ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१३ तावत् न प्रख्याति, —इत्यपूर्णख्यातिरूपा अख्यातिरेव भ्रान्तितत्त्वम् । तद्दशेन असद्विपरीतानिर्वा- च्यादिख्यातयोऽपि उच्यन्ताम् । ननु सत्यरूप्यज्ञानमपि अपूर्णख्यातिः ततस्तर्हि किम् ? । इदम् अतः सर्वं भ्रान्तिः,—इत्या- गच्छेत् । दिष्ट्या दृष्टिरुन्मिन्मीलिषति आयुष्मतः, मायापदं हि सर्वं भ्रान्तिः, तत्रापि तु स्वप्ने स्वप्न इव गण्डे स्फोट अपरेयं भ्रान्तिरुच्यते, अनुवृत्त्युचितस्यापि विमर्शस्यास्थैर्यात् । अतश्च पृथक् इदन्ताद्याभासेषु न काचन भ्रान्तिः, मेलनांशे तु विमर्शनुवृत्तिनिर्मूलनं विमर्शोदयकालादेव आरभ्य बाधकेन क्रियते, इति तत्रैव भ्रान्तिभावः,—इति सिद्धम् । रजतस्य शुक्तिकया सह यद्यपि एको विमर्शः, तथापि शुक्तौ रजतस्य तेन ज्ञानेन या दत्ता स्थितिः 'इदं रजतम्' इति, सा न; यत उपा- धिरूपो यो देशः 'अत्र रजतम्' इति रजतच्छायाम् आत्मनोपरञ्जयन् शुक्तिदेशः, तस्यासंवादात् सम्यग्विमर्शनानुवृत्त्याभासनं संवादनं, 'वदिः' अत्र भासनविषयः, तस्याभावात् कारणात् । नन्वेवं भवतु शुक्तिकारजते, द्विचन्द्रज्ञाने तु 'द्वौ चन्द्रौ' इत्याभासे शुक्तिकयेव मेलनं न केनचित्साकमाभासते, यत्र बाधः स्यात्; एकाभासांशे च न बाधः,—इत्युक्तं भवतैव । क एतदाह- मेलनं न केनचित्सह—इति । एवं हि सति स्वालक्षण्येन नियतदेशकालतया कथमाभासः; ? तद्देश- कालाभ्यां सह तत्रापि अस्ति मेलनाभासो यद्विमर्शोऽनुविवृत्सुर्निरूप्यते, द्वित्वाभासचन्द्राभासयोरपि मेलनाभासे विमर्शानुवृत्तिव्यावर्तनं वाक्यम् । तदेतदाह—द्विरूपे चन्द्रेऽपि, न केवलं रजत एव । 'नभः' इति देशविशेषः कश्चित् । 'अन्यथा' इति द्विचन्द्रावरुद्धो योऽनवमृष्टः स न तथा,—इति विमर्श रहेगा तब तक खण्डित नहीं होगा, इसीलिए यह पूर्ण ख्यातिरूप अख्याति ही भ्रान्तिता है । इसी रूप में असत्, विपरीत, अनिर्वाच्य आदि ख्यातियाँ भी समझना चाहिए । अब शङ्का करते हैं कि सत्यरूप से रजत का ज्ञान है, वह भी एक प्रकार से अख्याति ही है । इससे फिर क्या होगा ? तब तो, सब ज्ञान को भ्रान्ति ही कहना पड़ेगा । 'भाग्य से नींद टूट जाने पर जब आप की दृष्टि खुलेगी तब तो उसे भ्रान्ति ही कहनी होगी; क्योंकि माया के आश्रय होने से सब भ्रान्ति ही है; जैसे गाल पर के फोड़े के समान स्वप्न में ही स्वप्न की तरह यह दूसरी भ्रान्ति हो गयी; क्योंकि उचित अनुवृत्ति का भी विमर्श अस्थिर रहता है। इसलिए इदन्तादि के पृथक् आभासों में कोई भ्रान्ति नहीं है, मिलाने पर तो विमर्श की अनुवृत्ति का निर्मूलन होने के कारण विमर्श के उदयकाल से ही लेकर बाधक होने तक भ्रान्ति वहाँ पर रहती है—यह सिद्ध होता है। रजत का शुक्ति के साथ विमर्श होने पर शुक्ति में भी तो रजत का ज्ञान आता है 'इदं रजतम्' यह रजत है—ऐसा कहने से वहाँ पर देश की जो उपाधि है 'अत्र रजतम्' यहाँ रजत है; इस प्रकार से रजत की छाया को शुक्तिदेश से समन्वय करने का विसंवाद होने से विमर्श की अनुवृत्ति नहीं होती । यहाँ पर 'वद्' धातु का भासन विषय है, उसका अभाव कारण है । ऐसा भले ही हो, किन्तु शुक्ति में रजत का और दो चन्द्रमा के ज्ञान में 'द्वौ चन्द्रौ' दो चन्द्रमा का किसी प्रकार से भी भान नहीं होता, जिससे वह बाध हो सके और यह नियम है कि एक के आभास में बाध नहीं होता । इस बात को आपने ही कहा है। इस स्थिति में स्वालक्षण्य से नियत देश-काल के कारण कैसे आभास हो सकता है ? उस देश-काल के साथ वहाँ पर भी मिलने का आभास रहता ही है; जो कि आभास की अनुवृत्ति करनेवाला उसका निरूपण करता है, इस प्रकार से द्वित्वाभास और चन्द्राभास के भी मेलनाभास में विमर्श अनुवृत्ति का व्यावर्तन