ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-६-७ एक आश्रयः संविद्रूपत्वेन स्वच्छत्वस्वतन्त्रत्वाभ्यामुभयमप्यन्तर्बहिरूपं सहत इति ॥ ५ ॥ ननु भवतु घटादावेवं, यत्र तु बीजाङ्कुरादौ चेतनानुप्रवेशो न दृश्यते तत्र कथं बीजस्यै- वाङ्कुरः कार्यो न भवति ? इत्याशङ्क्याह— बहिस्तत्तस्यैव तत्कार्यं यदन्तर्यदपेक्षया । प्रमात्रपेक्षया चोक्ता द्वयी बाह्यान्तरस्थितिः ॥ ६ ॥ मातैव कारणं तेन स चाभासद्वयस्थितौ । कार्यस्य स्थित एवैकस्तदेकस्य क्रियोदिता ॥ ७ ॥ अन्तर्राभासमानस्य तथारूपापरित्यागेनैव बहिराभासनं निर्माणं, ततश्च यद् वस्तु यमपेक्ष्य अन्तरित्युक्तं तद् वस्तु तस्यैव आन्तरवस्तुरूपविपरिवृत्तिमात्रस्य बहिष्करणाहँ भवति, संविद्रूपं स्वतन्त्रता इन्हीं दोनों रूपों से बाहर एवं भीतर के स्वरूप को सह लेती है ॥ ५ ॥ अच्छा तो, घटादि में ऐसा भले ही रहें, किन्तु यहाँ बीज-अङ्कुर में तो चेतन का प्रवेश नहीं देखा जाता है फिर वहाँ बीज का अङ्कुर कार्य क्यों नहीं होता है ? इस प्रकार आशङ्का का उत्तर देते हैं— बाहर में भी उसीका कार्य है जिसको अपेक्षा से अन्तर्मुखी कार्य होता है और प्रमाता की अपेक्षा से बाहर और भीतर की दोनों स्थिति बनी रहती है ॥ ६ ॥ बाहर और भीतर इन दोनों की आभास स्थिति में प्रमाता ही कारण होता है। कार्य की स्थिति में एक ही रहता है उसी से एक की ही क्रिया होती है—ऐसा कहा भी है ॥ ७ ॥ अन्तर में आभासित होनेवाले अपने रूप का त्याग न करने के कारण उसका बाहर में आभास होता है, उसी को निर्माण कहते हैं, इससे जिस वस्तु की अपेक्षा करके अन्तःकरण में भासित होता है, उस आन्तर भासितरूप का अपरित्याग करने के कारण बाहर की ओर करने योग्य ऐसा अर्थ होता है, संविद्रूप प्रमाता की अपेक्षा करके अन्तःकरण में आभासित होनेवाले है इसलिए वह कर्मस्थभाववाली कहलाती है। जबकि भाष्यकार का कथन है कि पचति, गच्छति, इन सभी में कर्मत्व रहता है किन्तु ज्ञानात्मक प्रमातृ-साररूप होने के कारण समकक्षतयता कर्तृस्था और कर्मस्था क्रिया कहलाती है, इस प्रकार कर्तृस्था और कर्मस्था क्रिया प्रसिद्ध हैं, कर्तृस्थरूप और कर्मस्थरूप द्वारा कर्म भी बाहर एवं भीतर उभयरूप से परामर्श की एकता के कारण बना रहता है। इस विषय में भर्तृहरि का कथन है— कर्मस्थः पचतेर्भावः कर्मस्था च भिदेः क्रिया। असासिभावः कर्तृस्थः कर्तृस्था च गमेः क्रिया ॥ 'पच्' धातु का भाव कर्म में रहता है और 'भिद्' धातु की क्रिया भी कर्म में रहती है। 'आस्' एवं 'अस्' धातु का भाव कर्त्ता में रहता है और 'गम्लृ गतौ' धातु की क्रिया भी कर्त्ता में रहती है। इस प्रकार पचति गच्छति, इत्यादि क्रियाओं में स्वरूप से अनेकता होनेपर भी आश्रय की एकता होने के कारण एकता बनी रहती है।