भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 343 में से

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नित्यः, – इत्येवमादिरूपः, तं प्रवर्तयन्तु व्यवहारं लोका इति । एतेन शक्तीनाम् इच्छाज्ञानक्रियाणां प्रकाशकेन प्रत्यभिज्ञारूपेण व्यवहारसाधनपरार्थानुमानात्मना शास्त्रेण तं व्यवहारं प्रवर्तयतां तत्समर्थाचरणं क्रियते । ‘प्रवर्त्यते’ इति द्वौ णिचौ । केवलमिति न तु किंचिदपूर्वं क्रियते, नापि तत्त्वतोऽप्रकाशमानं प्रकाश्यते, प्रकाशमान एव यत् ‘न प्रकाशते’ इत्यभिमननं तदपसार्यते । तदपसरणमेव हि परमेश्वरतालाभो मुक्तिः, तदनपसरणमेव संसारः, अभिमननमात्रसारं हि एतद्द्वयं, उभयमपि चेदं भगवद्विजृम्भितमेव । एतदुक्तं भवति–यथा भौतस्य भासमाने एवात्मनि ‘अपहारितोऽहम्’ इति मोहान्मन्यमानस्य मोहोऽपसार्यते, –कः खलु त्वं ?, यस्येदृशं वस्त्रं मुखमी- दृशम्,–इति चेत्, पश्य तदस्ति भवतः–इति पुनः पुनरभिदधता न च अस्य अपूर्वं किंचन रचितं, तथा पशुलोकस्य भासमान एव आत्मनि ‘नाहमीश्वरः’ इत्यादि मोहादभिमन्यतो मोहोऽपोह्यते । यो हि ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्ययुक्तः स ईश्वरो यथा सिद्धान्तपुराणादिषु प्रसिद्धः तथा च त्वम्–इति । यदि वा यस्मिन् यदायत्तं स तत्रेश्वरो राजेव स्वमण्डले, तथा च त्वयि विश्वम्,– इति ईश्वरताव्यवहारो नान्यनिमित्तकः,–इति व्याप्तिः । यत् खलु यल्लग्नं भाति तत्तेन पूर्णं निधानमिव मणिभिः, त्वल्लग्नं च विश्वम्,–इति । यस्य यदन्तर्वर्ति भाति, स तावति व्यापकः समुद्ग इव मणिषु, त्वयि च संविद्रूपे धरादिसदाशिवान्तं शास्त्रप्रक्रियोक्तं विश्वम्,–इति । कि लोग उस व्यवहार को करें और उसीसे इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन शक्तियों के प्रत्यभिज्ञारूप प्रकाश से व्यवहार साधन अनुमानरूप शास्त्र से व्यवहारकरनेवाले के साथ समुचित आचरण किया जाता है । ‘प्रवर्त्यते’ इसमें दो ‘णिच्’ दिये गये हैं । इसमें कोई नया विषय नहीं उत्पन्न हो रहा है । किन्तु केवल पूर्व का प्रवर्तन ही होता है, इसलिए ठीक-ठीक अप्रकाशमान प्रकाशित भी नहीं है ! प्रकाशमान ही प्रकाशित होता है, नहीं प्रकाशित होता है इस अभिमान को दूर कर दिया जाता है; क्योंकि उसका दूरीकरण करना ही परमेश्वर प्राप्तिरूप मुक्ति है और दूरीकरण न करना ही संसार माना जाता है, ये दोनों ही अभिमान पर निर्भर करते हैं और ये दोनों ही परमेश्वर के विलास हैं । इसका निष्कर्ष यह होगा कि जब पदार्थों का भास होता है ‘अपहारि- तोऽहम्’ सचमुच मैं ठगा गया हूँ । जैसे भूत से ग्रस्त आत्मा जब भासित होगा तब मैं अपने रूप में नहीं हूँ–इस प्रकार मोह वशात् जो उस समय अपने आपको मुग्ध समझता है, उसके मोह को दूर कर देने पर तुम कौन हो बताओ ? जिसका ऐसा मुख है और इस तरह का वस्त्र है, देखो, वह है तुम्हारे जैसा; जब कहा जाता है तब कोई नयी चीज नहीं होती । पूर्व का ही विषय पुनरावर्तन करता है कि ‘मैं ईश्वर नहीं हूँ’ इत्यादि इस प्रकार मोह से ग्रस्त हुए का मोह दूर कर दिया जाता है; क्योंकि जो ज्ञान-क्रियारूप स्वातन्त्र्य है, उससे युक्त रहता है, वही ईश्वर कहलाता है । जैसा कि शास्त्र सिद्धान्त पुराणों में दिखलाया गया है वैसा ही तुम हो, जैसे राजा अपने राज्यमण्डल का स्वामी रहता है, उसी प्रकार तुम्हारे में यह सारा विश्व भरा हुआ है । तुम उसके स्वामी हो, अपने को ईश्वर समझो, इसमें दूसरा कोई निमित्त नहीं है । जिसमें संलग्न हुआ वह सोचता हुआ है उसी से पूर्ण होता है । जैसे–मणियोँ से आकर, उसी प्रकार तुम्हारे में भी यह सारा विश्व है । जिसका जितना ही आन्तर आभास है, वह उतना ही व्यापक होता है । जैसा–मणियोँ का डिब्बा और तुम्हारे में भी पृथ्वि से लेकर शिवतत्त्व पर्यन्त शास्त्रीय संविद्रूप प्रक्रिया से प्रतिपादित सारा का सारा तत्त्व विद्यमान है । जिसके रहने पर ही उदय

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