भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-३, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२१ न्यत्वं, न च स्वरूपम् अर्थक्रियाकारित्वम्, — इत्युक्तं वक्ष्यते च बहुशः। स्वरूपं च प्रत्यवमर्शबलादे- कमेव बाह्यान्तरादावपि, —इति ॥ १२ ॥ ननु विमर्शबलादेव यदि वस्तूनां भेदाभेदव्यवस्था तर्हि इदानीं त्रिजगति निवृत्ता भ्रान्ति- संकथाः, शुक्तिकायामपि सत्यरजततैव आपतति ‘इदं रजतम्’ इति विमृश्यमानत्वात्; ततश्च भ्रान्त्यभावे बाधानुपपत्तेः किमर्थमुक्तं ‘मितिर्वस्तुन्यबाधिता’ ( २।३।२ ) इति । व्यभिचाराभावे हि ‘अबाधिता’ इत्यस्य विशेषणस्य व्यवच्छेद्यं न लभ्यते, — इत्याशङ्कां निरस्यति— रजतैकविमर्शोऽपि शुक्तौ न रजतस्थितिः । उपाधिदेशासंवादाद्विचन्द्रेऽपि नभोऽन्यथा ॥ १३ ॥ ‘इदं रजतं स्थिरं सर्वप्रमातृसाधारणम् अर्थक्रियायोग्यम्’ इति इदमंशे रजताद्यंशेषु तत्संमे- लतांशे च आभासविमर्शनबलात् न तावत् किंचित् मिथ्यात्वं, किंतु उत्तरकालं यो भविष्यति विमर्शो ‘नेदं रजतं वस्तु स्थिरं प्रमात्रन्तरगम्यमभिमतकार्यकारि’ इति, तद्विमर्शविमर्शनीयं यत् तत्पूर्वविमर्शकालसमुचितमेव रूपं तत् तस्मिन् पूर्वविमर्शकाले नैवामृश्यते, भाव्यं च तेनामर्शनी- येन । तत्रैव काले ‘नेदं रजतं हि अभूत’ इति हि उत्तरः परामर्शो, न तु उदितप्रत्यस्तमितायां शत- ह्रदायामिव इदानीमेव ‘इदं न’ इति विमर्शः; ततो यावता पूर्णेन रूपेण प्रख्यातव्यं विमर्शपर्यन्तं सकता, इस हेतु से कार्य भिन्न नहीं हो सकता, स्वरूप भेद से वह अन्यथा दिखता है। अर्थ- स्वरूप अर्थक्रियाकारिता नहीं हो सकती, यह हमने पूर्व में भी कहा है एवं आगे भी बहुत प्रकार से कहेंगे। प्रत्यवमर्श के बल से एकमात्र संविद्रूप ही बाहर और भीतर दिख पड़ता है—यही सत्य है ॥ १२ ॥ क्या तब विमर्श के बल से ही वस्तुओं में भेद और अभेद की व्यवस्था होती है, यह यदि माना जाय तो फिर इस समय तीनों लोकों में भ्रान्ति की कथा ही समाप्त हो जायेगी। शुक्ति में भी सत्यरूप से रजत ही भासित होगा; क्योंकि यह रजत है—ऐसा ही परामर्श होता है; तब तो फिर कहीं पर भी भ्रान्ति नहीं होगी, अतः भ्रान्ति के न रहने पर बाधा की उपपत्ति नहीं हो सकती, फिर क्यों—कहा कि प्रमा वस्तु में बाधक नहीं होती इत्यादि; व्यभिचार के अभाव में ‘अबाधिता’ इस विशेषण का व्यवच्छेदक कुछ भी नहीं होगा—इस शङ्का को दूर करते हैं— रजत का आभास होने पर भी शुक्तिका में रजत की स्थिति नहीं होती; क्योंकि आगे चल करके उसका बाध हो जाता है। उपाधिदेश में न मिलने के कारण जैसे आकाश में ‘द्विचन्द्रः’ दो चन्द्रमा का बाध हो जाता है वैसा ही उसका भी बाध हो जाता है ॥ १३ ॥ यह रजत स्थिर है—ऐसा सभी प्रमाताओं को साधारण अर्थक्रिया की योग्यता प्रतीत होती है। ‘इदम्’ अंश में रजतादि अंश मिला देने पर आभास एवं विमर्श के बल से तो मिथ्यात्व नहीं झलकता, किन्तु उत्तरकाल में यह रजत नहीं है इसका बाध हो जाता है, प्रमाता का यह स्थिर जो विमर्श होगा, वह पूर्वकाल विमर्श काल के अनुरूप नहीं होता; क्योंकि स्वर्णकार ने यह कह दिया है कि यह रजत नहीं है, जैसे विद्युत् चमकती है, उसी प्रकार यह विमर्श सहसा नहीं हुआ है; यह विमर्श बहुत सोच-समझ कर भली भाँति खण्डन करने योग्य है। जब तक यह

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