ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-१०] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४३ भवनमसहमानं लौकिकमेव कारणम्, — इति घटे मृद्दण्डचक्रादि, देहे स्त्रीपुरुषसंयोगादि सर्वम- पेक्ष्यं परिदृष्टदीर्घतरकालपरिवासमिति । योगीच्छया तु समनन्तरोदिघटदेहादिसंभवो दुःसमर्थ एव । चेतन एव तु तथा तथा भवति भगवान् भूरिभगो महादेवो नियत्यनुवर्त्तनोलङ्घनतर- स्वातन्त्र्यः, — इत्यत्र पक्षे नियत्यनुवर्तिनि लौकिके प्रसिद्धे कार्यकारणभावे स्वातन्त्र्यं, तदुल्लङ्घन- माद्रियमाणस्य तु योगिप्रायप्रसिद्धे लोकोत्तरे, — इति न कश्चित् विरोधः । इयान् च लोक एव, परमार्थतस्तु स एव क्रमाक्रमरूपविश्वसृष्ट्यादिकृत्यपञ्चकप्रपञ्चस्वभावः प्रकाशते; चेतनो हि स्वात्मदर्पणे भावान् प्रतिबिम्बवदाभासयति, — इति सिद्धान्तः । यदाह पूर्वगुरुः— 'निरुपादान- संभारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।' ( स्तवचि० ९ श्लो० ) इति ॥ १० ॥ ननु यदि प्रसिद्धकारणोल्लङ्घनेनापि तत्कारणजन्यकार्यविशेषतुल्यवृत्तान्येव कार्याणि जायन्ते, भग्नास्तर्हि अनुमानकथाः । तथा हि कथमप्यदन्यत्र नियमवद्भवेत् ?, — इत्याशङ्क्य प्रामाणिकतरम्मन्यैस्तादात्म्यतदुत्पत्ती नियमनिदानमुपगते; नहि निःस्वभावं वस्तु भवति, नापि भिन्नस्वभावं स्वभावभेदेन भेदात्; पर्यायशस्तत्स्वभावद्वयाभावे च निःस्वभावताप्रसङ्गात् । एवं लिए कपालादि उनके अवयवों का क्या प्रयोजन होता, उनके लिए अपना-अपना प्रसिद्ध छोटे-छोटे अवयवों के मिलाने का लौकिक व्यापार करना सब व्यर्थ हो जाता है । जैसा कि घट में मिट्टी, दण्ड, चक्रादि । पुरुष के शरीर होने में स्त्री-पुरुष संयोगादि सब की भी तो अपेक्षा रहती है वह व्यर्थ जाता । योगी की इच्छा से सब घटादि एवं अंकुरादि की उत्पत्ति हुआ करती और सबों का संयोग तो दुःसमर्थन ही होगा, इसलिए जिसके गर्भ में सारा विश्व रहता है, ऐसे भगवान् चेतन ही नियति का भी अतिक्रमण कर सकते हैं, यही उनका घनतर स्वातन्त्र्य है । इस प्रसिद्ध लौकिक निरन्तर कार्य-कारणभाव में ईश्वर की स्वतन्त्रता को भी अतिक्रमण करनेवाले के मत में योगी की प्रसिद्ध लोकोत्तर सृष्टि में कोई विरोध नहीं है । ये तो सब लौकिक ही बातें हैं, परमार्थतः क्रम एवं अक्रमपूर्वक विश्व सृष्टि के पञ्चकृत ( उत्पत्ति-स्थिति-लय-निग्रह-अनुग्रह ) स्वभाववाले चेतन भगवान् अपने में संपूर्ण भाव-पदार्थों को रखते हुए अपने से ही अवभासित करते हैं और उत्पन्न करते हैं । यही सिद्धान्त है । जिसका कि पूर्व गुरुवर्यों ने प्रतिपादन किया भी है—उपादान कारण के बिना ही अपने में ही सारे विश्व को भगवान् शूलपाणि प्रकाशित करते हैं । जैसा कि बिना भित्ति का चित्र । ( स्तवचि० ९ श्लोक में ) ॥ १० ॥ अच्छा तो, यदि प्रसिद्ध कारण का अतिक्रमण करने पर भी उसके कारण से होनेवाले कार्य विशेष ही होता है, इससे फिर अनुमान करने का कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी । दूसरी जगह नियम से क्यों होगा ? ऐसी आशंका कर कहते हैं कि अपने को दृढ़ प्रामाणिक मानने- वाले तादात्म्य उससे उत्पत्ति को नियम का कारण मानने पर कोई वस्तु निःस्वभाव ( स्वभाव- शून्य ) नहीं हो सकती, भिन्न स्वभाववाली भी नहीं हो सकती; क्योंकि स्वभाव में भिन्नता होती है, इसलिए उसका भी भेद हो जायेगा । इस प्रकार यदि क्रमशः एक-एक को मानते हो तो दो स्वभाव के अभाव होने के कारण निःस्वभावत्व प्राप्त हो जायेंगे । इस प्रकार निर्हेतुक और भिन्न