ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-८ अविशिष्टो यद्यपि वह्न्याभासो देशकालाभासप्रमुखैः आभासैः असंकीर्णत्वेन सामान्यमात्ररूपत्वात् तथापि स एव आभासो यावद्भिूराभासैरविनाभूतो भगवत्या नियतिशक्त्या नियमितः तावतोऽव- भासान् स्वीकृत्यैव प्रमाणकृतां निश्चयपदवीम् अवतरति, तथा च—वह्याभास इन्धनकार्यत्वा- भासेन धूमकारणताभासेन उष्णस्वभावताभासेन च स्वाभाविकाव्यभिचरितसाहचर्यः प्रतीयमानो विश्वत्रैव सर्वदैव च तथा प्रतीतो भवति—एकत्वात् तस्य, अस्वाभाविकोऽपि यः स्वभावः पुरुषकृतसमयादिमुखप्रेक्षी, तद्यथा—अग्निशब्दवाच्यत्वं घटप्रतिपत्तिकारित्वमित्येवमादिः, सोऽपि एकप्रत्यक्षादेव निश्चीयते, तस्य हि प्रमातुः कृत्रिमेण इतरेण वा रूपेण—आभासान्तरनान्तरीय- कतया असौ वह्न्याभासः संविदितः सर्वदेशकालगतः तथैव संविदितः, इति तत्र किं प्रमाणान्तरेण—तस्य तस्य यथेच्छं पुरुषसमयेन नियुज्यमानस्य शब्दस्य अर्थोऽयं ज्वलद्भास्वराकार आभास इत्यनेन नियतिशक्तिरेव सर्वत्र शरणम् इति पिशुनयति, एतदुक्तं भवति—यत्किंचित् कृत्रिमम् इतरद्वा भावाभासस्य आभासान्तरेण नान्तरीयकत्वं प्रतिभाति तत्र नियतिशक्तिमात्रमेव परं विजृम्भते, तत्तु नियतिशक्तिरूपं पूर्वापरविततकालम्—इन्धनकार्यत्वे धूमकारणत्वे उष्णस्व- भावत्वे च आभासमाने, अनतिचिरकालं तु वह्न्यादिशब्दवाच्यत्वाभासादाविति विशेषः, ततश्च नियतिशक्त्युपजीवनेन धूमाभासोऽपि अग्न्याभासाव्यभिचारी इति न कश्चित् विप्लवः, कार्यता कारणता उष्णता च तस्य तस्य शब्दस्यार्थता तत्तच्छब्दाभिधेयता, आदिग्रहणात्—गन्धरस- सामान्यरूप है; क्योंकि देश-कालादि के आभासों से असङ्कीर्ण है वह सामान्यरूप से ही रहती है, फिर भी वह आभास जितने आभासों से संमिलित रहता है यह भगवती नियति-शक्ति से आबद्ध रहता है और उन नियमित आभासों को प्रमाण करनेवाले के लिए निश्चयपदवी को प्राप्त करता है। वह्नि का जो आभास इन्धन है उसका कार्य होने के कारण, उसके आभास के साथ धूम के कारणताभास से और ऊष्ण स्वभाव के आभास से स्वाभाविक अव्यभिचरित इन सबों का आभास रहता है इस प्रकार सर्वत्र प्रतीयमान होकर प्रतीत होता है। अस्वाभाविक भी पुरुष कल्पित समयादिक की अपेक्षा करनेवाला ही होता है। जैसाकि अग्नि शब्द का वाच्य घट सम्बन्धी ज्ञान कराने में कारण नहीं होता, वह भी प्रत्यक्ष से ही निश्चित किया जाता है, उसका प्रमाता चाहे कृत्रिम हो या अकृत्रिम हो; दूसरे आभास से अवश्य संमिलित होने के कारण वह वह्नि का आभास सब देश-काल में व्याप्त होकर वैसा ही ज्ञात होगा। अतः वहाँ फिर दूसरे कोई प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती, उन-उन आभासों को पुरुष नियम के अनुसार इच्छानुकूल नियोग करना इस शब्द का यही अर्थ है कि चमकता हुआ आभास अर्थात् भास्वर आकार है, इससे सर्वत्र नियति-शक्ति का ही शरण सूचित होता है। इसका तात्पर्यार्थ यह है कि जो कुछ कृत्रिम या अकृत्रिम भावाभास के साथ दूसरे आभास संयुक्त होकर प्रतिभासित होता है और इसमें नियति-शक्ति का ही सामर्थ्य रहता है, वह नियति- शक्ति पूर्वापर नियमकाल की अपेक्षा करके इन्धन कार्य, धूम कारण और उष्णस्वभाव में आभासित होने पर शीघ्र ही वह्नि शब्द के वाच्य आभास में विशेषरूप से भासित होती है, इसीलिए नियति-शक्ति के जीवन से धूमाभास भी अग्नि के आभास से व्यभिचरित नहीं होता, इसमें भेद नहीं है, कार्यता, कारणता और उष्णता उन-उन शब्दों का अर्थ और उन-उन का अभिधान ( कथन ) आदि ग्रहण करने से गन्ध-रस से शून्यता और ऊर्ध्वादि दिशाओं से संयोग