ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०९ ननु एवं तदेव शास्त्रं 'कंचित्प्रति प्रमाणं कंचित्प्रति न' इति स्यात्, न चैतद्युक्तम्— 'अपक्षपातित्वात्प्रमाणस्य' इति, अतत्त्वज्ञोऽसि प्रतीतिवृत्तस्य, तथापि नोपेक्ष्यसे, 'अपक्षपाति प्रमाणम्' इति कः अस्य वचनस्य अर्थः किं यत् एकस्य नीलज्ञानं भासयति धूमज्ञानं वा अग्निम्, 'त्वं प्रातर्निधिमनेन विधाना लब्धासे' इति च यः सिद्धादेशरूप आगमः स किं सर्वान्प्रति प्रमाणम्, अथ कस्यापि कदाचित् किंचित्, तथा इहापि दृढविमर्शनरूपं शब्दनम् आ—समन्तात् अर्थं गमयति इति आगमसंज्ञकं प्रमाणं सर्वस्य तावत् भवति, तत्र यथा मिथ्याज्ञाने सहायतां भजमानम् आलो- केन्द्रियादिकम् अप्रमाणतासचिवम् अप्रमाणं, न च एतावता सम्यग्ज्ञानस्वरूपस्य प्रत्यक्षस्य काचित् पक्षपातिता, तथा स एव ज्योतिष्टोमादिशब्दः शूद्रादेरदृढविमर्शात्मनि अत एव अप्रमाणे आगमा- भासे साचिव्यं विदधदपि दृढविमर्शात्मकसत्यागमरूपशब्दनलक्षणप्रमाणोपयोगितायां प्रामाण्यं भजन् न पक्षपातापक्षपातदोषप्रतिक्षेपयोग्यः, सर्व एव हि आगमो नियताधिकारिदेशकालसहका- र्यादिनियन्त्रितमेव विमर्शं विधत्ते—विविधरूपो निषेधात्मा वा, अत एव—'प्रसिद्धिरविगीता हि
ऐसा होने पर प्रश्न उठता है कि क्या यह शास्त्र किसी के प्रति प्रमाण होता है और किसी के प्रति प्रमाण नहीं भी होता—ऐसा होना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रमाण तो किसी का पक्षपाती नहीं होता, अपक्षपात करना ही प्रमाण का कार्य है। तुमने हमारा आशय नहीं समझा, फिर भी हम तुम्हारी उपेक्षा नहीं करते हैं प्रमाण तो अपक्षपाती होता है इसका क्या अर्थ समझते हो, क्या किसी को नील ज्ञान का प्रत्यक्ष हुआ तो क्या सभी को नील ज्ञान हो जायेगा इसी प्रकार किसी को धूम से अग्नि का ज्ञान हुआ तो क्या सभी को हो जायेगा, वैसे तो वहाँ पर 'तुम प्रातःकालीन खजाना भी प्राप्त कर सकते हो, ऐसा जो कोई सिद्ध पुरुष कहे तो क्या वह सब के लिए प्रमाण होगा ? किसी को प्रमाण ज्ञान होता है किसी को नहीं भी होता है, यह संसार का व्यवहार है, विजातीय परलोक पर विश्वास करके ज्योतिष्टोमादि यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे; शूद्रादि को विश्वास न होने से नहीं करते हैं इसीलिए प्रमाण में कोई पक्षपात और अपक्षपात का दोष नहीं लगता; कोई भी आगम-नियत अधिकारी, देश-काल सहकारी कारण से नियमित होकर ही विधि या निषेधरूप परामर्श करता है। इसीलिए आचार्य ने कहा है कि अनिन्दित प्रसिद्धि ही सत्य होती है, उसमें प्रतिपादित विषय का ही निःशंक होकर ग्रहण करना चाहिए।
सब कोई इनके विषय में यथार्थतापूर्वक जानते हैं। यदि कोई बड़ा भारी 'तर्क' देकर उन्हें असत्य अथवा असिद्ध करें तो यह तीनों कालों में भी नहीं होने वाला है; क्योंकि पुण्य एवं पाप के विषय में प्रत्येक व्यक्ति को "शास्त्रादि" की प्रमाणता की भी अहर्निश आवश्यकता पड़ती है। अखण्ड अनवच्छिन्नरूप में बहनेवाली शास्त्रीय धारा को हेतुवाद से बाधित नहीं किया जा सकता है। १. 'सम्यक्ज्ञायते अनेन' जिससे भली-भांति ज्ञान किया जाता है उसे इन्द्रिय-आलोक कहते हैं जिस प्रत्यक्ष का वही रूप है। प्रत्यक्ष के निमित्त होने से इन्द्रियाँ, आलोक इत्यादि भी प्रत्यक्ष शब्द से कहे जाते हैं। २. आगम शास्त्रों की युक्तियों की लोक व्यवहार में अबाध्यरूप से प्रसिद्धि देखी जाती है, यद्यपि स्मृति शास्त्र से विरुद्ध दिखाई देने पर भी विशिष्ट देश-काल में अवस्थित होकर प्रमाण रहती है। 'कामसागमनिःश्रेयेण निर्मितमपि लोकाचारविरुद्धं चरणं प्रतिपद्यन्ते तत्र हि तावति देश काले वा सा निरोद्धुमिष्टाऽपि कस्यचिदनिरोध्या।' २७