ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरस्य प्रतिपत्तयै, सा च परार्थानुमानात्, तत्र च प्रतिज्ञादेरुपयोगः, — इति, तत् परिपूर्णपरप्रति- पत्तिकारि परमार्थतः सकलमेव शास्त्रं परार्थानुमानम् आगमव्यतिरिक्तं न्यायनिर्माणवेधसाक्षपादेन निरूपितम्, — इति । अत्रापि पूर्वोक्तमेव 'किन्तु मोहवशात्' (१।१।३) इति स्मारयितुमाह — अप्रवर्तितपूर्वोऽत्र केवलं मूढतावशात् । शक्तिप्रकाशेनेशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥ १७ ॥ इह परमेश्वरस्येदमेव परं स्वातन्त्र्यं — यत् अस्मादृशे प्राच्यपशुदशाविशेषासम्भाव्यमानाति दुष्करवस्तुसम्पादनं नाम । इतश्च किम् अतिदुष्करं भविष्यति, — यत्प्रकाशात्मनि अखण्डित- ताद्रूप्ये एव प्रकाशमाने प्रकाशननिषेधावभासः प्रकाशमानः । तस्मात् परमेश्वरस्येदं तत्परं स्वातन्त्र्यं यत् तथाभासनं पशुरूपतावभासनं नाम ग्राहकांशसमुत्थापनं, तद्वारेण च ग्राह्योल्ला- सनमपि । सैषा भगवतो मायाशक्तिरुच्यते । यथोक्तम् — 'माया विमोहिनी नाम............' इति । तदेवं-भूतान्मायाशक्तिरूपात् स्वातन्त्र्यात् या मूढता विनष्टपूर्णचेतनता स्वात्मवर्तिन इच्छास्पन्दो- दयस्फुटस्फुरितविश्वभाव निर्भरितात्मनः पूर्णत्वस्य, स्मृत्यादिशक्त्यात्मनः स्वातन्त्र्यस्य, देशकाल- संकोचवैकल्यात् अयत्नसिद्धवैभवनित्यतार्थमस्य च प्रकाशमानस्यापि यदप्रकाशमानतया अभि- मननं, तस्या वशात् सामर्थ्यात् पूर्वं यो न प्रवर्तितः समनन्तरश्लोकद्वयोक्तस्वरूपे प्रमातरि भगवति ईश्वरत्वादिना उक्तेनैव पूर्णत्वादिना व्यवहारो यः खलु 'अहम्' इति भाति स पूर्णः विभुः स्वतन्त्रो भी होता है; क्योंकि इसमें तो दूसरे को ठीक-ठीक ज्ञान करना है। सारा का सारा शास्त्र परार्थ अनुमान के रूप में ही है जिसका आगम से भिन्न न्यायनिर्माण के प्रणेता अक्षपाद गौतम ने निरूपण किया है, यह भी पहले कह चुके है 'किन्तु मोहवशात्' (१-१-३) उसीका स्मरण कराने के लिए कहते हैं— जब कि पहले मूढ़ता के कारण यहाँ पर नहीं है वही सम्प्रति शक्तिपात हो जाने से ईश्वर इत्यादि का व्यवहार प्रवर्तित किया जाता है ॥ १७ ॥ यही परमेश्वर का परम स्वातन्त्र्य है जो कि हमलोगों के जैसे पहले पशु दशा विशेष में नहीं होनेवाले दुष्कर पदार्थ का सम्पादन करना। और इससे बढकर दुष्कर अन्य क्या हो सकता है ? अखण्डित सद्रूप प्रकाशमान ईश्वर के प्रकाशित होने पर भी अप्रकाश की कल्पना करते रहना, परमेश्वर का यही सर्वश्रेष्ठ स्वातन्त्र्य है कि अपने में पशुरूपता का अवभास करना और ग्राहक अंश का उत्थान करना एवं उसी के द्वारा ग्राह्य भाग का भी उत्थान करना यही भगवान् की माया-शक्ति है, इस विषय में कहा है कि—'माया विमोहिनी नाम......।' इस प्रकार माया-शक्ति के रूप में ईश्वर का जो स्वातन्त्र्य है उससे प्राणी को मूढ़ता प्राप्त होती है जिसमें चेतना का विनाश हो जाता है। और इच्छा-स्पन्द का उदय प्रस्फुटित होकर सारे विश्वभाव को निर्भासित करता रहता है। उस पूर्णता का और स्मृति आदि शक्तिरूप स्वातन्त्र्य का एवं देश-काल के सङ्कोचरूपी विकलता से बिना किसी प्रयास से, स्वाभाविक नित्यता रूप धर्म का प्रकाश बना रहता है और उसकी भी मूढता के कारण ही अप्रकाशमानता हो जाती है। जो पहले नहीं था, उसे दो श्लोकों से कह दिये। ईश्वररूप प्रमाता में जिस पूर्णता और ईश्वरता का व्यवहार होता था एवं पूर्ण 'अहं' का स्वतन्त्रपूर्ण नित्य प्रकाश था, जिसके लिए कहा जाता था