भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 268

अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४५ वाच पतञ्जलिः । अन्ये च यौक्तिका योगिप्रत्यक्षकल्पप्रत्यक्षसद्भावं समस्तवस्तुग्रहणाय कल्पित- वन्तः । सांव्यवहारिके च प्रमाणे नास्माकं भरः; प्रकृतं हि अस्माकमीश्वरस्वरूपं, तच्च स्वप्रका- शमेवान्यप्रमेयोपरोधेऽपि नोपरुध्यत, — इत्युक्तमसकृत् । ननु स्वभावहेतौ किमनया चिन्तया ?, लोग हैं, योगी प्रत्यक्ष के सदृश्य प्रत्यक्ष प्रमाण को भी सब वस्तु पदार्थों के ग्रहण में कल्पना करते हैं । इस प्रकार छः सन्निकर्षों से प्रत्यक्षादि विषय दृष्टिगत होता है, इस विषय में हम लोगों का कोई भार नहीं है; क्योंकि हमें तो प्रकृत ईश्वर स्वरूप ही मान्य है और वह तो अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित ही रहता है । किसी अन्य प्रमेय से अवरोध होने पर भी नहीं रुकता, ऐसा चास्य विशेषस्या प्रामाणिकस्याभावोऽस्तोति समाधिप्रज्ञातिग्राह्य एव स विशेषो भवति भूतसूक्ष्मगतो वा पुरुषगतो वा, न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोक प्रत्यक्षेण ग्रहणं तस्माच्छु तानुमानप्रज्ञाभ्या- मन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषार्थत्वादिति । यह पातञ्जल योग दर्शन में दिखाया गया है कि उस समाहित चित्त की अवस्था में जो बुद्धि पैदा होती है उसे शास्त्र में ऋतम्भरा नाम से कहा जाता है तथा वह बुद्धि यथार्थ ज्ञानवाली मानी जाती है, एवं सत्य को ही पालन करती है उसमें विपरीत ज्ञान की गन्ध थोड़ी सी भी नहीं मिलेगी अर्थात् अविद्या से इसका कोई लगाव नहीं होता । आगमशास्त्र, अनुमान और ध्यानाभ्यास के बल से उत्पन्न रस द्वारा विचार विमर्श करता हुआ उत्तमयोग की गति को प्राप्त कर लेता है । श्रुतिज्ञान और अनुमानज्ञान से व्यतिरिक्त विषयक वह बुद्धि होती है । इसकी विशेषता है कि यह बुद्धि अर्थ को साक्षात् करने में समर्थ होती है । श्रुतिजन्य ज्ञान सामान्यरूप से तो पदार्थ का ज्ञान करानेवाला ही होता है । श्रुति ज्ञान अर्थात् आगम से यथार्थ स्वरूप को बुद्धि धारण करने में असमर्थ है । क्यों ? विशेषरूप से अर्थ का शब्द के साथ संकेत नहीं हुआ होता है वैसे ही अनुमान भी सामान्य विषयक बन जाता है । जहाँ तक हेतु की प्राप्ति है वहाँ तक ही अनुमान की गति देखी जाती है उससे आगे नहीं हो सकती; क्योंकि हेतु से ही हेतुमान् का बोध होता है । इसलिए श्रुत और अनुमान इन दोनों विषयों में विशेष अर्थ कुछ भी काम नहीं कर सकता है । लौकिक वस्तु के प्रत्यक्ष से सूक्ष्म, आवृत्त [ ढका हुआ ] जो कि अत्यन्त परिश्रम से जानने योग्य आत्मज्ञान का ग्रहण करना कठिन हो है और अनुमान तथा आगम प्रमाण से शून्य विशेष पदार्थ-वस्तु का अभाव भी नहीं दिखता । समाहित बुद्धि के द्वारा निश्चय किया गया अर्थ ही विशेषार्थ माना जाता है फिर वह ज्ञान सूक्ष्मभूतों का ही क्यों न हो अथवा पुरुष स्वरूप का हो । इसीलिए श्रुत और अनुमान की बुद्धि से तो वह बुद्धि दूसरे अर्थ को विषय करनेवाली ही होती है जबकि यह यथार्थता को ग्रहण करती है । १. नियम का ज्ञान सामान्य होता है, धूम और वह्नि के सहचार का प्रत्यक्ष और वह्नि के बिना धूम की स्थिति नहीं पायी जाती है इन दोनों की सहायता से धूम वह्नि का व्याप्य है—ऐसा ज्ञान मन से होता है । जबकि इस विषय में कहा भी गया है— मनश्च सर्वविषयं केन वा नाभ्युपेयते । असंनिहितमप्यर्थमवधारयितुं क्षमम् ॥ मन तो जो असंहित विषय है उसका भी ग्रहण कर लेता है इसलिए उस सर्वविषयक मन को कौन नहीं मानेगा अर्थात् सब को मानना ही पड़ेगा ।