ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३९ च प्रमातारमपेक्ष्य अन्तरभासिनो भावास्तदपेक्षयैव बाह्याभासाः, —इति तेनैव तेषां बहिष्कर- णावभासनं युक्तं; ततश्च१ प्रमातैव कारणं भवति न जडः । ह्यर्थे चः । यस्मात् स प्रमाता कार्य- स्यान्तर्बहिराभासनद्वयनिमित्ततया स्थितस्तेन विना तदपेक्षस्याभासद्वयस्यानुपपत्तेः; तस्मादेकस्य प्रमातुरेव न तु कथञ्चित् जडस्य उदिता प्रसाधितरूपा क्रिया निर्मातृता भवतीति ॥ ६-७ ॥ एतदेव द्रढयति— अत एवाङ्कुरेऽपीष्टो निमित्तं परमेश्वरः । तदन्यस्यापि बीजादेर्हेतुता नोपपद्यते ॥ ८ ॥ यत एवं चेतन एव निर्माता, अत एक नैयायिकादिभिरङ्कुरादौ बुद्धिमानेव परमेश्वरो हेतुत्वेन इष्टः । ननु तैः निमित्तकारणतास्य अङ्गीकृता क्रियाविभागादिक्रमायातापरमाणुवादिद्वार- कतया; समवायिकारणनिजावयवारम्भपरम्परया तु तत ईश्वरादन्यस्यापि बीजभूमिजलादेर्हेतुता कथिता । सत्यम्; कथिता, सा तु नोपपद्यते, उक्तयुक्त्या जडस्य हेतुतायोगात्; ततश्चेश्वर एव बीजभूमिजलाभाससाहित्येनाङ्कुरात्मना भासते, —इतीयानत्र परमार्थः ॥ ८ ॥ ननु परिदृष्टबीजादिव्यतिरिक्तबुद्धिमत्कारणकल्पनेन विना किमुपरुध्यत, —इति परस्थ सब पदार्थ-भाव उसी की अपेक्षा से हो ये बाह्य आभास कहलाते हैं, उसी से उनका बाहर में आभासित होना सिद्ध होता है; इसलिए यह सिद्ध होता है कि प्रमाता ही कारण है जडभाव की इनमें कारणता नहीं होती, यहाँ पर 'चकार' शब्द को 'हि' अर्थ में लिया गया है। जिससे वह प्रमाता कार्य के बाहर एवं भीतर दोनों आभासों में निमित्त होकर विद्यमान रहता है, उसके बिना अपेक्षित दोनों आभासों की उपपत्ति न होने के कारण एक ही प्रमाता से उदित क्रियाओं प्रसाधन होता है जड की तो कारणता किसी प्रकार से भी नहीं होती ॥ ६-७ ॥ इसी बातको दृढ करते हैं— अत एव अङ्कुर होने में भी परमेश्वर ही निमित्त माना जाता है। उससे भिन्न बीज आदि में हेतुता नहीं बन पाती है ॥ ८ ॥ क्योंकि चेतन को ही निर्माता माना गया है, इसलिए नैयायिकों के द्वारा अङ्कुरादि में बुद्धिमान् परमेश्वर ही हेतु है और हेतुरूप से अनुमान भी किया जाता है। इस पर शङ्का की जाती है कि उन लोगों ने ईश्वर को निमित्तकारण माना है; क्रिया का विभाग के द्वारा क्रम से प्राप्त अणु-परमाणु आदि अपने अवयव को समवायिकारण मानने से सिद्ध होता है कि ईश्वर से भिन्न जल, भूमि और अङ्कुर आदि की भी हेतुता होती है—ऐसा कहा हुआ है। ठीक है, किन्तु वह हेतुता ईश्वर में घटती नहीं है, उक्त युक्ति से तो जड को ही हेतुता सिद्ध होती है, इसलिए कहना होगा कि ईश्वर ही बीज, भूमि, जल आदि साहित्य के माध्यम से अङ्कुररूप होकर भासता है, इतना ही यहाँ उत्तम है ॥ ८ ॥ अच्छा तो, परिदृष्ट बीजादि से भिन्न बुद्धिमान् ईश्वर को कारण न मानने से क्या क्षति १. जबकि जड वस्तु का कार्य नहीं देखा जाता है इसलिए कारण भी जड नहीं है। इसी कारण नियति- शक्ति को आगे करके जड शरीर में जैसे चेतन की कारणता के रहने पर ही गमनादि क्रिया करते रहते हैं वैसे ही जड बीजादि में उपचार मात्र है कि यही सब कुछ सम्पन्न करता है, वस्तुतः जड वस्तु में किञ्चित् भी सामर्थ्य नहीं रहता है ।