ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-९ अद्वयं परमार्थतः, तथापि तु या विशेषरूपता भाति तस्याः परमेश्वरस्वातन्त्र्यमेव निमित्तं यत्, 'मायाशक्तिः' इत्युच्यते, तत्र विशेषसाध्यार्थक्रियाविशेषेण योऽर्थी तस्य या स्वलक्षणे तस्मिन् विशेषरूपे अर्थे तत्कालभाविनी वाङ्मनःकायप्रवृत्तिः सा देशे, आदिग्रहणात् काले स्वरूपान्तरे, स्वरूपाऽनुसन्धानादौ च यानि अध्यक्षान्तराणि बहूनि प्रत्यक्षाणि तेषां भिन्ने भेदे निमित्ते सति भवति, न अन्यथा, न ऐकैकतः प्रमाणात् सा प्रवृत्तिः अपि तु प्रमाणसमूहादेव, समूहता च परस्य न उपपन्ना; अस्माकं तु एकस्वसंवेदनविश्रान्तिमयी सा युज्यते, —इति उक्तं प्राक् 'न चेदन्तःकृता........' । (२।३।७) इत्यत्र । इयमेव च सा प्रमाणानां योजना योजिका च युक्तिरित्युच्यते गन्धद्रव्यादियुक्तित्वात, एवं प्रत्यक्षसमूहादेव प्रवृत्तिरिति तात्पर्यम् । देशादिकेष्वपि अध्यक्षेषु सत्सु देशाभासयोजनायामपि अन्तः प्रमातरि अभिन्नं यत् स्वलक्षणं तत्र,—इति वा संगतिः । देशादिकैरध्यक्षान्तरैः प्रत्यक्षभूतैराभासान्तरैर्भिन्ने स्वलक्षणे निमित्ते सति प्रवृत्तिः,— इति वा योजना । अत्रापि प्रमेयबहुत्वनिरूपणदिशा तदनुयायित्वेन अभिधीयमानः प्रमाणसमूहो निमित्तत्वेन उक्तो भवति । ननु किं प्रात्यक्ष्यामेव प्रवृत्तौ प्रमाणसमूह उपयोगी ? न, इत्याह— .................................... 'अप्यनुमानतः ॥ ९ ॥ न केवलं प्रत्यक्षतः प्रवृत्तिः देशादिकाध्यक्षान्तरभेदरूपप्रमाणसमूहनिमित्ता, यावत् सर्वत्र परमार्थरूप से अद्वैत का ही बोध होता है, फिर भी वहाँ पर जो विशेषता भासती है उसका परमेश्वर के स्वातन्त्र्य में निमित्त है, जिसको 'माया-शक्ति' के नाम से पुकारा जाता है । उस माया-शक्ति के द्वारा निर्मित विशेषरूप में विशेष साध्य अर्थक्रिया विशेषण से ही जो अर्थी होता है उसके विशेषरूप अर्थ में तत्काल होनेवाली मन, वचन और शरीर की प्रवृत्ति देश में तथा काल में व दूसरे स्वरूप में और स्वरूप के अनुसन्धान में, जितने-जितने प्रत्यक्ष होंगे, उन सभी प्रत्यक्षों के भिन्न-भिन्न निमित्त होने पर भी भेद होंगे, अन्यथा नहीं होंगे । एक-एक प्रमाण से प्रवृत्ति नहीं होती है किन्तु प्रमाण समूह से ही होतो है, वह प्रमाण समूह दूसरे को नहीं ज्ञात होता, वह तो एक ज्ञान में ही विश्रान्त होता है—यह पहले ही कह चुके हैं । 'न चेदन्तःकृता.....' (२.३.७) इस स्थल में और यही प्रमाणों की योजना है, इसकी योजना करनेवाली युक्ति कही जाती है गन्ध द्रव्यादि की भाँति, इस प्रकार अनेक प्रत्यक्ष प्रमाणों से ही प्रवृत्ति होती है—यही तात्पर्य है । देश-कालादि से प्रत्यक्ष होनेपर भी देशाभास की योजना में प्रमाता का अभिन्न अपना लक्षण ही प्रमाण होता है, ऐसी भी सङ्गति लगाई जा सकती है या देश-कालादि के भिन्न-भिन्न ज्ञान होनेपर प्रत्यक्ष किये गये भिन्न-भिन्न आभासों के द्वारा अन्य स्वलक्षण रहने पर प्रवृत्ति होती है—ऐसी भी योजना हो सकती है। यहाँ पर भी प्रमेयों के बहुत से निरूपण के द्वारा उनके अनुयायीरूप से अभिधीयमान प्रमाण समूह निमित्त होते हैं— यह कहना होगा । इस पर शङ्का खड़ी करते हैं कि क्या प्रत्यक्ष में ही प्रमाणों के समूह का उपयोग होता है ? नहीं, यह बात नहीं है— किन्तु अनुमान से भी प्रत्यक्ष में प्रमाणों के समूह का उपयोग होता है ॥ ९ ॥ केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से ही प्रवृत्ति नहीं होती है; जिसमें देश-कालादि दूसरे प्रत्यक्ष आदि