ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ मिश्रकारेषु तेषु आभासेषु गृहीतग्राहि न प्रमाणम्, इति अग्रे भविष्यति, अध्यवसायस्य अस्मदुक्त- नयेन शब्दप्राणितस्य प्रत्याभासविश्रान्तौ तदपेक्षमपि प्रामाण्यं वदता प्रत्याभासनिष्ठमेव प्रामाण्यमु- पेत्यम्, इत्यास्ताम्—किमवान्तरेण । ननु यदि विमर्शः प्रमाणव्यापारः स र्तार्ह द्विचन्द्रेऽपि अस्ति ? मैवम्—स हि संस्कार- योगात् आत्मानमभिमतप्रसिद्धार्थक्रियाप्राप्तिपर्यन्तमनुवर्तयन् अनुन्मूलितवृत्तिः स्थिरः सन् तथा भवति, मध्ये पुनरुन्मूलनं चेत् सहते न र्तार्ह असौ तथा विमर्शः, नायं विमर्शः पूर्वमपि—एकेन अन्तर्मुखेन वपुषा पूर्वमेव तस्य निर्मूलनात्, स्वसंवित् अत्र च साक्षिणी, तदैव 'न इदं रजतम्' इति वृत्तपूर्वस्यैव विमर्शस्य अविमर्शीकरणं संवेद्यते । उक्तं च एतत् बाधविचारे, वक्ष्यते च 'रजतैकविमर्श'.............' इत्यत्र, एवं स्थिते द्विचन्द्रेऽपि यावत् परकूतूहलसंपादनसमर्थक्रियासंमतम् करनेवाला आभास प्रमाण नहीं माना जाता, ऐसा आगे कहेंगे । निश्चित प्रमाण को हमारी कही हुई नीति के द्वारा शब्द से प्राणित प्रत्याभास को विश्रान्ति होने पर उसकी अपेक्षा करके प्रामाण्य करना प्रत्याभास में ही प्रमाणता मानना है, इसीलिए अन्य आभास की आवश्यकता नहीं देखी जाती । अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि यदि विमर्श को ही प्रमाण का व्यापार मानते हो, तो जहाँ पर दो चन्द्र का भान होता है वहाँ पर भी विमर्श को प्रमाण का व्यापार मानना होगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि ऐसा मानना कोई युक्ति युक्त नहीं दिखता; क्योंकि वह संस्कार के सम्बन्ध से अपने को प्रसिद्ध अर्थ की क्रिया प्राप्ति तक स्थिर रखता हुआ उसी में स्थिर रह कर वैसा रहता है, बीच-बीच में उन्मूलित होता जाता है तब वह वैसा विमर्श नहीं होता, यह विमर्श पूर्व में भी नहीं था; क्योंकि इस रूप में वह पहले ही उन्मूलित हो चुका था और इस में अपना ज्ञान ही साक्षी है, इसी को 'न इदं रजतम्' ऐसा जो पूर्व में रजत का भान हुआ था उसी को अविमर्शीकरण कहा जाता है । इस प्रकार आचार्य ने बाध विचार में यह बात कही है और कहेंगे भी—रजतैकविमर्श'.......। इस प्रकार दो चन्द्र के विमर्श में भी दूसरे के कुतूहलार्थ अपूर्व है, अर्थज्ञान में शब्द अर्थ से युक्त नहीं भासित होता है, शब्द का विवर्तरूप से अर्थ नहीं स्फुरित होता है । तथा यह दण्डी है इत्यादि में अभेद की कल्पना मूर्खों ने ही की है, दण्ड शब्द से देवदत्त का बोध नहीं होता है अपितु दण्डी कहने पर ही होता है और उसमें तो प्रकृति एवं प्रत्यय अलग से ही दिखायी पड़ते हैं कि दण्ड इसके पास में रहता है । जैसी वस्तु रहती है वैसा ही आरोप होता है, वैसे क्रिया को भी समझना चाहिए । क्रियाहि तद्वतो भिन्ना भेदेनैव प्रगृह्यते । चलतीत्यादि बोधेषु तत्स्वरूपावभासनात् ॥ क्रियावान् से क्रिया भिन्न होकर भेदपूर्वक ही ग्रहण होती है । चलता है, खाता है इत्यादि, क्रियाओं के ज्ञानों में क्रिया के स्वरूप का मात्र आभास देखा जाता है । १. निर्विकल्प में तो आभास का भेद भले रहे, किन्तु सविकल्प में कैसे रहेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि 'अध्यवसायस्य'—'निर्विकल्पानुसारेण सविकल्पक संभवात् । ग्राह्यं तदानुगुण्येन सविकल्पस्य मन्महे । निर्वकल्पके अनुसार ही सविकल्प की उत्पत्ति होती है इसलिए जो निर्विकल्प का विषय है वही सविकल्प का भी विषय होना चाहिए ।