ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३५ जडस्य तु न सा शक्तिः सत्ता यदसतः सतः । कर्तृकर्मत्वतत्तत्त्वैव कार्यकारणता ततः ॥ २ ॥ जडस्य बीजस्यैवं भूतं सामर्थ्यं नास्ति यत् असद्रूपं सद्रूपं वाङ्कुरं परिदृश्यमानसत्तावन्तं करोति । बीजादङ्कुरो जायते, -इति नाङ्कुरस्य महिमा असत्त्वात्; अङ्कुरो जायत, -इति च महिमा कथं बीजस्य, ततोऽङ्कुरादन्यत्वात्; यत एवं तस्मात् कार्यं क्रियाशक्त्या अवभास्यमानं कर्मैव,- इति कृत्येनैव आविष्कृतम्, कार्यते अनेन कर्ता तत्समर्थचरणेन, -इति कारणमपि कर्तरि चेतने विश्राम्यति । असतः सतः इति असद्रूपस्य सत इत्यर्थः । वार्थो वात्र गर्भीकृतः, असतोऽङ्कुरस्य सतो वा बीजस्य, -इति; अङ्कुरस्य सतोऽसतो वा, -इत्येवं वा ॥ २ ॥ ननु जडस्य कथमेषा शक्तिर्न भवति, - इत्याह- यदसत्तदसद्युक्ता नासतः सत्स्वरूपता । सतोऽपि न पुनः सत्तालाभेनार्थः.............. सद्धा कार्यमसद्वा संभाव्यते; उभयात्मकम्, अनुभयात्मकमनिर्वाच्यम्, -इति तु स्ववाचैव विरुध्यते; तत् किमनेन । यदि असन् घटः, तर्हि तस्यासद्रूपतैव परमार्थतः, -इति कथं स्वरूप- विरुद्धं सत्त्वमभ्युपगच्छेत्, नहि पादपतनशतैरपि नीलमात्मनि पीतमानं मृष्यते । अथ सन्नेव असत् और सत् की जो सत्ता है वह जड की शक्ति नहीं है । इसलिए कर्तृता और कर्मता ही कार्य-कारणता है ॥ २ ॥ जडरूप बीज का ऐसा सामर्थ्य नहीं होता है—जो कि असद्रूप अङ्कुर को दृश्यमान सत्तावाला बना सके । बीज से अङ्कुर निकलता है, इसमें कोई अङ्कुर का महत्त्व नहीं है; क्योंकि उस समय वह भी उत्पन्न नहीं हुआ रहता है । अङ्कुर जब स्वतः अङ्कुरित होता है तब फिर बीज का कौन सा महत्त्व रहा ? क्योंकि वह अङ्कुर से तो भिन्न हो गया; इसलिए जब ऐसी बात है तो कार्य क्रिया-शक्ति से अवभास्यमान होकर कर्म ही कहा जाता है, इस कृत्य ने प्रकट कर दिया, जो कर्ता से किया जाय, उसे कार्य कहा जाता है, कारण भी कर्तृरूप चेतन में ही विश्रान्ति लेता है । असद्रूप जो सत् है—ऐसा समझना चाहिए या विकल्प अर्थ मान लो; असद्रूप अङ्कुर का या सद्रूप बीज का यह अर्थ कर लो; चाहनेवाला या नहीं चाहनेवाला अङ्कुर का यह भी अर्थ हो सकता है ॥ २ ॥ जड की ऐसी शक्ति कैसे हो सकती है ? इस पर कहते हैं कि— जो असद्रूप है, वह असद्रूप में ही रहेगा और असत् सत् नहीं हो सकता और असत् से सत्स्वरूपता भी सम्भव नहीं है । सत् को सत्ता के लाभ से कोई प्रयोजन नहीं है...... कार्य सद्रूप है या असद्रूप है अथवा सद्रूप और असद्रूप ये दोनों हैं या दोनों नहीं हैं; क्योंकि एकत्र दोनों का समावेश होना असंभव है इसलिए अनिर्वचनीय ही कहा जाय, ऐसा कहना तो अपने वचन से ही विरुद्ध होगा, उससे क्या होगा ? यदि असद्रूप में ही घट को माना जाय तो उसकी असद्रूपता ही सचमुच रहती है, तो फिर अपने स्वरूप को विरुद्धता कैसे (पदार्थ) सत्त्व स्वीकार करोगे, सैकड़ों बार पैर पटकने पर भी नीलरूप में पीतत्व नहीं ढूँढ सकते हैं। अब यदि कहो कि सद्रूप में ही घट को सत्ता है—ऐसा मान लिया जाय तो दण्ड, चक्र और सूत्र की