ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२ जीवन एव अवधार्यो भवति न अन्यथा, तेन यावति नियतिर्जाता तावति देशे काले वा अनुमानं प्रमाणम्, आगमस्तु नामान्तरः शब्दनरूपो द्रढीयस्तमविमर्शात्मा चित्स्वभावस्य ईश्वरस्य अन्तरङ्ग एव व्यापारः प्रत्यक्षादेरपि जीवितकल्पः तेन यत् यत् आमृष्टं तत् तथैव, यथा नैतत् विषं मां मारयति, गरुड एव अहम् इति, तत्र तु तथाविधे शब्दनात्मनि विमर्शे आनुकूल्यं यो भजते शब्दराशिः सोऽपि प्रमाणं, यथा—वेदसिद्धान्तादिः, अन्योऽपि वा बौद्धाहुंतागमादिः, तेन हि यत् शब्दनम् उत्पादितं ‘ज्योतिष्टोमकारी अहं स्वर्गं गन्ता’ इति, ‘दीक्षितोऽहम् अपुनरावृत्तिभागी’ इति, ‘कारुणिकोऽहं बुद्धपदं गन्ता’ इति, ‘गाढक्लेशसहिष्णुरहम् अर्हत्पदं प्रपत्ता’ इति, तत्र न विपर्यय उदेति—तदाश्वस्तस्यैव तत्र अनुष्ठानयोग्यत्वात्, अन्यस्य तु दृढप्रतिपत्तिरूपत्वाभावात् अप्रमाणमेव तथाविमर्शनात्मकं शब्दनम् । इसीलिए वह निश्चित ही ज्ञान होता है अनिश्चित नहीं, उसी से जितना ज्ञान नियति का होता है उतना ही देश एवं काल में अनुमान प्रमाण का माना जाता है और शब्दरूप आगम प्रमाण तो दूसरा नाम है, वह तो चिद्रूप ईश्वर का आन्तरिक व्यापार है, वह प्रत्यक्षादि प्रमाण के भी जीवन सदृश है, उससे जिस-जिस का परामर्श होता है वह वैसा ही होता है। जैसे यह विष मुझे नहीं मार सकता; क्योंकि मैं गरुड हूँ, सारी शब्दराशि मेरे अनुकूल है, वह भी प्रमाण है। जैसे वेद सिद्धान्तादि प्रमाण माना जाता है वैसे ही अन्य भी बौद्ध, अर्हत् आदि के शास्त्रादि माने जाने चाहिए, इसी से वेद में आता है कि मैं ज्योतिष्टोम यज्ञादि करनेवाला स्वर्ग में जाऊँगा, जिसमें दीक्षित होकर मैं इस संसार को पुनः न प्राप्त होऊँ, दयालु बुद्धपद को प्राप्त करूँगा, गाढ क्लेश सहिष्णु मैं अर्हत्पद को प्राप्त करूँगा इत्यादि, वहाँ पर कुछ भी विपरीत भान नहीं होता है— परलोक में विश्वास रखनेवाले का यज्ञादि करने में अनुष्ठान की योग्यता मानी जाती है, दूसरे लोग (बौद्धजैनादि) को उसमें दृढ विश्वास न होने के कारण ऐसा कहा गया है। के साथ संचरण करती हुई चींटियों को देख कर वृष्टि होने का अनुमान लगा लेते हैं और घास-फूस की कुटीरों का निर्माण कर लेते हैं। यहाँ पर हमने इतना ही मात्र दिखाया है, यह तो केवल उपलक्षण है अर्थात् इस प्रकार बहुत से हेतु [ चिह्न ] संसार में देखे जाते हैं जिससे कि न देखी हुई वस्तुओं का अनुमान हो जाता है। १. शास्त्रों की युक्तियों देकर विषय प्रतिपादन किया जाता है उसमें थोड़ा सा भी अनुचित-विपरीत नहीं होता है और विश्वास कर अनुष्ठान करने योग्य ही है; क्योंकि वाणी भी अज्ञान कर्तृक है और जिसका वक्ता नियत होता है, नियत, परिमित और प्रतिवक्ताओं में प्रतीति को उत्पन्न करती हुई, प्ररूढ होकर पारमेश्वर्य अंश से निकली हुई उन नियत वक्ताओं के मुखरूपी गुफाओं में प्रस्फुटित होती है, किसी पशु प्रमाता में निरोध करने की इच्छा हो तो भी नहीं रोकी जा सकती है। इसी कारण वह आगम संज्ञा की प्रसिद्धि से प्रमाण ही रहती है, तथा वेद, बौद्धादिकों में शास्त्रनिबद्ध प्रसिद्धि अपने यूथ के प्रति बाधित न होती हुई प्रमाणरूप से मानी जाती है। सांप्रदायिक लोगों के प्रति नहीं रहती है— धर्मस्य चाव्यवच्छिन्नाः पन्थानो ये व्यवस्थिताः । न ताँल्लोकप्रसिद्धत्वात्कश्चित्तर्केण बाधते ॥ जो अनादि अनवच्छिन्न परम्परा से धर्म का मार्ग व्यवस्थित है, वे तो सब से अधिक लोक में प्रसिद्ध हैं।