ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१० योगिनामपि मृद्बीजे विनैवेच्छावशेन तत् । घटादि जायते तत्तत्स्थिरस्वार्थक्रियाकरम् ॥ १० ॥ यत् इह चेतनप्रेरितं कारणम्,—इति प्रसिद्धं मृदादि, यच्च तदनपेक्षं बीजादि घटादेरङ्कु- रादेश्च जनकं, तदेव यदि परमार्थतः कारणं स्यात् तत् तद्व्यतिरेकेण घटाङ्कुरादेः कथं योगीच्छा- मात्रेण जन्म स्यात्, अकारणत्वप्रसङ्गात् तेषां वा अकारणत्वापत्तेः। यथोच्यते—अन्ये एव ते घटाङ्कुरादयो मृद्बीजादिजन्याः, अन्ये एव च योगीच्छादिजन्याः,—इति, तत्रापि प्रबोध्यसे— विमर्शाभेदात् तावदभेद,—इति पूर्वमेव उक्तम्; तत्रापि योगी खलु अप्रतिहतेच्छः तस्य च इच्छा- तादृगेव घटो भवतु यो मृदादिकृतकुम्भसंभवभूर्यर्थक्रियाकरणचतुरवृत्तिरिति। तदेतदाह—तस्य स्थिरस्य अर्थक्रियाम्, रानुबन्धिनः कालान्तरानुबन्धिनश्च स्वस्य आत्मीयस्य अर्थक्रियाविशेषस्य करणे हेतुतच्छीला नुकूलरूपं घटादि जायते,—इति। ये त्वाहुः—नोपादानं विना घटाद्युत्पत्तिः, योगी तु इच्छया परमाणून् पश्यन् संघट्टयतीति। ते वाच्याः —यदि खलु अन्वयव्यतिरेकागमादि- परिदृष्टः कार्यकारणभावो योगिषु न विपर्येति,—इति हृदयमावर्जयति वः, तत् किं परमाणुग्रहेण; नो चेत् घटस्य कपालादि शरीरस्य स्वावयवाः, तेषां निजं निजं प्रसिद्धं तृणशस्तिलशोऽपि अन्यथा- योगियों के द्वारा मिट्टी और बीज के सम्बन्ध में बिना इच्छा के ही अङ्कुर अङ्कुरित हो जाते हैं। उसी प्रकार उन-उन अपनी क्रिया करनेवाले घटादि भी होंगे ॥ १० ॥ यह जो चेतन से प्रेरित प्रसिद्ध मृदादि कारण है, वह मृदादिरूप कारण बिना किसी अपेक्षा के बीजादि अकुरादि का एवं मृदादि घटादि का जनक नहीं होता है। यदि वही परमार्थतः होता तो कैसे उसके बिना भी घटादि और अंकुरादि चेतन की इच्छा से उत्पन्न हो जाते हैं। उसके बिना घटादि एवं अंकुरादि का कैसे योगी की इच्छामात्र से जन्य हो सकता है। उनकी कारणता नहीं होने से उनमें कारणता की प्राप्ति भी नहीं होती। यदि दूसरे लोग कहें कि घटादि और अंकुरादि क्रमशः मृदादि एवं बीजादि से उत्पन्न होते हैं और योगी की इच्छा से होनेवाले दूसरे ही अंकुरादि होते हैं, क्रम को तो बनाया जाता है, जब कि इन दोनों में विमर्श का भेद नहीं है, यह अभेद ही है इस बात को हम पहले भी कह चुके हैं। वहाँ पर भी योगी की इच्छा अप्रतिहत होती है और उसकी इच्छा जैसी होती है वैसा ही घट का निर्माण हो जाता है। जैसा कि कुंभकार मिट्टी से घट बना लेता है, तो भी उसी प्रकार का ही घट स्थिर अर्थ क्रिया करने- वाला घट कालान्तर में अपनी अर्थक्रिया विशेष को करनेवाला हेतु और उसके शील के अनुसार उत्पन्न होता ही है और जो लोग कहते हैं कि बिना उपादान के ही योगी की इच्छा से घटादि की उत्पत्ति होती है—यह बात नहीं है। योगी अपनी इच्छा से परमाणु आदि को संघटित कर लेता है। अन्वय-व्यतिरेक से होनेवाले कार्य-कारणभाव यदि योगी में विपरीत न होता तो तुम लोगों के हृदय को कौन आकर्षित करता, परमाणु के ग्रहण करने से क्या होगा और घट के प्रपञ्चप्रथनै कहेतुः ॥ हे भगवन् ? आपकी प्रतिभास-शक्ति के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण स्वप्न में पदार्थों की विचित्र-रचना करने के लिए दिखायी नहीं देता है। विश्व प्रपञ्च के विस्तार करने में एकमात्र निमित्त संविद्रूप यह शक्ति ही है।