भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१२ आसमन्तात् ख्यानं प्रथनं यस्य मुख्यावभासस्य एकरूपभावाभासस्य, एकप्रत्यवमर्शोऽतदुच्चितोऽपि हि अस्त्येवैकावभासः, आभासविमर्शयोरन्योन्यमवियोगात्; तस्मात् मुख्यावभासादेकत्वमप्रतिहत- मास्ते। यदेवानुमितं तदेव दृष्टम्,—इत्यत्र प्रत्यक्षपरोक्षतारूपेणात्मना स्वभावेन भिन्ना अवभा- सच्छाया अमुख्योऽवभासो येषां तेषाम् एकत्वं मुख्यावभासत एकप्रत्यवमर्शानुप्रणितात्,—इति संगतिः। बाह्यान्तरतया भिन्नावभासानामैक्यं यथा—यदेव दृष्टं तदेवान्तरहमुल्लिखामि,—इति। व्यञ्जकानां दीपालोकादीनां दोषैर्भिन्नावभासानाम् ऐक्यं, यदेव रक्तोत्पलं दीपेन नीलं दृष्टं तदेव सूर्यांशुभिर्लोहितं पश्यामि,—इति। अन्येन वापि प्रकारेण इन्द्रियापाटवादिना एकपार्श्वसंमुखत्वा- दिना वा येषामवभासच्छाया भिन्ना, तेषामपि मुख्यप्रत्यवमर्शानुवर्त्यवभासस्वरूपबलात् ऐक्य- मेव,—इति स्थितम् ॥ १०-११ ॥ ननु दूरादूरादावस्तु स एवार्थः प्रमात्रध्यवसितार्थक्रियांशे तथैवोपयोगात्, बाह्यान्तरत्वादौ कथम् आन्तरस्यार्थक्रियायां प्रमात्रध्यवसितायामनुपयोगात् ? — इति भ्रान्तिं भङ्क्तुमाह— अर्थक्रियापि सहजा नार्थानामीश्वरेच्छया । नियता सा हि तेनास्या नाक्रियातोऽन्यता भवेत् ॥ १२ ॥ इह 'कार्यकारणतोष्णता' ( २।३।८ ) इत्यत्र स्वरूपमिवार्थक्रियापि या मध्ये गणिता, सा सहजार्थस्वरूपभूता न भवति; तत्कारित्वं हि यस्मात् ईश्वरेच्छया नियतं भवने चाभवने च । यतो नैषा स्वरूपं, तेन तस्या अकरणात् हेतोर्भावस्यान्यत्वं नाशङ्कनीयं, स्वरूपभेदात् हि संभाव्येता- रूप रहता है; क्योंकि आभास और विमर्श का परस्पर वियोग नहीं रहता है। इस बात को लोक व्यवहार में भी देखा जाता है कि जो अनुमान से किया गया था, उससे ही देखा गया है। यहाँ पर प्रत्यक्ष और परोक्षरूप स्वभाव से भिन्न होते हुए भी अवभास की छाया ( अमुख्यावभास ) जिनका होगा वैसा वही मुख्यावभास का एकत्वरूप प्रत्यवमर्श कहा जाता है या अनुप्राणित होता है—ऐसी सङ्गति बैठती है। जो मैंने देखा था उसीका अन्तःकरण में उल्लेख करता हूँ; यही भिन्न अवभासों की एकता है, पदार्थों को दिखानेवाले प्रदीप का आलोक आदि के दोष से भिन्न-भिन्न अवभासों की भी एकता होती है जैसे—दीप से रक्तकमल को नीलकमल देखते हैं, उसीको सूर्य रश्मियों से रक्त मैं देखता हूँ, इत्यादि। दूसरे प्रकार से भी इन्द्रियों में भेद होने से या एक भाग सन्मुख होने से जिनके आभास की छाया भिन्न दिखायी देती है, उनकी भी मुख्य प्रत्यवमर्श के पीछे चलनेवाले अवभास बल से एकता हो जाती है, यही स्थिर होता है ।।१०-११।। अब शङ्का करते हैं कि दूर और समीप में प्रमाता के अभीष्ट क्रियांश उपयोगी होने के कारण वही अर्थ रहे, किन्तु भीतर और बाहर में तो उपयोग न होने के कारण कैसे भ्रान्ति ही रहेगी ? इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए कहते हैं कि अर्थों की क्रिया स्वाभाविक नहीं होती, किन्तु ईश्वर की इच्छा से ही अर्थों की क्रिया नियत होती है। इसीलिए प्रमाता की क्रिया से अर्थक्रिया अन्यथा नहीं हो सकती ।। १२ ।। कार्यकारणोष्णता ( २-३-८ ) इस कारिका में जब कि स्वरूप के समान अर्थक्रिया को भी बीच में गिना है, वह स्वभाव से नहीं हो सकती; उसके होने और न होने में ईश्वर की इच्छा ही कारण होती है; क्योंकि ऐसा उसका स्वरूप नहीं है, इसीलिए प्रमाता उसको नहीं कर