भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४७

भवतापि । तस्मात् सर्वेषु स्वभावहेतुष्वाभासभेदं विना व्यवहारमात्रसाधनमेव, हेत्वाभासमयत्वा- देवानधिको हि तत्र साध्याभासो, व्यावृत्तोनामेषैव वार्ता, सामान्यानामियमैव सरणिः। तस्मात् नियतिशक्त्यायत्तः शिंशपाभासवृक्षाभासयोः पूर्बनीत्या सामानाधिकरण्याभासो हेतुबलात् । ततः स्वभावोऽयं हेतुहेतुमद्भावमूल एव, तत एव सामान्येनेदमुक्तं द्रष्टव्यं—सर्वः स्वभावहेतुरुत्पत्ति- मूलजः,—इति । आभासा एव च वस्तु,—इति च समर्थितं प्राक् । ततश्च शिंशपायामेकस्यामेव सृज्यमानायां शाखादिपदार्थान्तराणामसृष्टेर्वृक्षाभासस्य सामान्यात्मनः साध्यस्य नामापि नास्ति,— इति संभाव्यत एव । यत्तु तदेकरूपं विशिष्टं वृक्षत्वं तत् खलु शिंशपात्वमेव तच्च सिद्धम्,—इति से व्यवहार भी ज्ञानाभिधानरूप होकर कार्य के रूप में ही सिद्ध हो जायेगा, वहाँ पर ही नियति- शक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा, यह तो आप को भी अभीष्ट है । इसलिए सभी स्वभाव हेतुओं में आभास भेद के बिना ही व्यवहार मात्र के लिए साधन माना जाता है, [ अभेद में भी आभास का व्यवहार मात्र के लिए ही भेद का व्यपदेश किया हुआ होता है ] हेत्वाभासमय होने के कारण साध्याभास कोई अधिक नहीं होता, विशेष पदार्थों में अभेद भासित होने पर भी भेद की कल्पना व्यवहार साधनार्थ मात्र होतो है, सामान्य पदार्थों के लिए भी यही मार्ग है । इसलिए नियति शक्ति के अधीन ही शिंशपाभास और वृक्षाभास इन्हीं दोनों की पूर्व नीति के अनुसार सामानाधिकरण्य आभास हेतु के बल से होता है। इसलिए यह स्वभाव हेतुहेतु- मद्भावमूलक ही होता है। इसी कारण सामान्यरूप से कहे हुए को ही देखना चाहिए कि स्वभाव हेतु उत्पत्तिपूर्वक ही होता है, आभास पदार्थ ही वस्तु हैं। इसका हमने पूर्व में ही समर्थन कर दिया है इससे जब एक शिंशपा में बनायी जायेगी तब तो शाखा प्रभृति अन्य पदार्थों और वृक्षाभास में सामान्यतः साध्य का नाम भी नहीं रहता है, यह ठीक ही है। एक रूप विशिष्ट वृक्ष तेन गृहीतपूर्वः सन्निदानों स्मृतिगोचरः । नियमः प्रतिप्रत्यङ्गं तथावगतिदर्शनात् ॥ साध्य [ वह्निरूप ] की अनुमिति काल में व्याप्ति ज्ञान [ यत्र-यत्र धूमस्तत्र-तत्र वह्निरिति साहचर्य-नियमो व्याप्तिः ] के काल में अनुमान नहीं होता है । इसी कारण पहले से ग्रहण की हुई होने पर अभी इस समय स्मर्यमाण विषयक जो व्याप्ति है वही अनुमिति में कारण होती है; क्योंकि वैसी अवगति देखी भी जाती है । १. इस विषय में नैयायिकों ने कहा है— तस्मिन्सत्येव भवनं न विना भवनं ततः । अयमेवाविनाभावो नियमः सहचारिता ॥ किं कुतो नियमोऽस्यास्मिन्निति चेन्नैवमुत्तरम् । तदात्मतादिपक्षे तु नैष प्रश्नो निवर्तते ॥ ज्वलनाज्जायते धूमो न जलादिति का गति । तर्कस्य यावान् विषयः स तावति निरूप्यते ॥ वस्तुस्वभावभेदे तु न तस्य प्रभविष्णुता । अयं च विषयो युक्तं यदुक्तं नियमाद्विना ॥ नार्थादर्थान्तरे ज्ञानमतस्तस्य प्रकल्पनम् ।