भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 238

अ.-२, आ.-३, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २१५ समुदायोऽस्ति, सागरपतितानि च स्रोतांसि बहुतरङ्गारम्भार्थक्रियाकारीणि, तद्वत् घटः काञ्चनो लोहितः ततोऽयम् शिवलिङ्गशिरः समावर्जनोचितसलिलाहरणार्थक्रियोचितो दृष्टमात्र एव तीव्र- प्रीतिलक्षणार्थक्रियाकारी, इति—सिद्धमेवार्थक्रियाकारित्वम्, यत् पुनराभासानां मिश्रणे का सीमा इति ? तत्र उच्यते—येषाम् अविरोधः त एव आभासा मिश्रीभवन्ति, नहि रूपाभासो मारुताभासेन मिश्रीभवति—विरोधात्, सोऽपि च नियतिशक्त्युत्थापितः—पृथक् ये दीपप्रकाशाः तेषां सम्बन्धि यदेकं सागरे स्रोतसां च यदेकं वस्तु तेन कार्या यथा ऐक्यधीः तथा अविरुद्धा ये अवभासा घटलोहितकाञ्चनादयः तेषां सम्बन्धि यदेकं स्वलक्षणं तत्कार्या ऐक्यधीरिरिति सम्बन्धः, ऐक्यधिया—प्रतिभासो विमर्शोऽर्थक्रिया च इति स्वीकृतम् ॥ ७ ॥ ननु एवं प्रत्याभासं प्रमाणस्य विश्रान्तत्वात् अग्न्याभासे अग्निज्ञानं प्रमाणं धूमज्ञानं च धूमाभासमात्रे कार्यकारणभावावभासोऽपि तावन्मात्रे, ततश्च धूमाभासोऽपि अग्न्याभासं व्यभि- चरेत् इत्यादिबहुपप्लवप्रसङ्गः ? इति शङ्कां व्यपोहितुम् आह— तत्राविशिष्टे वह्न्यादौ कार्यकारणतोष्णता । तत्तच्छब्दार्थताद्यात्मा प्रमाणादेकतो मतः ॥ ८ ॥ तत्रेति—प्रत्याभासं प्रमाणं विश्राम्यति, इत्यस्मिन्नपि पक्षे न कश्चित् दोषः, तथाहि— सागर में गिरी हुए सभी नदियाँ मिल कर एक तरङ्ग तथा बहुत प्रकार के भी अर्थक्रियाकारिरूप तरङ्ग किया करती हैं। इसी प्रकार शिवलिङ्गाकार घट स्वर्ण का हो या चाहे तांबे का हो जलाहरण रूप कार्य तो करतो ही है, इसीलिए अनेक आभासों का अर्थक्रिया करना सिद्ध ही है। आभासों के मिश्रण में क्या अवधि होनी चाहिए ? इसका यह उत्तर है कि जिन आभासों में विरोध नहीं हैं वे ही आभास आपस में मिलते हैं। जैसे रूपाभास, मारुताभास से नहीं मिलता; क्योंकि इन दोनों में परस्पर विरोध है। वायु में रूप का अभाव मिलता है और वह भी विरोध नियति-शक्ति से उठाया गया है। भिन्न-भिन्न रूपों में होनेवाले दीप प्रकाशों के सम्बन्धी, जो कि एक सागर में या गृह में वस्तु को प्रकाशित करता है उनसे अविरुद्ध होकर ही प्रकाश करता है, इसी प्रकार यहाँ घट में लोहित एवं काञ्चन इत्यादि जो कुछ आभास हैं वे भी एक कार्य को सम्पादन करने के लिए आपस में एकताबुद्धि उत्पन्न कर देते हैं, इसीलिए एकता की बुद्धि से प्रतिभास, विमर्श और अर्थक्रिया इन तीनों विषयों को स्वीकृत किया गया है ॥ ७ ॥ प्रत्येक आभास में प्रमाण की विश्रान्ति को माना जाय, तो अग्नि के आभास में अग्नि का ज्ञान प्रमाण होगा और धूम के आभास में धूम का ज्ञान प्रमाण होगा, इसी प्रकार कार्य- कारणभाव के आभास में कार्य-कारण का ज्ञान प्रमाण होगा, इस प्रकार भिन्न-भिन्न होने के कारण धूमाभास, अग्नि-आभास का व्यभिचारी हो जायेगा। ऐसे तो बहुत से व्यभिचार उपस्थित होंगे ? इस शङ्का के समाधान करने के लिए अब कहते हैं कि— सामान्यतः वह्नि आदि में कार्य-कारणभाव और ऊष्णता उन-उन शब्दों की अर्थता अर्थात् अभिधेयता एवं गन्ध-रस शून्यता आदि से युक्त स्वभावता वह्नि में एक ही प्रमाण से माननी पड़ेगी ॥ ८ ॥ प्रत्याभासों में प्रमाण सीमित होता है, इस पक्ष में भी कोई दोष नहीं है—देखो, वह्नि