भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-३, का-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०७ मानजा तु प्रतीतिः आभासान्तरात् कार्यरूपात् स्वभावभूतात् वा आभासान्तरे प्रतिपत्तिः, वस्त्वन्तरस्य च तेन साकं कार्यकारणभावनियमः सामानाधिकरण्यनियमश्च ईश्वरेरनियतिशक्त्युप- आभास से दूसरे आभास का ज्ञान होता है, दूसरी वस्तुओं का भी, उसी के साथ कार्य-कारण नियम को तथा सामानाधिकरण्य नियम को ईश्वर की नियति-शक्ति से उपजीवित ही मानता है; कार्य, कारण, संयोगी, विरोधी और समवायी रूप से पाँच प्रकार के हेतु कहे जाते हैं ऐसे हेतुओं को देख कर और इनसे व्याप्ति का स्मरण कर न देखी गयी वस्तु के विषय में जो निश्चयात्मक कल्पना होती है उसको विद्वान् लोग अनुमान शब्द से कहते हैं। इस श्लोक में जो 'पञ्चलक्षणात्' यह पद दिया है उस हेतु का भी कारण इत्यादि पाँच प्रकार के होते हैं, इसका यह तो अर्थ ही है। इससे अतिरिक्त एक-दूसरा भी अर्थ निकलता है। वही सच्चा हेतु है जिस पर पाँच हेतु देते हैं, वे इस प्रकार हैं कि—पक्षसत्त्व, -सपक्षसत्त्व, विपक्षसत्त्व, असत्प्रतिपक्षत्व, अबाधितत्व । पक्ष में रहना पक्षसत्त्व है, विपक्ष में रहना विपक्षसत्त्व है, किसी भी शत्रु से शून्य होकर रहना असत्प्रतिपक्ष माना जाता है, अपने अभाव का पक्ष में ज्ञान न होना अबाधितत्त्व कहलाता है। सिषाधयिषा विशिष्ट सिद्धि जहाँ पर नहीं होती वह पक्ष है, साध्य का निश्चय जिसमें हो वह सपक्ष, साध्य के अभाव का निश्चय जिसमें हो वह विपक्ष कहा जाता है। इन सभी रूपों की आवश्यकता केवल अन्वय व्यतिरेकी की हेतु में पड़ती है, केवलान्वयी और केवल व्यतिरेकी हेतु केवल चार-चार की [ क्रमशः विपक्षसत्त्व और सपक्षसत्त्व को छोड़कर ] आवश्यकता होती है। १. परमार्थतः पदार्थों का कार्य-कारणभाव स्वाभाविक नहीं है। यदि कोई अग्नि होती तो धूम होता अथवा अग्नि और धूम का जो पौर्वापर्यलक्षण अपना स्वभाव यावत्काल दोनों का बना रहना संवित् प्रकाश को छोड़कर नहीं होता है; क्योंकि संवित् ही वैसी-वैसी प्रकाशित होती है, स्वप्न और संकल्प के समान योगी का निर्माण रहता है, केवल संवित् ज्ञान के फैलाव की समाप्ति में ही जहाँ तहाँ नियति- शक्ति के द्वारा पूर्वापर भाव का नियम नहीं अवभासित रहता है। जैसे अग्नि से धूमादि का होता है, इस प्रकार कहते हैं— सूर्यास्तमयालोक्य कल्प्यते तारकोदयः । पूर्णचन्द्रोदयवृद्धिर्ह्रम्बुधेरवगम्यते ॥ उदितेनानुमीयन्ते सरितः कुम्भयोनिना । शुष्यत्पुलिनपर्यन्तविश्रान्तखगपङ्क्तयः ॥ पिपीलिकाण्डसंचारचेष्टानुमितवृष्टयः । भवन्ति पथिकाः पर्णकुटीकरणोदिताः ॥ अन्येषामपि हेतूनां भूम्नां जगति दर्शनम् । उपलक्षणत्रेतावद्धिहास्माभिः प्रदर्शितम् ॥ सूर्य अस्ताचल की ओर चले गये इस बात को जान कर नक्षत्रों का उदय गगनमण्डल पर हो रहा है इसका अनुमान किया जाता है, पूर्णिमा के चन्द्रमा को देख कर समुद्र में [ ज्वार भाटा ] आने का अनुमान हो जाता है, अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने पर अनुमान हो जाता है कि नदियाँ अधिक मात्रा में सूख गयी हैं जिससे सूखे हुए उनके किनारों पर पक्षिगण विश्राम कर रहे हैं, पथिक लोग अण्डे