भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११

आह-वृक्षत्वाव्यभिचारिण्याः शिंशपाया उत्पत्तेर्यन्मूलं कारणं तत एव स तन्मात्रानुबन्धी स्वभावो जायते,-इति; ततश्च-'एकसामग्र्यधीनस्य रूपादे रसतो गतिः । हेतुधर्मानुमानेन धूमेन्धन- विकारवत् ।।' इति स्वभावहेतुर्न्यायः । ननु च वृश्चिकादीनां कीटगोमयाद्यनेककारणस्त्वं तावत् दृष्टं, रसवीर्यादिभेदस्तु तत्र,-इत्यन्यदेतत् । तद्योगिजन्यत्वमवह्निकस्यापि धूमस्य सह्यं नाम, स्वभावस्य तु कथं विपर्याससंभावना । न हि नीलं सदेवानीलं योगीच्छया भवति,-इति कश्चित् प्रामाणिकः प्रतीयात् । उच्यते । इह द्विविधो हि स्वभावहेतुरन्तर्लीनकार्यकारणभावस्तद्विपरीतश्च; वह्निमानयं पर्वतो धूमवत्त्वात् इति, अनित्योऽयं कृतकत्वात् इति । तत्र आद्यस्य तावत् कार्यकारणभाव एव मूलम्,-इति किं तत्रोच्यते । अपरस्तु विचार्यते, यदि तावत् कृतकत्वस्य कारणायत्तत्वं नाम स्वभावः कथम् अभवनपरिच्छिन्नभवनस्वभावता नामानित्यत्वं स्वभावः स्यात् ? आभासभेदात् । अभेदे तु आभासस्य हेतुसिद्धावेव साध्यस्य सिद्धत्वात्, यदि परं व्यवहारः साध्यते, तरुरयं वृक्षत्वात्,-इति न्यायेन व्यवहारश्च ज्ञानाभिधानात्मा कार्य एव, तत्रैव नियतिशक्तिरङ्गीकृता हमने अनेक बार कहा भी है । अच्छा तो, इस पर शङ्का होती है कि इसमें स्वभाव ही हेतु है तो अन्य चिन्ताओं से क्या प्रयोजन ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं कि वृक्षत्व युक्त शिंशपा की उत्पत्ति में जो मूल कारण है उसी से शिंशपा मात्र सम्बन्ध रखनेवाला स्वभाव ही उत्पन्न होता है, इस विषय में कहते भी हैं। एक सामग्री के अधीन होनेवाले रूपादि की रस से उत्पत्ति होती है। हेतु धूम के अनुमान द्वारा जैसा कि धूम लकड़ी का विकार है । यही स्वभाव हेतु का न्याय है । पुनः शङ्का करते हैं कि वृश्चिकादि की उत्पत्ति में भी कीट-गोबर आदि बहुत से कारण देखे गये हैं, रस-वीर्यादि का भी भेद वहाँ पर होता है ये सब दूसरी बातें हैं । योगी से धूम उत्पन्न होता है वह बिना अग्नि के भी हो सकता है, किन्तु स्वभाव का परिवर्तन नहीं होता । योगी की इच्छा से नील पदार्थ है वह अनील नहीं हो सकता है; कोई भी प्रामाणिक व्यक्ति इस पर विश्वास नहीं रखेगा । इसका उत्तर देते हैं कि यहाँ पर स्वभाव के भी दो हेतु होते हैं; एक अन्तर्लीन कार्य- कारणभाव और दूसरा उसके विरुद्ध जैसा कि यह पर्वत वह्निवाला है धूमवाला होने से, यह अनित्य है उत्पत्ति शील होने के कारण । उसमें आद्य कार्य-कारणभाव ही मूल है-वहाँ फिर क्या कहना । दूसरे पर विचार करते हैं, यदि कृतकत्व कारण के अधीन है तो वही स्वभाव हुआ नहीं होने का स्वभाववाला वह होने को स्वभाववाला अनित्य कैसे होगा ? क्योंकि दोनों में आभास का भेद है । अभेद में तो आभास का हेतु सिद्ध ही रहता है; क्योंकि सिद्ध में ही साध्य की सिद्धि होती है, यदि दूसरा व्यापार सिद्ध करना हो, तो यह वृक्ष है, वृक्षत्व होने के कारण । इस न्याय १. अभावेन हि धर्मेण तद्वत्ता धर्मिणः कथम् । अभावग्रहवेलायां धर्मिणोऽनुपलम्भनात् ॥ अभावरूप धर्म से धर्मी को अभाववाला नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि अभाव के ज्ञान काल में धर्मी का ज्ञान नहीं होता है अर्थात् अभाव ज्ञानकाल में धर्मी का ज्ञान नहीं होने के कारण यह अभाववान् है ऐसा कहना असंभव हो जाता है । २. साध्या नुमिति वेलायां न चास्ति नियमग्रहः । नियमग्रहकाले च न साध्यमनुमी तया॥