ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११ निर्हेतुके भिन्नहेतुके च कार्ये वाच्यम् । उभयत्रापि च हेतुकृतैव व्यवस्था; स्वहेतुत एव हि शिंशपा वृक्षस्वभावाव्यभिचारिणी जाता, स्वहेतुतश्च हुतभुग्धूमजननस्वभावः, तदिदानीं नियत्युल्लङ्घिनि कार्यकारणभावे सर्वमिदं विघटेत । योगीच्छया हि शिंशपापि अवृक्षस्वभावा भवेत्, धूमे तु द्विगुणं चोद्यम्; अग्न्यादिसामग्री योगीच्छोद्भूता धूमं न जनयेत्, योगीच्छा वा अनग्निकं धूमम्,—इति न स्यादनुमानम्, अस्ति च तल्लोके, इत्याशङ्कयाह— योगिनिर्माणताभावे प्रमाणान्तरनिश्चिते । कार्यं हेतुः स्वभावो वात एवोत्पत्तिमूलजः ॥ ११ ॥ योगीच्छापि सर्वथा तादृशमेव न तु वृश्चिकगोमयादिसंभूतवृश्चिकादिन्यायेन कथंचित् रसवीर्यादिना भिन्नं कार्यं जनयति,—इति यत् कथितमत एवास्मादेव हेतोः कार्यं वा धूमादि अग्न्यनुमाने, शिंशपात्वादित्वस्वभावो वा वृक्षत्वाद्यनुमाने एवं हेतुर्भवति, यदि प्रमाणान्तरेण लोक- प्रसिद्ध्या योगिनिर्माणत्वस्याभावो निश्चितो भवति नान्यथा; अत एवानुमाने जन्मान्तराभ्यास- लोकप्रसिद्ध्यादिकमवश्योपजीव्यम् । सा च श्रुतानुमानप्रज्ञयोर्बीजम्,—इति च ऋतंभराविषयमु- हेतुक के कार्य में ऐसा ही कहना पड़ेगा । दोनों स्थलों में हेतु के द्वारा ही व्यवस्था होगी; अपने हेतु से ही शिंशपा वृक्ष स्वभाव को छोड़ सकती है, धूम में यही दूना कह सकते हैं, योगी की इच्छा से उत्पन्न होनेवाली अग्नि इत्यादि सामग्री धूम नहीं उत्पन्न कर सकती और यह अनुमान भी नहीं बन सकता है । लोक में तो यह होता है कि अग्नि से धूम निकलता है, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं कि— योगी की इच्छा से निर्माण न होने पर दूसरे प्रमाण से ही कार्य निश्चित होता है । इसलिए कार्य हेतु या स्वभाव मूल उत्पत्ति से उत्पन्न होता है ।। ११ ।। इस प्रकार योगी की इच्छा भी सर्वथा ऐसी नहीं होती है । जैसा कि गोबर से वृश्चिक उत्पन्न होता है, उसी प्रकार रस-वीर्यादि से भिन्न वृश्चिक को उत्पन्न कर देते हैं, हमारे कहे हुए हेतु से धूमादि कार्य अग्नि के अनुमान में एवं वृक्षत्व के अनुमान में शिंशपादि स्वभाव हेतु होता है, यदि दूसरे प्रमाण से लोक सिद्धिपूर्वक ही वस्तु का निर्माण हो जाय तो उसमें योगी की इच्छा का अभाव ही रहता है । अन्यथा नहीं होता; इसलिए दूसरे जन्म में लोक प्रसिद्धि के द्वारा किये हुए अभ्यासों के संस्कार का उपभोग अवश्य करना चाहिए । वह श्रुतानुमान और प्रज्ञा का बीज है, इसलिए योगसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' समाहित चित्त की जो प्रज्ञा है वह ऋतम्भरा प्रज्ञा बुद्धि है । उस दशा में वस्तु की यथार्थता को देनेवाली बुद्धि का उदय होता है । इन्द्रियों के साथ अर्थों का सम्बन्ध होकर जो प्रत्यक्ष विषय होता है, उसको माननेवाले दूसरे १. ऋतम्भरा समाधि प्रज्ञा 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' । तस्मिन् समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते तस्या ऋतम्भरेति संज्ञा भवति अन्वर्था च सा सत्यमेव बिभर्ति न च तत्र विपर्यासगन्धोऽप्यस्तीति तथोक्तम्— 'आगमेनानुमानेन तथाभ्यासरसेन च । त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ।।' सा पुनः 'श्रुतानुमान- प्राज्ञभ्यामन्यविषया विशेषार्थविषयत्वात्' श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयं नहि आगमेन शक्यो विशेषोऽभिधातुं कस्मात् नहि विशेषेण कृतसंकेतः शब्दः तथानुमानं सामान्यविषयमेव यत्र प्राप्तिस्तत्र गतिः यत्र न प्राप्तिस्तत्र गतिरपि न भवतीति तस्मात् श्रुतानुमान-विषये विशेषो न कश्चिदस्तीति । न