ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२ चेतनस्य कर्तृत्वं नाङ्गीक्रियते, — इति त्रिभिः; चेतनस्यापि अनीश्वरतायां नैतत् घटते, — इति द्वाभ्यामिति संक्षेपार्थः । ग्रन्थार्थस्तु व्याख्यायते । एवं क्रियाशक्तिमुखेन प्रमात्रैकरूपतां भगवति व्यवहर्तव्यां प्रसाध्य, कर्तृरूपतापि तत एवायत्नसिद्धा, — इति दर्शयितुमाह— एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमूर्न् । भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥ १ ॥ चोऽवधारणे । एष एव पुराणः प्रमाता अमून् भावान् आभासितपूर्वान् आभासमानान् आभासयति अविच्छिन्नेन प्रबन्धेन । कथम्, इच्छया ईशितुरभिन्नाया अविकल्परूपाया अक्रमाया वशेन सामर्थ्येन । कुत्रास्य ते भावाः स्थिताः, ? आह, 'अनन्तशक्तित्वात्' इति । विश्वे हि भावा- स्तस्यैव शक्तिरूपेण स्वरूपात्मत्वेन स्थिताः, — इत्युक्तं 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य.........।' (१।५।१०) इत्यत्र । यदेतदाभासनं या साविच्छा, सा क्रिया, अस्य भगवतो निर्मातृत्वम् ॥ १ ॥ ननु बीजादङ्कुर उद्भवन् दृश्यते, न च अत्र कश्चिच्चेतनोऽनुप्रविशन् दृष्टः, तत्कथमे- तदुक्तम् ?, — इत्याशङ्क्याह— करतो तो वह कुछ भी नहीं है, इस विषय को तीन श्लोकों से सिद्ध करेंगे । इसके बाद सांख्यकारों के द्वारा निरूपित भी कार्य-कारणभाव नहीं घटता है, यदि हमारे कहे गये चेतन की कर्तृता नहीं मानते तो जड वस्तु की कार्य-कारणता नहीं सिद्ध हो सकती । इसे तीन श्लोकों से बतलायेंगे; यदि चेतन भी अनीश्वर है तो, यह बात भी नहीं घट सकती है । यह दो श्लोकों से सिद्ध करेंगे ! यही संक्षेप में इस आह्निक का सारांश है । अब ग्रन्थ के अर्थ का व्याख्यान करते हैं । इस प्रकार भावान् में क्रिया-शक्ति को प्रधान मान कर प्रमाता में एकरूपता का व्यवहार करना चाहिए, कर्तृता तो उसमें अयत्न ही सिद्ध है, इसे दिखाने के लिए कहते हैं— भगवान् परमशिव अनन्त-शक्ति सम्पन्न होने के कारण इन पदार्थों को आभासित करते हैं । यह निर्माणरूपी क्रिया भगवान् की इच्छा के अधीन होती है । जब चाहे तब करते हैं, न चाहे तो नहीं करते ॥ १ ॥ यहाँ पर 'चकार' निश्चित अर्थ में है । यही पुराण प्रमाता पूर्व में आभासित होनेवाले इन पदार्थों को अविच्छिन्नरूप से भासित किया करते हैं । वह कैसे ? इसका उत्तर देते हैं कि इच्छा करनेवाले से अभिन्न इच्छा के द्वारा अविकल्प अक्रमरूप के सामर्थ्य बल से करते हैं । वे भाव-पदार्थ कहाँ रहते हैं ? उत्तर देते हैं कि 'अनन्तशक्तित्वात्' अर्थात् चिदात्मा अनन्त-शक्तिवाले होने के कारण अपनी इच्छा अनुसार रखते हैं; क्योंकि सारे भाव-पदार्थ उन्हीं की शक्तिरूप से उन्हीं में रहते हैं—ऐसा कहा भी गया है—'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य ॰॰।' (१-५-१०) अपने में रखनेवाले स्वामी का इत्यादि । यह जो आभासन है, वही इच्छा है और वही सृष्टृत्वरूप क्रिया कहलाती है । यही भगवान् का निर्माण भी है ॥ १ ॥ अच्छा तो, बीज से अंकुर उत्पन्न होता हुआ दिखाई देता है और उसमें कोई चेतन तो प्रविष्ट हुआ नहीं दिखाई देता । तब फिर, कैसे कहते हो कि चिद्रूप ही इस विश्व का अवभासक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं—