ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१२ न साध्यम् । कारणायत्तमिदम्,–इत्याभासेऽपि न स्यादनित्यताभासः। एवमर्थक्रियाकारित्वा- भावेऽपि क्षणिकत्वाभासाभावः,–इति नियत्यपेक्षयैव सर्वे स्वभावहेतवो नान्यथा,–इत्येकान्त एषः ॥ ११ ॥ नन्वाभासवस्तुत्ववादेऽनाभातस्य अग्नेरवस्तुत्वम्,–इत्यनाभातेन कथं धूमो जन्यते, ततश्च धूमादग्नेः कारणस्य कथमनुमानम् ? इत्याशङ्क्य समर्थयितुमाह– भूयस्तत्तत्प्रमात्रेकवह्नयाभासादितो भवेत् । परोक्षादप्यधिपतेर्धूमाभासादि नूतनम् ॥ १२ ॥ कार्यमव्यभिचार्यस्य लिङ्गम्············ का स्वरूप है, वह तो सिद्ध शिंशपात्व ही है, किन्तु वह साध्य नहीं है । यह तो कारण के अधीन रहता है, इस प्रकार आभास में भी अनित्यता का आभास नहीं होता । एवं अक्षणिकवादी तार्किकों के मत में नियति-शक्ति का समर्थन कर क्षणिकवादी के मत में भी प्रसंग वशात् समर्थन करते हैं कि अर्थक्रियाकारिता के न रहने पर भी क्षणिकत्व के आभास का अभाव ही रहेगा । सभी स्वभावों के हेतु नियति-शक्ति की अपेक्षा से ही होते हैं अन्यथा नहीं होते, यह एक दृढ पक्ष है ॥ ११ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जब आभास ही वस्तु है तो इस पक्ष में जो अनाभातरूप अग्नि है वह भी अवस्तु हो जायेगी । अत एव अनाभात अग्नि से कैसे धूम उत्पन्न होंगे और इसके बाद धूम से अग्नि का अनुमान कैसे करोगे ? ऐसी आशङ्का कर समर्थन के लिए अब कहते हैं— उन-उन प्रमाताओं के द्वारा एक ही वह्नि के आभास से धूम का अनुमान भूयो व्याप्ति के इसलिए यह सिद्ध होता है— पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः । परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥ उसके रहने पर ही यह उत्पन्न होता है, न रहने पर नहीं होगा इसी का नाम अविनाभाव नियम है जैसे मिट्टी के बिना घट का निर्माण नहीं हो सकता । इसमें हेतु क्या है—कारण के रहने पर ही कार्य का उत्पन्न होना और न रहने पर नहीं होना यही नियम है । यह क्यों है ? इस आशङ्का का उत्तर देते हैं—इस नियम में वस्तु अपना स्वभाव छोड़कर कोई दूसरा कारण नहीं बन जाती है । आप जो तादात्म्य को इस नियम का कारण मानते हैं । वह ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष में अग्नि से धूम का उत्पन्न होना तो संगत भी है किन्तु जल से धूम का उत्पन्न होना कहीं नहीं देखा जाता है, क्यों ? इसका कोई समाधान नहीं हो सकता है । जितना तर्क का विषय होता है उतना ही किया जा सकता है इससे आगे तर्क न करना ही अच्छा होता है; वस्तु के स्वभाव भिन्न-भिन्न होते हैं यही मात्र तर्क का विषय नहीं है, इसमें फिर तर्क कुण्ठित हो जायेगा—यह तर्क का विषय नहीं है; अतः इस पर तर्क का प्रभुत्व नहीं हो सकता । उस नियम की कल्पना तो इसलिए की जाती है कि नियम के बिना दूसरे पदार्थ से किसी अन्य पदार्थ का ज्ञान अयुक्त होता है अतः निष्कर्ष यह है कि पञ्चलक्षणवाले हेतु से गृहीत नियम के द्वारा ही स्मृति होने पर परोक्ष वस्तुओं का जो ज्ञान होता है उसको अनुमान कहते हैं ।