥ यही बात क्रिया और क्रियावान् के विषय में भी घटती है। जैसे गुण और गुणी में अविद्यमान् भेद का आरोप मात्र है, वैसे क्रिया और क्रियावान् के स्वरूप से अतिरिक्त क्रिया नाम की कोई वस्तु ही नहीं है। इन अभिन्न वस्तुओं में भेद का भ्रम मात्र होता है। जैसे कहीं-कहीं पर भिन्न-भिन्न वस्तुओं में अभेद का भ्रम होता है। कहाँ पर ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि नाम और नामी [ संज्ञा एवं संज्ञी ] में, ये दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते हैं, तथापि इनकी एकत्वरूप से प्रतीति देखने में आती है। कहाँ ? देखिए- एवं दण्ड्यमित्यादिर्मन्तव्या द्रव्यकल्पना । सामानाधिकरण्येन भेदितोग्रहणात्तयोः ॥ दण्डी अयम्, देवदत्त अयम्, अर्थात् यह दण्डी है एवं यह देवदत्त है इत्यादि स्थलों में नाम एवं नामी का अभेद दिखायी देता है तभी तो दोनों का सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख पड़ रहा है। देवदत्त तो नाम शब्द मात्र है 'अयम्' यह नामी-पिण्ड है, फिर दोनों में अभेद कैसे ? तथापि दिखायी दे रहा है। १. उसमें भी प्रमाण भिन्न ही रहता है-ऐसा कहना युक्ति युक्त नहीं बैठता है-इन दोनों के व्यवहार की प्रतीति कौन छिपा सकता है ? इस विषय में कहते हैं- जातिर्जातिमतो भिन्ना गुणी गुणगणात्पृथक् । तथैव तत्प्रतीतेश्चाभासत्वं बाधवर्जितम् ॥ जाति जातिमान् से भिन्न होती है, एवं गुणी गुण समूह से भिन्न होता है; क्योंकि भिन्न रूप से प्रतीति देखी जाती है इसलिए यह प्रतीति मात्र भ्रममूलक है, भ्रम का तो कभी न कभी बाध हो जाता है, किन्तु इसका बाधक भी नहीं होता। द्रव्य और नाम की भिन्नता ही दिखायी देती है; यह देवदत्त है इसलिए देवदत्त का अर्थ नहीं