ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१७ शून्यता ऊर्ध्वदिक्संयोगिता जलविरोधिता च, इत्येवं-भूतो य आत्मा स्वभावो वह्न्यादौ स एकस्मादेव प्रमाणात् मतः—संविदित इति यावत्, ‘अर्धेच्छेदः’ इति, काव्ये अयं समयो, न ग्रन्थे, इति—द्वितीयतृतीयपादयोः सामस्त्येऽपि अदोषः, पृथग्भावप्रत्ययप्रयोगो—वस्त्वन्तरापेक्षानपेक्षातः कृतकत्वाकृतकत्वाभ्यां वर्गभेदं सूचयितुम् ॥ ८ ॥ एवं भावस्वभावव्यवस्थापनं प्रत्याभासविश्रान्तेन एकेनैव प्रमाणेन क्रियते, तेषामपि आभासानां यथोचितं यत् अन्योन्यानान्तरीयकतवं तत् एकेन संवेदनरूपेण तदनेकप्रमिताभास- विषयपूर्वप्रवृत्तसंवेदनकलापानुप्राणकान्तर्मुखस्वरूपेण निश्चीयते, तच्च ऐक्याभासमात्रे अनु- संधानरूपं प्रमाणं, अनुसन्धीयमानेषु तु आभासेषु गृहीतग्राहित्वात् अप्रमाणं, तत्र तु प्रत्येकं प्राच्यमेव प्रमाणं, भावस्वभावव्यवस्थापनात्मकमानसप्रवृत्त्यतिरिक्तकायप्रवृत्त्युपयोगस्तु यथा प्रमाणाविषयः तं प्रकारं दर्शयितुम् आह— सा तु देशादिकाध्यक्षान्तरभिन्ने स्वलक्षणे । तात्कालिकी प्रवृत्तिः स्यादर्थिनः………………… बाह्या तावत् अर्थक्रिया स्वलक्षणतः, स्वालक्षण्ये च देशकालाभासयोजनस्यैव अन्तरङ्गत्वम् तत्रापि च विशेषरूपतापि परामर्शं विना न किंचित्, परामर्शद्वारेण तु प्रमातरि विश्राम्यन्ती, प्रमातुः संवेदनैकरूपस्य देशकालायोगेन ऐक्यात् अभ्युज्झत्येव विशेषरूपताम्, इति—सर्वत्र और जल से विरोध इत्यादि जितने भी वह्नि के विरोधी भाव हैं वे सभी एक ही प्रमाण से विदित हो जाते हैं, 'अर्धेच्छेदः' आधे पाद में भेद है; यह काव्य का नियम है, ग्रन्थ में नहीं होता है, द्वितीय-तृतीय पाद में समास होने पर भी कोई दोष नहीं होता, भाव में जो प्रत्यय लगाया गया है वह पृथग्रूप से तो दूसरी वस्तु की अपेक्षा और अनपेक्षा की विवक्षा को लेकर कृतकत्व एवं अकृतकत्व के भेद दिखाने के लिए ही है ॥ ८ ॥ इस प्रकार भाव-स्वभाव की व्यवस्था करना प्रत्याभास में विश्रान्त होनेवाले एक ही प्रमाण से होता है, उन आभासों का भी आभासों में यथोचित एकता के द्वारा पूर्व से आनेवाले ज्ञानसमूह से अनुप्राणित होकर अन्तर्मुख स्वरूप से निश्चय करना चाहिए और वह संवेदन एकता के आभास में केवल अनुसन्धानरूप प्रमाण ही होता है, उनसे अनुसन्धान किये गये आभासों में गृहीतग्राही होने के कारण अप्रमाणता आ जाती है; क्योंकि वहाँ पर पूर्व के ही प्रत्येक प्रमाण को माना जाता है। भाव स्वभाव की व्यवस्था करनेवाली मानसिक प्रवृत्ति भी अतिरिक्त शरीर प्रवृत्ति से भिन्न होती है, उसके प्रमाण विषयक प्रकार दिखाने के लिए अब कहते हैं— वह अर्थक्रिया देश-कालादि के ज्ञान से भिन्न रह कर अपने लक्षण में रहती है, उसकी उस काल में प्रवृत्ति का होना अर्थ के इच्छुक के अनुमान से है ॥ ९ ॥ बाहरी अर्थक्रिया तो अपने लक्षण से होती है और वह अपने लक्षण में देश-कालादि के आभास की योजना से अन्तरङ्गरूप में रहती है। उसमें भी विशेषरूपता के परामर्श से भिन्न दूसरा कुछ नहीं है; परामर्श के द्वारा तो प्रमाता में विश्राम लेनेवाली अर्थक्रिया प्रमाता के ज्ञान से देश-काल से युक्त होकर विशेषरूपता को छोड़ती हुई ऐक्यभाव को प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार २८