भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-४-५

इह तावत् एकस्मिन्नपि चेतनतया प्रसिद्धे पुरुषस्वलक्षणे विततदेशव्यापितां दीर्घतामेव कदाचित् विमृशति, या—तरूणामपि अस्ति, निःसन्धिबन्धरूपतां वा वृत्ततां, या—शिलानामपि संभविनी, ऊर्ध्वदिगाक्रमणरूपां वा ऊर्ध्वतां, या—स्थाणोरपि सम्बन्धिनी गमनागमनादि- स्वतन्त्रभावयोग्यतारूपं वा पुरुषत्वं, यत्—अन्यपुरुषसाधारणं, तथाहि—स्वतन्त्रया वा इच्छया रुचिरूपया एवं कुर्यात्, यथोक्तं—‘या तु व्याक्षेपसारत्वाच्चेतसः स्वरसोद्गता ।’ इति विततदेश- व्यापिन एव वा अर्थान् तिरोधिलक्षणाम् अर्थक्रियाम् अर्थयमानो विभजेत्, एवं व्यवहारे वृद्धैः कीदृक् दीर्घं नाम गीयते इति व्युत्पित्समानो व्युत्पादयितुमिच्छुः वा विभागं कुर्यात्, इत्येवं— तत्र आभासानां भेदः, एकस्वलक्षणं तु—एकस्मिन् देशाभासे कालाभासे च विश्रान्तेः, देशकाला- भासावेव हि सामान्यरूपताप्रयोजकव्यापित्वनित्यत्वखण्डनाविधानसविधवृत्ती विशेषरूपतां वितरतः, एवं पुरुषत्ववत् अन्येऽपि ब्राह्मणाद्याभासा अपि निरूप्याः, एवम् अत्र तावत् प्रसिद्धतर आभासभेदो—जडाजडसाधारणबहुतरधर्मास्पदत्वात्, अनेन निदर्शनेन धूमेऽपि धूमत्वचन्दनत्व- श्रीखण्डचन्दनोत्थितत्वादयः प्रसिद्धा आभासभेदा विभजनीयाः, अनेन तु प्रसिद्धेन दृष्टान्तेन अप्रसिद्धभागोऽपि यो घटः तत्रापि आभासभागभेदो भवति, तथाहि—किञ्चिदपि अत्र नास्ति इति हृद्भङ्गमिव आपद्यमानो घटं पश्यन् ‘अस्ति इदम्’ इति सत्ताभासमेव पश्यति, अपरान् आभासान् नाम्नापि तु न आद्रियते, तथा उदकाहरणार्थी घटाभासम्, स्वतन्त्रनयनानयनयोग्यत्वस्वर्थी द्रव्याभासम्, मूल्याद्यर्थी काञ्चनाभासम्, हृद्यतार्थी औज्ज्वल्याभासम्, आदिग्रहणात् दृढतर-

गोलाई को भी परामर्श करेगा तो ऐसी गोलाई शिलाओं में भी रहती है और ऊपर की ओर फैलाव रहता है; ले जाना और ले आनारूप आवागमन स्थाणु में भी तो पायेगा और रहती ही है । एवं दूसरे पुरुषों भी है, इसीलिए स्वतन्त्रता से अपनी-अपनी रुचि के अनुसार जैसा चाहे वैसा परामर्श कर सकता है, जिसके विषय में कहा गया है— चित्त की व्याकुला के कारण अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार अनेक परामर्श होते हैं । फैले हुए देश में व्याप्त पदार्थों को छिपाना रूप अर्थक्रिया को चाहता हुआ यदि व्यवहार करे तो वृद्धजनों ने दीर्घ का लक्षण तब कैसा किया है यह माना जाय; इसकी व्युत्पत्ति करनेवाले की इच्छा का यदि विभाग करें तो आभासों का भेद निश्चित ही होगा । इसमें संशय नहीं है, एक ही देशाभास और एक ही कालाभास में विश्रान्ति होने से, देश और काल ही सामान्यरूप से प्रयोजक व्यापिता और नित्यता का वितरण करेंगे, इस प्रकार से पुरुषत्व के परामर्श में भी ब्राह्मण और क्षत्रियादि का परामर्श हो सकता है, जड और अजड इत्यादि साधारणतया बहुत प्रकार के धर्मों का विमर्श हो सकता है, इसी दृष्टान्त से धूम में धूमत्व एवं चन्दनत्वादि भेद भी निकल सकते हैं, इस प्रसिद्ध दृष्टान्त से घटादि परामर्श को भी समझ लेना चाहिए, देखिये—कुछ भी यहाँ पर नहीं है—ऐसा कहनेवाला घट देख लेता है तो ‘अस्ति इदम्’ ऐसी वस्तु की सत्ता का ही परामर्श करता है और अन्य तो आभासों के नाम से भी ग्रहण नहीं करते, जल ले आनेवाला उसको घडे का परामर्श करेगा; स्वतन्त्र द्रव्यरूप से लेनेवाला उसे द्रव्य ही समझेगा; मूल्यार्थी उसे स्वर्ण घट मानेगा; और स्वच्छता को चाहनेवाला उसकी शुभ्रता का परामर्श करेगा, इस प्रकार अनेक तरह से दृढता का आभास हुआ करता है, एवं रुचि और व्युत्पत्ति में भी जोड देना