ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोऽप्याभासो नूतनोऽपूर्वो न तु धूमजधूमवदप्रत्यग्रः । स च अधिपतेरसंचेत्यमानात् वह्नचाभासात् बीजाभासादेव वा भवेत्, तत एव जनितुं शक्नोति नान्यतः । शकि लिङ् । स चाभासस्तेषु तेषु प्रमातृष्वेक एव, अनेकत्वे न तु युज्यते एवैतदित्याशयः । यतश्च स एकोऽधिपतिश्च वह्नचाभासो धूमकारणं, ततो धूमाभासोऽस्यैवाग्न्याभासस्याव्यभिचरितं कार्यं लिङ्गं योगिकृतत्वाभावे निश्चिते सति,—इति तस्मात् कार्यात् सोऽनुमीयते यतः परोक्षोऽसावधिपतित्वादेव ॥ १२ ॥ नन्वेवं गोपालघटिकान्तरालचिरोषितनिर्गतादपि धूमाभासात् स्यात् वह्नयाभासानु- मानम्,—इत्याशङ्क्याह— --------------------------------------------- 'अन्यप्रमातृगात् । तदाभासस्तदाभासादेव त्वधिपतेः परः ॥ १३ ॥ परो नूतनादन्यो यो धूमाभासः स धूमाभासादेव प्रमात्रन्तरवर्तिनोऽधिपतिरूपात् परो- क्षात्,—इति तथाभूतात् धूमाभासात् कथमकारणभूतो वह्न्याभासोऽनुमीयताम् ? इत्यभिप्राय- शेषः । कुशलाश्च लक्ष्यन्त्येव विवेकम्, अस्यार्थस्यानुमानिकबहुतरव्यवहारोपयोगिनो यत्नेन व्युत्पत्तिः कार्या,—इत्याशयेन नूतनमिति यदेव सूचितं तदेव व्यवच्छेदद्वारेण स्फुटीकृतम् ॥ १३ ॥ ननु चैवं धूमाभासो वह्न्याभासात्,—इत्यङ्गीकृतं चेत् तर्हि चेतनस्यैव कर्तृत्वम्,—इति यदुक्तं तत् कथं ? तथाहि 'बीजे सत्यङ्कुरो भवति' इति यदेतत् दृष्टं धूमाग्निवदेव तत् कथम- अपूर्व नूतन ही है । धूम से उत्पन्न हुआ धूम के जैसा नया नहीं होता और वह नहीं जाना हुआ प्रत्यक्ष से होनेवाले वह्नयाभास या बीजाभास से ही होता है । इसलिए वह उत्पन्न हो सकता है, दूसरे किसी से नहीं, यहाँ पर शक्त अर्थ में 'लिङ्' लकार है । वह आभास उन उन प्रमाताओं में एक सा ही होता है, अनेक में हो ही नहीं सकता—यही इसका आशय है । क्योंकि एक ही प्रत्यक्ष वह्नयाभास का अव्यभिचरित कार्य है जो कि योगी से किये गये अभाव के निश्चय होने पर कारण बन जाता है, इसलिए कार्य से उसका अनुमान होता है, परोक्ष का अधिपति होने के कारण ही वह परोक्ष माना जाता है ॥ १२ ॥ अच्छा तो, गोपाल ( अहिर ) के घड़े में बहुत देर से रहनेवाले धूम के आभास से वह्नयाभास का अवश्य अनुमान होना चाहिए, इस आशङ्का का उत्तर देते हैं कि— अन्य प्रमाता में हुए उसके आभास से हो उसका आभास होता है इसलिए वह एक प्रत्यक्ष से भिन्न होता है ॥ १३ ॥ नूतन से भिन्न जो धूमाभास है वह धूमाभास से ही दूसरे प्रमाता में होनेवाले परोक्षरूप प्रत्यक्ष से वैसे ही धूमाभास से अकारणभूत वह्नयाभास कैसे अनुमित हो सकता है ? इसका यही शेष आशय है । चतुर विवेकी जन ही इसको भली-भाँति समझ सकते हैं । इस कार्य-कारण भावरूप पदार्थ के अनुमान सम्बन्धी बहुत व्यवहार के उपयोगी प्रयत्न से व्युत्पत्ति करनी चाहिए, इस बात को 'आशयेन नूतनम्' इस वाक्य से सूचित किया गया था, उसे व्यवच्छेद के द्वारा स्पष्ट कर दिया ॥ १३ ॥ अब शङ्का होती है कि वह्नयाभास से धूमाभास होता है, यह बात आप स्वीकार करते हो, तो चेतन ही कर्ता होता है । यह कथन कैसे सिद्ध हो सकता है ? देखिये ! बीज के रहने पर ही अङ्कुर अङ्कुरित होता है—जैसे यह भी अग्नि से धूम होता है, उसी प्रकार बीज से अङ्कुर होता