ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५१ नादरास्पदम् ? इत्याशङ्क्याह— अस्मिन् सतीदमस्तोति कार्यकारणतापि या । साप्यपेक्षाविहीनानां जडानां नोपपद्यते ॥ १४ ॥ एक एव भावस्तावत् न कार्यकारणभावः, भावद्वयमपि च न युगपद्भावि कार्यकारणरूपं घटपटवत्, क्रमभाव्यपि नानियतक्रमकं नीलपीतादिज्ञानवत्, नियतक्रमिकत्वेऽपि न पूर्वभावि कार्यमुत्तरकालभावि च कारणम्, —इत्येवं नियतपूर्वभावं कारणं नियतपरभावं च कार्यम्, — इति परस्य तावन्मतम् । तत्र स्वरूपादनधिका चेत् पूर्वता परता च तत् भावद्वयमात्रं, स च स च, —इति चार्थोऽपि वा न कश्चित् तस्याप्यपेक्षारूपत्वात् स स इत्येव हि स्यात् । अथ पूर्वता नाम प्रयोजकसत्ताकत्वं परता च प्रयोज्यसत्ताकत्वं तर्हि बीजस्याङ्कुरप्रयोक्त्री सत्ता अङ्कुर- विश्रान्ता अङ्कुरान्तर्भावमात्मन्यानयति, अङ्कुराभावे प्रयोक्तृत्वमात्रं स्यात् तदपि न किञ्चित् अन्यापेक्षत्वात् तस्य । एवं प्रयोज्यसत्ताकेऽपि वक्तव्यम्, —न केवलं भावमात्रमेव कार्यकारणता इत्यादयः पक्षा नोपपन्ना यावत् 'अस्मिन् सति' इति भूतविभक्त्या सप्तम्या प्रयोजकसत्ताकत्वम्, 'इदमस्ति' इति भाव्यमानविभक्त्या प्रयोज्यसत्ताकत्वम्, —इत्येवंरूपापि या कार्यकारणता सापि नोपपद्यते प्रमाणेन न संभवति जडानाम्, अन्योन्यापेक्षा हि अत्र जीवितं सा च जडानां न संभवति ॥ १४ ॥ है, तब तो फिर जड-पदार्थों का भी कार्य-कारणभाव सिद्ध होगा ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— इसके रहने पर यह होता है ऐसी जो कार्य-कारणभाव की व्याप्ति है, वह भी तो अपेक्षा विहीन जड-भावों की नहीं हो सकती, उसमें भी चेतन की आकांक्षा रहती है ॥ १४ ॥ एक भाव-पदार्थ में कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता है और दो भाव-पदार्थों का भी एक ही काल में कार्य-कारणरूप घट-पट के जैसा नहीं हो सकता है; क्योंकि क्रम से होनेवाला पदार्थ अनियत क्रमवाले नील-पीतादि ज्ञान के जैसा नहीं हो सकता है और नियत क्रम को मानने पर भी पूर्व में होनेवाले कार्य के बाद होनेवाला कारण और पर में कार्य मानते हैं—यही सौगतों का मत है । यदि स्व-स्वरूप मात्र ही पूर्वता और परता क्रिया है तो भाव द्वय मात्र हुआ और 'वह' और वह ऐसा कहना भी तो कोई अर्थ नहीं रखता है; क्योंकि वह वही वस्तु हुई । पूर्वता का नाम है यहाँ पर प्रयोजक सत्तावाला और परता का अर्थ यह होता है कि प्रयोज्य सत्तावाला, फिर उससे तो बीज सत्ता अङ्कुर की प्रयोजिका होगी एवं अङ्कुर में उसका अन्तर्भाव होगा और वह अङ्कुर में ही अपना अन्तर्भाव करेगी, अङ्कुर के अभाव में प्रयोक्ता का होना कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि अन्य वस्तु प्रयोक्ता की अपेक्षा रखती है वैसा ही प्रयोज्य सत्तावाले में भी कहना होगा । इसलिए मात्र भाव में ही कार्य-कारणभाव नहीं होता, किन्तु यह पक्ष सिद्धि ही नहीं है अपि तु 'अस्मिन् सति' इसमें भूत काल की सप्तमी विभक्ति प्रयोजक सत्तावाली भी है, 'इदमस्ति' यह प्रथमा विभक्ति भाव्यमान विभक्ति के द्वारा प्रयोज्य सत्तावाली होती है । इस प्रकार का भी कार्य- कारणभाव नहीं बन सकता है; क्योंकि जड-भावों की चेतन के बिना अपेक्षा रखे सत्ता नहीं हो सकती और परस्पर अपेक्षा ही यहाँ पर कार्य-कारणभाव का जीवन है किन्तु यह जड में संभव नहीं है ॥ १४ ॥