ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०५ अपूर्ववस्तुदर्शनाय चिकीर्षति तावत् अवज्ञोपहासशोकादिविवशः परजनवचनाकर्णनेन समुन्मूल्य- मानं प्राच्यं 'द्विचन्द्रोऽयम्' इति परामर्शं स्वसंवेदनादेव अभिमन्यते । ननु एवं यत्र अर्थक्रियां न अन्विच्छति तत्र कथं बाधाबाधव्यवहारः ? मा भूत—किं नः त्रुटितम्, प्रवृत्तिर्हि न सर्वत्र प्रमाणत एव, किं तर्हि क्वचन संशयत एव अर्थपक्षाधिक्यात् अर्थित्वतारतम्यादपि वा—कृष्यादौ सविषान्न- भोजने निश्चितसम्भावितदृष्टप्रत्यवाये च चौर्यादौ प्रवृत्तिदर्शनात्, तत् अर्थित्वातिशयः प्रवृत्तौ तावत् निबन्धनम्, लोकश्च प्रवृत्तः क्वचन अनुन्मूलितप्रमितिकः प्रयाणतां प्रतिपद्यते, क्वचित् तन्व्यथाभवन् विपर्ययमिति, एवम् आ जन्म यतोऽनेन अभ्यस्त आ पूर्वजन्मशतेभ्योऽपि वा प्रमाणा- प्रमाणविभागः ततो मणिरूप्यादिवत् तत्स्वरूपम् आपातमात्र एव विलक्षणम् ईक्षते, अस्ति हि तस्य परमार्थतो वैलक्षण्यं कारणभेदादिकृतं, ततश्च यदार्तं परिमितां सह्याम् अभिमन्यते तत एव अर्थितामहाग्रहेण यत्र तत्र न प्रेर्यते तदा विसंवादभीरुः निश्चितप्रामाण्यात् बोधात् अदृष्टे दृष्टेऽपि वा प्रवर्तमानो न विसंवाद्यते, इति स--प्रेक्षापूर्वकारी भण्यते, तेन लौकिकं प्रमाणस्वरूपम् अनूदितं वस्तु का दर्शन कराने की इच्छा से तिरस्कारपूर्वक उपहास करने में विवश होकर दूसरे की बात सुन करके पूर्व के 'द्विचन्द्रोऽयम्' इस परामर्श को अपने परामर्श का अभिमान करता है । १ ऐसा होने पर प्रश्न करते हैं कि जहाँ पर अर्थक्रिया की इच्छा नहीं है वहाँ पर बाध का व्यवहार कैसे सम्भव हो सकेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि न हो, इस में हमारी कोई भी हानि नहीं होगी; क्योंकि प्रमाण के द्वारा प्रवृत्ति सब जगह नहीं होती, किन्तु संशय से भी प्रवृत्ति देखी जाती है, अर्थपक्ष के अधिक होने से या अर्थित्व के तारतम्य से भी जैसे कि कृषि आदि के विषयुक्त भोजन में और संभावित प्रत्यक्ष प्रत्यवाय करनेवाले चौर्यादि कर्म में अर्थिता को अधिकता के कारण ही प्रवृत्ति देखी जाती है, इस प्रकार प्रवृत्त हुई जनता कहाँ प्रमा का न छोड़कर प्रमाणता को प्राप्त करती है, कहीं उससे भिन्न होकर अप्रमाणता को प्राप्त हो जाती है, इस प्रकार जन्मभर जिसका अभ्यास किया है, सहस्र जन्म- जन्मान्तर से प्रमाणता और अप्रमाणता के विभाग को ऊपर से हो मणि आदि की तरह विलक्षणता को रखती है, ठीक-ठीक विलक्षणता तो कारण भेद इत्यादि से ही होती है और कष्ट को सह्य मानती है तभी अर्थितारूपो महाग्रह से जहाँ-तहाँ प्रेरित नहीं होती है; तब न घटने के कारण डरता हुआ निश्चित प्रमाण के ज्ञान से चाहे दृष्ट अथवा अदृष्ट वस्तुओं में प्रवृत्त होकर प्रमाणता का नहीं प्राप्त होता है, इसीको प्रेक्षापूर्वक कार्य करनेवाला कहा जाता है, इसी से लौकिक प्रमाणरूप १. इसका फलित अर्थ यह है कि सर्वत्र अन्वेषण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए । जहाँ पर विभाग की व्युत्पत्ति रहेगी वहाँ पर ही प्रमाण में निर्णय का अवकाश रहेगा और वह विभाग व्युत्पत्ति यत्न- पूर्वक छोड़ने में और यत्नपूर्वक ग्रहण करने में अवश्य उपयुक्त होता है । देखिये — गाँव गया हुआ व्यक्ति गाँव से पुनः अपने गृह लौट आता है तो न वह दग्ध ही होता रहता है और न तो लौटाता हुआ ही रहता है एवं न तो उसके धन और दारा आदि को ही कोई व्यक्ति अपहृत किये हुए रहते हैं, इस प्रकार प्रमाण के बिना कैसे निश्चय होगा ? अर्थपक्ष की अधिकता होने के कारण संशय में भी प्रवृत्ति देखी जाती है, जैसा कि क्षुधा से आक्रान्त व्यक्ति की प्रवृत्ति भी विपरीत ज्ञानपूर्वक ही विष संपृक्त अन्नग्रहण करने में अर्थिता की तारतम्यता के कारण ही होती है ।