भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

सत्या वागैश्वरी मता। तथेति यत्र हि यदा यत्तद्ग्राह्यमशङ्कितैः ॥' इति श्लोके 'यत्र यदा' इत्युक्तम्, तेन—प्रत्यक्षागमौ बाधकौ अनुमानस्य, इति तत्रभवद्भर्तृहरि-न्यायभाष्यकृत्प्रभृतयः, तस्मात् प्रमाणलक्षणे ज्ञाते सर्वं प्रमाणस्वरूपं ज्ञातं भवति किं विशेषलक्षणैः, यस्तु अविसंवादकत्वं तस्य लक्षणम् आह तेनापि 'प्रापकत्वं प्रवर्तकत्वं प्रवृत्तियोग्यशक्यप्राप्तिकवस्तुप्रदर्शकत्वं' प्रमाण- लक्षणं ब्रुवता न किंचित् प्रमाणाभिमतबोधविश्रान्तं स्वरूपम्, तत् चेत् अनेन लक्षणेन निर्वाह्यते तत् निर्व्यूढं भवति, अन्यथा मुखभङ्गमूर्धकम्पाङ्गुलिमोटनादिमात्रतत्त्वं तत्, इति अलं विस्तरेण ॥१-२॥ ननु च 'एकाभिधानविषये मितिः' इति यत् उक्तं, तत्र—एकमभिधानं बाह्ये स्वलक्षण एव प्रवर्तते यदि, तत्कथम् उक्तं—प्रत्याभासं प्रमाणम्, आभासमिश्रीकरणाभासस्तु स्वलक्षणम् ? इत्याशङ्कां शमयन् प्रमाणस्य यत् प्रमेयं तत् परमार्थतो निरूपयितुम् आह— यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते । आभासोऽप्यर्थ एकस्मिन्ननुसन्धानसाधिते ॥ ३ ॥ इसीलिए श्लोक में 'यत्र यदा' ऐसा कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि प्रत्यक्ष और आगम अनुमान के बाधक होते हैं, इसको भर्तृहरि एवं न्यायभाष्यकर्ता आदि सभी लोगों ने माना है; प्रमाण के लक्षण को जान लेने पर प्रमाण के सभी स्वरूप ज्ञात हो जाते हैं, विशेष लक्षण करने का कोई आवश्यकता नहीं; जो लोग यह कहते हैं कि व्यर्थ न होना यही प्रमाण का लक्षण होता है, उसकी भी प्राप्ति करना ही प्रवर्तकता मानना पड़ेगा, प्रवृत्ति प्राप्ति योग्य शक्य वस्तु को दिखा देना ही प्रमाण का लक्षण है—ऐसा कहनेवाले भी तो प्रमाण का कोई अभिमत निष्कर्ष नहीं बताते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जो इस लक्षण से प्राप्त होता है वही उत्तम लक्षण माना जाता है, नहीं तो मुख घुमा देना, मस्तक हिला देना और अंगुली के द्वारा चुटकी बजा करके बात को उड़ा देना इत्यादि दूसरी चीज है, इस पर अधिक कहना व्यर्थ है ॥ १-२ ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं कि 'एकाभिधानविषये मितिः' इस प्रकार अविसंवादि विज्ञान को प्रमाण सौगतादि मानते हैं, इस वाक्य में एक अभिधान बाह्य स्वलक्षण में प्रवृत्त होता है, यदि ऐसा ही तात्पर्य है—तो प्रत्याभास ही प्रमाण सिद्ध होगा वह कैसे कहा गया है ? आभास का मिश्रीकरण तो प्रत्याभास होगा ? इस शङ्का को दबाते हुए प्रमाण का जो प्रमेय है उसके ठीक-ठीक निरूपणार्थ अब कहा जा रहा है— आभास भी एक ही अर्थ में अनुसन्धान से विचार करने पर रुचि, अर्थिता एवं व्युत्पत्ति के अनुसार भिन्न-भिन्न हो जाते हैं ॥ ३ ॥ यद्यपि आगमशास्त्र का निर्माण मोक्ष के लिए ही हुआ है तथापि लोकाचार के विरुद्ध आचरण करनेवाले के लिए निषेध का भी प्रतिपादन किया गया है। देश-काल की परिस्थिति को लेकर इस का निरोध करना चाहे तो भी निरोध नहीं किया जा सकता है। इस का उल्लेख किया गया है। श्री भर्तृहरि ने वाक्यदीय में उल्लेख किया है— प्रसिद्ध आगमो लोके युक्तिमान्नेतरः । विद्यायामप्यविद्यायां प्रमाणमविगानतः ॥ लोक में प्रसिद्ध आगम युक्तिवाला ह् अथवा न भी हो; विद्या और अविद्या में भी अनिन्दित होकर ही प्रमाण रहता है।