भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

२४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-९ भ्रान्तिं भिन्दन्नाह— तथा हि कुम्भकारोऽसावैश्वर्येण व्यवस्थया । तत्तन्मृदादिसंस्कारक्रमेण जनयेद् घटम् ॥ ९ ॥ ‘तथा हि’ इति निदर्शनोपक्रमेण व्याप्तिरेवंभूतैव दृष्टा, —इति द्रढयति । जडा हेतवश्चेतन- प्रेरिताः कार्यं कुर्वन्ति, मृदादयो यदि सन्निधिमात्रेण विदध्युः कुम्भकारेण किमत्र कृत्यम्; शिवि- कस्तूपकादिपरम्परया ते जनयन्ति; सा च कुम्भकारायत्ता, —इति चेत् सिद्धं नः साध्यम् । शिविकसंपादनेऽपि ते चेतनप्रेरणामपेक्षन्ते, —इति । तज्जडकारणानां चेतनप्रेरणामन्तरेण न क्वचित् कार्यकारित्वम्; यदि हि स्यात् मृदादीनामपि स्यात्, —इति एकान्त एषः । ततश्च यत् अचेतनं कार्यकारि तत् चेतनापेक्षं मृदादय इव, तथा च बीजादि, —इति स्वभावः । अचेतनकार्य- कारित्वं हि कादाचित्कत्वात् सनिमित्तम्, न चान्यदस्य निमित्तमुपपद्यते अनुपलम्भात्, —इति चेतनप्रेरणं यदि न निमित्तीकुर्यात् व्यापकविरुद्धमन्यनिमित्तकत्वं प्रसज्येत; न च युक्तं तत्, मृदादावपि तस्य प्रसङ्गात्, —इति सिद्धा व्याप्तिः; अतश्च कुम्भकृदेव तत्रेश्वरः । तदेतदाह— ईश्वररूपा या व्यवस्था, तया यः स स मृद्दण्डचक्रादीनां संस्कारः, मृदो मर्दनं, दण्डस्य प्रगुणत्वं, चक्रस्य परिवर्तनम्, —इत्यादिः, तदारम्भो यः क्रमः शिविकस्तूपकादिरूपः, तेन घटं नियोगतो जायेगी ? ऐसी जो दूसरे लोग भ्रान्ति करते हैं उसे दूर करते हैं । देखो; जहाँ पर साक्षात् बुद्धिमान् कुंभकार भी ईश्वर की व्यवस्था से ही उन-उन मृदादि ( दण्ड चक्र-सूत्र ) के संस्कार क्रम से घट का निर्माण करता है, इस प्रकार चेतन ही तो कारण बना ॥ ९ ॥ ‘तथाहि’ दृष्टान्त का उपक्रम बना करके व्याप्ति ऐसी ही देखी गयी है, इस बात को दृढ करते हैं । जड हेतु चेतन से प्रेरित होकर कार्य करते रहते हैं, यदि मिट्टी-चीवरादि ये सभी जितने भी हैं, वे आपस में संमिलित होकर कार्य कर डाले तो फिर कुंभकार का कौन सा कृत्य रह जायेगा; और दण्डादि परम्परा से वे सभी आपस में मिल करके घट का निर्माण करते हैं और वह क्रिया कुंभकार के अधीन हो तब तो हमारा कार्य सिद्ध ही हो गया, फिर इसमें कहने को बात ही नहीं रहती । घट के निर्माण में चेतन को ही प्रेरणा की अपेक्षा रखते हैं, जड कारणों से चेतन की प्रेरणा के बिना बीजादि में कार्यकारिता नहीं रह जाती यह कहना पड़ेगा। यदि इनकी कार्यकारिता को मानते हो, तो मृदादि की भी माननी ही होगी। इसमें गुञ्जाइश नहीं होगी और यह आवश्यक भी है। इससे सिद्ध हुआ कि जो भी अचेतन जड कार्य करेगा वह चेतन तत्त्व की सहायता से ही कर सकेगा । जैसा कि मृदादि का कार्य । अचेतन जड आदि जो कुछ भी कार्य करते हैं उसमें चेतन की ही निमित्तता होती है इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी निमित्त नहीं होता; क्योंकि दूसरा कोई इसमें दिखाई नहीं देता, यदि चेतन को निमित्त न मानते हो तो व्यापक के विरुद्ध अन्य किसी की निमित्तता माननी होगी; जबकि यह उचित नहीं है; क्योंकि मृदादि में भी उसकी प्राप्ति हो जायेगी । इसलिए कुंभकार ही उसमें ईश्वर है यह मानना पड़ेगा। इसे बताते हैं कि ईश्वर के द्वारा बनी हुई व्यवस्था से उस-उस मिट्टी, दण्ड, चक्रादि का संस्कार होता है, जैसे—मिट्टी का मर्दन करना, दण्ड को चक्र में लगा कर चक्र की गति को वेग देना इत्यादि ।