ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ सामान्यसम्बन्धादिज्ञानेऽपि मोहात् अप्रामाण्याशंकां शमयितुम्, अत एव विभागविशेषलक्षणपरी- क्षादिभिरिह न आयासितो लोकः, यत् यत् अबाधितस्थैर्यम् अत एव अप्रतिहतानुवृत्तिकं विमर्श- फलं विधत्ते, तत्तद्बोधरूपं बोध्यनिष्ठं प्रमातृस्वरूपविश्रान्तं प्रमाणम् इति, तच्च ऐन्द्रियिके बोधे सुखादिसंवेदने योगिज्ञाने च अविवादमेव—मुख्यतयैव प्रमेयरूपे आभासे साक्षात् विश्रान्तेः, अनु- अनुवाद को सामान्य सम्बन्धादि के ज्ञान होने पर भी मोहवश अप्रामाण्य की आशंका को दबा देने के लिए विभाग, विशेष, लक्षण, परीक्षा इत्यादि कारणों से लोग प्रयत्न युक्त नहीं होते, जो-जो अबाधित स्थिरता के अप्रतिहत अनुवर्तन को विमर्शफल मानता है, उस-उस बोधरूप की ही बोध्यवस्तु का प्रमाता में होनेवाला प्रमाण माना जाता है और वह इन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञान में तथा सुखादि के संवेदनरूप योगिज्ञान में निर्विवाद मुख्य प्रमेयरूप से भासित होता है और उसी में ही साक्षात् विश्रान्त हो जाता है, अनुमान प्रमाण से होनेवाली प्रमा कार्यरूप दूसरे स्वाभाविक आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है— १. प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश्च तत्कृतः । प्रमाणलक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ प्रमाण प्रसिद्ध ही होते हैं और उन्हीं के द्वारा व्यवहार होता हुआ सर्वत्र देखा भी जाता है । प्रमाण के लक्षण कहने पर प्रयोजन का ज्ञान नहीं होता । दूसरों को आक्षेप की आशंका कर प्रामाण्य- व्यवहार मात्रेण शास्त्रं मोहनिर्वतनम्—ऐसा कहा है । २. योगी को दूर-समीप का प्रत्यक्षरूप से बोध हो जाता है । इस विषय में भट्टजयन्त ने विवेचन किया है । यथानुवाकग्रहणे संस्थाभ्यासेन कल्पितः । स्थिरः करोति संस्कारः पाठस्मृत्यादिपाटवम् ॥ यथा वा पुटपाकेन शोध्यमानं शनैः शनैः । हेमनिष्प्रतिकाशं तद्याति कल्याणतां पराम् ॥ तथैव भावनाभ्यासाद्योगिनामपि मानसम् । ज्ञानं सकलविज्ञेयसाक्षात्कारक्षमं भवेत् ॥ अस्मदादेश्च रागादिमलाव रणदूषितम् । मनो न लभते ज्ञानप्रकर्षपदवीं पराम् ॥ प्रत्यहं भावनाभ्यासक्षपिताशेषकल्मषम् । योगिनां तु मनः शुद्धं किमिवार्थं न पश्यति ॥ तदेवं क्षीणदोषाणां ध्यानावहितचेतसाम् । निर्मलं सर्वविषयं ज्ञानं भवति योगिनाम् ॥ जैसे वेद शाखाओं के शब्दों को ग्रहण करने पर भली-भांति किये हुए अभ्यास के बल से पाठ-स्मरणादि में दक्षता, स्थिर संस्कार करा देता है। अथवा पुट देकर धीरे धीरे शोधा हुआ स्वर्ण अद्वितीय रूप को प्राप्त कर लेता है। वैसे ही भावनादि-ध्यान, धारणा, समाधि के द्वारा योगियों के मानस को भी संपूर्ण ज्ञेय पदार्थ का साक्षात्कार करने का ज्ञान हो जाता है। हम लोगों के चित्त में रागादि मल का आवरण होने के कारण ज्ञान की उत्कर्ष स्थिति प्राप्त नहीं होती है। सब को अपने स्वरूप में देखने के कारण संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है इसलिए योगियों का मन शुद्ध होकर क्या नहीं देख लेता है ? सब दोषों से मुक्त योगियों का ध्यान में लगा हुआ मन होने से निर्मल होकर सब विषयों को देख लेता है । ३. पुरोवर्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष व्यापार का साधन है एवं परोक्ष में अनुमान से होनेवाला ज्ञान होता है और वह अनुमान लिङ्ग अर्थात् धूम ज्ञान से होता है, वह पांच प्रकार का है । पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः । परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥