ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-४ घटस्तर्हि किमन्यत् उपायाच्यते दण्डचक्रसूत्रात् । अभिव्यक्तिविषयत्वस्फुटत्वादयोऽपि सदसद्रूपतया चिन्त्याः । नन्वेवं तूष्णीमास्यतां, नैतदपि युक्तम्,—इत्याह— ........................'अथ चोच्यते—॥ ३ ॥ तदवश्यसमर्थ्योऽयमर्थ इति यावत् ॥ ३ ॥ ततश्च इत्थमुपपाद्यत,—इति दर्शयति— कार्यकारणता लोके सान्तर्विपरिवर्तिनः । उभयेन्द्रियवेद्यत्वं तस्य कस्यापि शक्तिः ॥ ४ ॥ कुम्भकारहृदये अन्तर्मनोगोचरत्वात् पूर्वमपि स्वसंविदेकात्मतया विचित्रत्वेन विश्वस्य भेदाभेदात्मना परिवर्तमानस्य स्पन्दनेन स्फुरतो यत् अन्तःकरणबहिष्करणद्वयवेद्यत्वमाभास्यते, एषैव सा कार्यकारणता । उभयग्रहणमुपलक्षणम्, यस्य यावति पूर्णार्थक्रियासमाप्तिरिति यावत् । सुखादीनाम् अन्तःकरणैकवेद्यतापादनमेव निर्माणं, न च कुम्भकारे प्राणपुर्यष्टकबुद्धिशून्यदेहप्राये तदेतत् स्थितं, तस्यापि जडत्वात्; ततः संविदेव विश्वमात्मनि भासयति शक्तिवैचित्र्यात् । तस्य कस्यापि इति पूर्वमुक्तस्य अचिन्त्यापर्यनुयोज्यमहिम्न इत्यर्थः । न च वाच्यम्—उभयेन्द्रिय- क्या आवश्यकता रहेगी ? घट तो, पहले से ही विद्यमान है । घट की अभिव्यक्ति होने का अर्थ यह है कि साफ-साफ अत्यन्त आँखों के सामने आ जाना आदि, सद्रूप और असद्रूप ये दोनों ही विचारणीय हैं । अच्छा जब ऐसा ही है तो फिर शान्त होकर बैठे रहो, यह कहना भी तो उचित नहीं है—इस पर ग्रन्थकार कहते हैं— इसका प्रतिपादन इस प्रकार किया जाता है—॥ ३ ॥ यदि तुम विचार करके हमें कहने का अवसर देते हो तो सुनो लोक में कार्य-कारणता अवश्य समर्थनीय हैं ॥ ३ ॥ अब कार्य-कारणभाव का निर्वचन करते हैं, इसको दिखाया जाता है— बीच-बीच में बाधा दे देकर हुआ करता है। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों से वेद्य होकर किसी एक की भी शक्ति से हो सकते हैं ॥ ४ ॥ कुंभकार के हृदय में ज्ञेय होने से पहले भी वह ज्ञान का विषय था; विश्व की विचित्रता के कारण भेद और अभेद रूप से विद्यमान स्पन्दन से स्फुरित होनेवाला आन्तर और बाह्य इन दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर भासित होते हैं, इसी का नाम कार्य-कारणभाव है, दोनों का ग्रहण करना उपलक्षण मात्र है, एक से भी कार्य सम्पन्न हो सकता है जिसकी आवश्यकता हो उसको ले लेना चाहिए, जिसको जितने अंशों में अर्थक्रिया की समाप्ति होती हो अर्थात् इसी से पूर्ण अर्थक्रिया की समाप्ति हो जाती है । सुख-दुःखादि को अन्तःकरण में बैठा लेना ही निर्माण कहा जाता है। कुंभकार में प्राण, पुर्यष्टक, बुद्धि, शून्य और देह आदि, ये सब नहीं रहते हैं; क्योंकि देहादि पदार्थ जडरूप होते हैं; इससे सिद्ध होता है कि संविद्रूप ज्ञान ही स्वातन्त्र्य-शक्ति की विचित्रता से सबों में भासित होता है । 'तस्य कस्यापि' इसका पूर्व में प्रतिपादन कर दिया है कि उस अचिन्त्य के ऊपर सत् है या असत् है इस विषय में प्रश्न नहीं खड़ा करना चाहिए। यह नहीं हो सकता है कि दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर सद्रूप या असद्रूप