भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

अ.-२, आ.-४, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३७ वेद्यत्वमपि सदसद् वा, — इति; यतोऽयमत्र परमार्थः—यथा दर्पणान्तः कुम्भकारनिर्वर्त्यमान- घटादिप्रतिबिम्बे दर्पणस्यैव तथाभासनमहिमा, तथा स्वप्नदर्शने संविदः, तथापि तन्महिम्नैव एतेन,इदं बहिः स्फुटरूपं क्रियत, —इत्यभिमान उल्लसति । एवं संविन्महिम्ना कुम्भकृति दण्ड- चक्रादौ घटेऽवस्थिते तन्महिम्नैव अभिमानो जायते; यथा मया इदं कृतम्, अनेन इदं कृतं, मम हृदये स्फुरितम्, अस्य हृदये स्फुरितमिति । तत्र जडस्य मृदादेर्दूरापेतोऽभिमान, —इति संवित्स्व- भावे कर्तृत्वं व्यवस्थाप्यते । ननु भावरूपमेव इत्थं भास्यतां किं द्वयेन्द्रियवेद्यत्वेनोक्तमत्र, स्फुटमर्थ- क्रियाक्षमं रूपमनेनोक्तम्, —इति को विरोधः ॥ ४ ॥ अनेन च विचारेण प्रकृतमपि क्रियास्वरूपं सिद्धं भवति, —इति दर्शयति— एवमेका क्रिया सैषा सक्रमान्तर्बहिःस्थितिः । एकस्यैवोभयाकारसहिष्णोरुपपादिता ॥ ५ ॥ सैषेति, यस्याः ‘स्वरूपत आश्रयतश्च नोपपद्यते' इति उपालम्भः कृतः, सा उपपत्त्या स्थापिता । यतः संविद्रूपादान्तरात् प्रभृति इन्द्रियगोचरतया बहिष्पर्यन्ततया स्थितिराभासरूपा, तत एव वेद्यात्मककर्मालिङ्गनेन सक्रमा तावदुपपन्ना, कर्तृकर्मैकाश्रयतादात्म्याच्च एका । स च में ही रहें; क्योंकि यहाँ पर यही परमार्थ है । जैसे की दर्पण में कुंभकार और बनाये जानेवाला घटादि का प्रतिबिम्ब होना दर्पण का ही महत्त्व माना जाता है, उसी प्रकार स्वप्न में ज्ञान का ही महत्त्व रहता है, फिर भी उसकी महिमा से बाहर भी स्फुटरूप से किया जाता है—ऐसा अभिमान होता है, इस प्रकार ज्ञान की महिमा से ही घट को बनानेवाले दण्ड-चक्रादि में और घट में रहनेवाले महत्त्व से ही अभिमान यह होता है कि मैंने यह घट बनाया, इसने यह किया, मेरे हृदय में स्फुरित हुआ, इसके हृदय में स्फुरित हुआ । इसलिए जडरूप जो मृदादि में ऐसा अभिमान नहीं हो सकता है। उससे तो यह दूर ही रहता है, इसी से ज्ञान में कर्तृता की व्यवस्था होती है। अच्छा तो, भावरूप ही ऐसा ( बाह्यरूपतया ) भासित होता रहे, फिर दोनों इन्द्रियों से वेद्य होता है—ऐसा क्यों कहा ? प्रत्यक्ष अर्थक्रिया में समर्थ को ही इसमें कहा है, इसमें कौन-सा विरोध है ॥४॥ इस विचार से प्रकृत-प्रसङ्ग में क्रियास्वरूप की भी सिद्धि हो जाती है, इसे दिखाते हैं— इस प्रकार वह एक क्रिया सक्रम होकर बाहर एवं भीतर आभासरूप से रहती है । एक के ही दोनों आकार को सहनेवाले का वर्णन किया हुआ है ॥ ५ ॥ 'सैषेति', यह जो कहा गया है इसका अर्थ यह होता है कि स्वरूप और आश्रय ये दोनों रूपों में नहीं बन सकते—इस प्रकार उपालम्भ किया है वह उपपत्ति से स्थापित है; क्योंकि दूसरे संविद्रूप ज्ञान से इन्द्रिय गोचर होने के कारण बाहर तक की स्थिति आभासरूप से होती है, इसी हेतु से वेद्यात्मक कर्म के संपर्क से क्रिया सक्रमा उत्पन्न होती है, कर्ता और कर्म ये दोनों आश्रय के तादात्म्य से एक हो जाते हैं। वह एक आश्रय संविद्रूप होने के कारण स्वच्छता और १. शङ्का करते हैं कि कर्ता का जो व्यापार है वही क्रिया है इस प्रकार कर्ता की आश्रयरूप हो क्रिया कही गयी है । कैसे फिर कर्म की आश्रयरूप भी कह दिया ? इस विषय में आचार्य का कथन है—सब क्रियाएँ कर्तृस्वभाववाली ही होती हैं, कोई कर्म में भी विशेषज्ञान की अधिकता के कारण देखी जाती