ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २२३ बाधकेन उन्मूलितप्राच्यविमर्शानुवृत्तिकः क्रियते, —इति । एवमाभासस्तन्मेलनं च नियमानुप्राणि- तम्,—इत्येतावदेव प्रमेयम् । एतान्येव आगमे तत्त्वानि वक्ष्यन्ते । वस्तु तत्त्वं प्रमेयम्—इति पर्यायः । तथा च काठिन्याभास इति पृथिवी, लोहिताभास इति रूपं तेजश्च, मेलनाभासो रजः, सन्निवेशस्तु नियतिरूपः, नियतिर्हि नियमः, स च अभावप्राणोऽभावस्फुरणमेव च पृथिव्याभासस्य विचित्रतया चकासत् पृथुबुध्नोदराकारता, भेदाभासश्च माया, तत्पृष्ठे सत्यप्रकाशाभासश्च शिव- तत्त्वम्,—इत्यास्तां तावत् । अग्रे भविष्यति एतत् । सर्वथा तावदत्र प्रमेये भगवत एव भेदने च अभेदने च स्वातन्त्र्यं, घटगताभासभेदाभेददृष्टिरेव च परमार्थद्वयदृष्टिप्रवेशे उपायः समवलम्ब- नीयः, न तु व्यवहारोऽपि अयं परमेश्वरस्वरूपानुप्रवेशविरोधी,—इति प्रतिपादितम् ॥ १३ ॥ एतदेव स्फुटयन् सकलप्रमेयसिद्धिः परमेश्वर एव आयत्ता,—इति निरूपयति— गुणैः शब्दादिभिर्भेदो जात्यादिभिरभिन्नता । भावानामित्थमेकत्र प्रमातर्युपपद्यते ॥ १४ ॥ इह अनुवृत्तं व्यावृत्तं च चकासद्वस्तु कतरेण वपुषा न सत्यमुच्यताम् उभयत्रापि बाधका- भावात्, सत्यतो हि यदि बाधक एव एकतरस्य स्यात् तत्तदुदये स एव भागः पुनरुन्मज्जन- सहिष्णुतारहितो विद्युद्विलायं विलीयेत; न चैवम् अत एव भेदाभेदयोर्विरोधं दुःसमर्थमभिमन्य- होता है। इसीलिए कहा गया है कि दो चन्द्रमा में भी होता है, केवल शुक्ति रजत में ही नहीं होता । 'नभः' देशविशेष का नाम है। अन्यथा न मानोगे तो दो चन्द्रमा से अवरुद्ध नभ का विमर्श नहीं होगा, इस प्रकार बाधक से पूर्व का विमर्श उन्मीलित नहीं होता एवं आभास और उसका मेलन नियम से अनुप्राणित नहीं होगा, यही प्रमेय है और इसी को आगम में तत्त्व मानते हैं । एक ही अर्थ का बोधक हो और भिन्न शब्द हो, उसे पर्यायवाची कहा जाता है। जिसमें कठिनता का आभास हो वही पृथ्वी है, जिसमें रक्तरूप हो वह तेज है, तत्त्वों के आपस में मिल जाने पर रज बन जाता है, ठीक-ठीक नियम से रह जाने को नियति कहते हैं और वह दूसरे के अभाव के साथ स्वयं स्फुरण को अभाव कहते हैं। जैसे—घट में पृथु = बीच में बड़ा सा गोला होना ऊपर की ओर छोटा सा मुख होना और उसके पीछे सत्य का प्रकाश होना शिव तत्त्व कहलाता है और यही भेदाभास माया भी है, यहाँ पर इतना कहना ही पर्याप्त है। आगे इसकी विशेषता बतलायेंगे। उन सभी प्रमेयों के अभेद और भेद में भगवान् का ही स्वातन्त्र्य रहता है और घट में होनेवाले आभास के भेद एवं अभेद दृष्टि परमार्थ दृष्टि के प्रवेश में उपाय होती है; क्योंकि परमेश्वर के स्वरूप के अनुरूप यह व्यवहार विरोधी पड़ता है। इस विषय में हमने प्रतिपादन कर दिया है ॥ १३ ॥ इसी को स्पष्ट करते हुए सारे प्रमेयों की सिद्धि परमेश्वर में ही होती है—इस बात का निरूपण करते हैं— गुणों से एवं शब्दादि से भेद होता है और जाति आदि से अभेद होता है—इस प्रकार एक ही प्रमाता में पदार्थों की स्थिति रहती है ॥ १४ ॥ यहाँ पर सामान्य और विशेषरूप से प्रकाशित होता हुआ पदार्थ किस शरीर से सत्य नहीं है, कहिये—दोनों जगह कोई बाधक तो नहीं है, ठीक है, यदि एक का बाधक एक होता तो उसके उदय होने पर वही भाग विद्युत् के समान विलीन हो जायेगा; किन्तु ऐसा नहीं होता ।