भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२५२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१५-१६ कथम् ? इति चेत् उच्यते— न हि स्वात्मैकनिष्ठानामनुसन्धानवर्जिनाम् । सदसत्तापदेऽप्येष सप्तम्यर्थः प्रकल्प्यते ॥ १५ ॥ जडाः किलान्योन्यरूपमनुसन्धातुमप्रभविष्णवः, अन्योन्यानुसन्धानरूपत्वं जडविरुद्धेन चैतन्येन व्याप्तम्, अनुसन्धानं चापेक्षा चैतन्यस्वरूपमेव, अन्यत्र तु सोपचरिता; अतोऽनुसन्धान- विहोनत्वाज्जडो भावः स्वात्ममात्रविश्रान्तिसन्तोषसङ्कुचितशरीरः कथं परत्र प्रसरेत् । ततश्च यदि बीजं सद्दङ्कुरोऽसन् अथापि उभयमपि वा सत् यदि वासत्, अथापि एकं सोपाख्यमन्यत् निरुपाख्यम्, द्वयमपि वा सोपाख्यं निरुपाख्यं वा, तथापि प्रातिपदिकार्थमात्रं धर्मान्तरेण समुच्चया- दिनाप्यनालिङ्गितमवतिष्ठते, तस्य समस्तस्यापेक्षारूपत्वेन चैतन्यविश्रान्तत्वात् ॥ १५ ॥ यस्मादचेतनेषु नापेक्षोपपद्यते— अत एव विभक्त्यर्थः प्रमात्रेकसमाश्रयः । क्रियाकारकभावाख्यो युक्तो भावसमन्वयः ॥ १६ ॥ सप्तमीरूपाया विभक्तेरन्यस्या अपि वा योऽर्थः क्रियाकारकभाव लक्षणः स एव तावद्भावानां समन्वयो नान्यः शुष्कः कश्चित् । स च यदि स्वतन्त्रे चिद्रूपे भावद्वयं विश्राम्यति तदोपपद्यते, यह कैसे हो सकता है ? इसका उत्तर दिया जाता है। हेतु विषयक अपेक्षा को छोड़कर अर्थात् अनुसन्धान से वर्जित अपने में ही रहनेवाले पदार्थों की सत्ता और असत्ता पदों में भी सप्तमी विभक्ति का अर्थ कल्पित होता है ॥ १५ ॥ जड-पदार्थ वर्ग आपस में परस्पर अनुसंधान करने में समर्थ नहीं होते; क्योंकि परस्पर अनुसन्धान करना तो जडभाव के विरुद्ध चैतन्य के साथ व्याप्य-व्यापकभाव से व्याप्ति होती है और अनुसन्धान तो अपेक्षा करनेवाले चैतन्य का स्वरूप ही है, अन्यत्र घटादि में तो उपचार से जा सकता है, इसलिए अनुसन्धान से विहीन होने के कारण जडभाव अपने आप में विश्रान्त होकर संकुचित शरीरवाला होता है । अत एव वह चैतन्य में कैसे फैल सकता है ? और इससे यदि बीज सद्रूप अङ्कुर न भी हो फिर भी सोपाख्य [ प्रत्यक्षरूप से जानने योग्य ] दूसरा निरुपाख्य [ परोक्ष रूप से ज्ञेय होने से अकथनीय ] इन्हीं दोनों रूपों में प्रातिपदिकार्थ मात्र ही रहता है । दूसरे धर्मों से समुच्चयादि के कारण अनालिङ्ग असंबद्ध ही रहता है, क्योंकि वे सभी अपेक्षारूप होने से चैतन्य में विश्रान्त रहते हैं ॥ १५ ॥ जिस कारण से सौगतों की दृष्टि में कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता; किन्तु हमारे शैव [ अद्वैत ] वेदान्त दर्शन में उसको सिद्ध करते हैं— जड-भावों में अपेक्षा न रहने से एकमात्र प्रमाता के अधीन विभक्ति का अर्थ रहता है। भावों का समन्वय क्रियाकारकभाव कहलाता है—यह युक्त भी है ॥ १६ ॥ सप्तमी विभक्ति का यह दूसरी विभक्तियों का जो क्रियाकारकभावरूप अर्थ होता है, वही भाव-पदार्थों का समन्वय है, उससे कोई भिन्न शुष्क अर्थ नहीं है । वह यदि स्वतन्त्र चिद्रूप में भावद्वय विश्राम लेता है, तब तो घट सकता है, नहीं तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है । जैसा