भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

अ.-२, आ.-३, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१३ भावार्थो वाढर्चाभासम् इति द्रष्टव्यम्, एवं रुचिव्युत्पत्त्योरपि योजनीयम्, एवम् एते आभासभेदा एव वस्तु-आभासमानतासारत्वात् वस्तुतायाः, योऽपि आभासस्य प्राणभूतो विमर्शः सोऽपि प्रत्याभासमेव-शब्दस्य अभिजल्पात्मनो बोधजीवितप्रख्यस्य प्रत्याभासमेव विश्रान्तेः, सन् घटो लोहितः इत्याद्यर्थक्रियाकारित्वमपि अन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रत्याभासमेव नियतं-सदाभासेन हृद्द्रङ्गपरिहारमात्रस्य सम्पादनात्, तत्र आभासान्तरस्य या अपेक्षा सा अग्न्याभासेन-अर्थ- क्रियायां साध्यायां पात्राभासस्य इव तदाभासनान्तरीयकत्वेन आभासान्तरस्याप्यनियतस्य अपेक्षणात्, एवं येन येन मुखेन अर्थो विचार्यते तेन तेन आभासमात्रतात्मैव-तथैव प्रतिभासनात् विमर्शनात् अर्थक्रियाकरणाच्च, इति सिद्धम्, एवं प्रसिद्धतरप्रसिद्धाप्रसिद्धत्वातिशयेन एकोऽपि अर्थो ग्रन्थकारेण त्रैधं निरूपितो 'दीर्घवृत्तेति धूमेति सद्घटेति' ॥ ५ ॥ ननु एवं प्रत्याभासमेव वस्तुत्वे एको घटात्मा न वस्तु स्यात् ? इत्याशङ्क्याह- आभासभेदाद्वस्तूनां नियतार्थक्रिया पुनः । सामानाधिकरण्येन प्रतिभासादभेदिनाम् ॥ ६ ॥ आभासानां मिश्रं यद्रूपं तत्र अवश्यं कश्चिदाभासः प्रधानत्वेन अन्याभासानां विश्रान्ति- पदीकर्तव्यः स तेषां समानमधिकरणं, तेन सह यस्तेषां सम्बन्धः तत् सामानाधिकरण्यं, तेन उपलक्षितो यः प्रतिभासः-अर्थोन्मुखः प्रकाशः तदनुप्राणकश्च कश्चन पदात्मा परामर्शः-तस्य सर्वस्य एकाभासविश्रान्ततानियमात्, तस्मात् तं सामानाधिकरण्याभासं समनुप्राणयति वाक्यात्मा चाहिए, इस प्रकार ये सभी आभासों के भेद ही वस्तुओं के आभासों में हुआ करते हैं, इसीको आभास का प्राणभूत विमर्श कहा जाता है। इन सभी की प्रत्याभास में ही विश्रान्ति समझना चाहिए, अन्वय व्यतिरेक से घट है, परन्तु वह घट रक्त है, इत्यादि अर्थक्रियाकारिता के कारण प्रत्याभास ही नियत माना जाता है, आभास तो हृद् भंग का परिहार मात्र सम्पादन करता है, दूसरे आभास की अपेक्षा अग्नि के आभास से अर्थक्रिया सिद्ध करने में दूसरे की आवश्यकता केवल पड़ती है। उसी प्रकार जहाँ पर जिन-जिन वस्तुओं में दूसरी-दूसरी वस्तुओं की अपेक्षा हो उन-उन पदार्थों का परामर्श कर लेना चाहिए। इसी कारण ग्रन्थकार ने प्रसिद्धतर और प्रसिद्ध एवं अप्रसिद्धत्व अतिशय अर्थात् विशेष के योग से एक ही अर्थ को तीन प्रकार से दिखाया है 'दीर्घवृत्तेति धूमेति सद्घटेति' ॥ ५ ॥ अब शङ्का करते हैं कि यदि एक प्रत्याभास ही वस्तु है तो एक घटरूप जो वस्तु है, वह पदार्थ नहीं हो सकता ? इस शङ्का का उत्तर देते हैं- आभासों के भेद से ही वस्तुओं में भेद होता है; अर्थक्रिया तो सामानाधिकरण्य के कारण प्रतिभास द्वारा अभेद रखनेवाली वस्तुओं से होती है ॥ ६ ॥ जो आभासों का मिला हुआ रूप है उसमें निश्चित् कोई न कोई आभास प्रधान रहता है। यही आभासों का समान अधिकरण है, उसके साथ जो उनका सम्बन्ध है वही सामानाधि- करण्य कहलाता है। इससे युक्त जो आभास है वह आभास क्या है ? अर्थ की ओर उन्मुख प्रकाश उसी से अनुप्राणित होकर तद्रूप परामर्श रहता है; क्योंकि वे सभी एक ही आभास में जाकर विश्रान्ति लेते हैं, इसीलिए उस सामानाधिकरण्य आभास को वाक्यरूप वाक्यार्थ का परामर्श