ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २४१ जनयति, नान्यथा, —इति नियोगे लिङ् । किं च यदि न क्रुध्येत वस्तुतः कुम्भकारोऽपि ऐश्वर्येव स्वतन्त्रविश्वात्मतारूपया व्यवस्थया मृदादिसंस्कारापेक्षया प्रदर्शितनियत्यभिधाननिजशक्ति- विजृम्भातो घटं जनयेत्; अन्यथा अचेतना मृदादयः कथं कुम्भकारेच्छामनुरुध्येरन्, तन्तवोऽपि वा पटसंपादनेच्छां किं नाद्रियेरन् । तदेतदपि उक्तम् अनेनैव सूत्रेण 'तथा हि' इति । नन्वेवं कुम्भकृतो नास्ति कर्तृत्वम्, —इति समुत्सीदेत् धर्माधर्मव्यवस्था । यदि प्रत्येषि युक्त्यागमयोः, तत् एवमेव; तथापि समस्तेतरनिर्माणमध्य एव इदमपि परमेश्वरेणैव निर्मितं, यदविच्वलस्तस्य कुम्भकारपशो- र्मिथ्या कर्तृत्वाभिमानः प्रतिभुव इव अधमर्णताभिमानः, यदि पुनर् ईश्वरस्येच्छैव इयमीदृशी 'मा अस्य अभियानोऽयम् उद्गमत्' इति, तदा नासौ कर्ता कश्चित् । तदिदमपि उक्तं सूत्रेणैव 'तथा हि' इति । कुम्भकारस्यापि 'मृदादिसंस्कारक्रमेण किं घटं जनयामि, उत न जनयामि' इति य एक- पक्षनिश्चयाय संप्रश्नात्मा विचारः, स ईश्वरसम्बन्धिन एव विविधात् स्वरूपावच्छादनतत्तत्प्रका- शनरूपात् अवस्थानात्, —इति संप्रश्ने लिङ् । तस्मात् वस्तुत 'ईश्वर एव सर्वत्र कर्ता, अहं च स एव' इति न परिमिते कर्ता, अपि तु सर्वत्र कर्ता, —इति एतावति सर्वथा हृदयेन अवधातव्यम्,— इति स्थितम् ॥ ९ ॥ दृश्यते चास्य चेतनस्य स्वातन्त्र्यमेव सर्वत्र जृम्भमाणं जडानपि यत् स्वात्मतामापादयति, न तु जडानां वस्त्वन्तराविष्करणे सामर्थ्यम्,—इति यदुक्तं, तत् सर्ववादिप्रसिद्धनिदर्शनेन द्रढयति— उससे आरम्भ होनेवाले जो क्रम हैं वह शिविकस्तूपकादिरूप है, जिससे कि घट ईश्वरीय नियम से निर्मित होता है, दूसरे प्रकार से नहीं होता, इसलिए यहाँ पर नियोग अर्थ में 'लिङ्' लकार दिया है । यदि ईश्वर नहीं कहते हो तो कुंभकार क्रुद्ध होगा और घट का निर्माण नहीं होगा; चाहे तो अपनी स्वतन्त्र-शक्ति से मृदादि के संस्कार न करके भी घट बना ले और अचेतन मृदादि भी कुंभकार की इच्छा का अनुरोध करके कार्य कर ले, इस प्रकार तन्तुओं से भी पट बना ले । इसलिए 'तथाहि' इसी सूत्र में हमलोग कह भी आये हैं । अब शङ्का करते हैं कि कुंभकार की कर्तृता नहीं होती, यदि होती है तो धर्माधर्म की व्यवस्था बन्द हो जायेगी । इसलिए यह ईश्वर ने बनाया है पशुरूप जो कुंभकार है उसका मिथ्या अभिमान है। जैसा कि प्रतिवादी का प्रतिभूमात्र होता है, इसलिए कुंभकार का मृदादि संस्कार क्रम से घट बनाऊँ या न बनाऊँ यह एक पक्षीय प्रश्नात्मक विचार होगा, इस प्रकार उस ईश्वर सम्बन्धी अनेक प्रकार के रूपों का आच्छादन करना और प्रकाशन कर स्थापन करना, इसी प्रश्न में लिङ् लकार है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुतः ईश्वर ही सर्वत्र कर्त्ता है । 'अहं च स एव' और मैं भी वही हूँ । वह परिमिति कर्त्ता नहीं है, अपितु सर्व कर्तृता ईश्वर की ही रहती है। इस बात को सब प्रकार से सर्वदा हृदय में दृढतापूर्वक धारण रखनी चाहिए ॥ ९ ॥ चेतन की स्वातन्त्र्य-शक्ति सर्वत्र बढ़ती हुई जड-भावों को भी आत्मरूप बना लेती है— यह देखा जाता है। जड-भावों में अन्य पदार्थ को उत्पन्न करने का सामर्थ्य नहीं होता, यह कहा है, वह सभी वादियों के सिद्ध दृष्टान्त से घटता भी है इसे दृढतापूर्वक सिद्ध करते हैं— १. स्वप्न और मनोराज्य में चेतन का ही कार्य-कारणभाव देखा गया है। इस विषय में भट्ट दिवाकरवत्स का कथन है—न दृश्यते त्वत्प्रतिभासशक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैवा विश्व- ३१