भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-४, का.-१७] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५३ अन्यथा तु न कथंचित् । तथा हि विकल्पेनापि असौ व्यवह्रियमाणो न वस्तुनिष्ठतयोपपद्यते, वस्त्वनुसरणप्राणो हि विकल्पोऽनुभवानुसारितयैव भवति, सा चेह नास्ति वस्तुप्रभवत्वेन, वस्त्वनुसारि हि अनुभवो, वस्तु च स्वात्मनिष्ठम्,—इत्युक्तम्। तस्मात् बीजे सति अङ्कुरो, वह्नौ सति धूमः,—इति च स्वतन्त्रचिद्रूपप्रमातृविश्रान्तत्वे सर्वमेतद्युज्यते नान्यथा, इति ॥ १६ ॥ ननु प्रयोज्यप्रयोजकसत्ताकत्वलक्षणापेक्षा यदि स्वात्मैकनिष्ठत्वे नोपपद्यते, तर्हि कार्यकारण- योस्तादात्म्यवादिनां सांख्यानां मते सा सम्भवत्येव, तत् किं चैतन्यविजृम्भात्मककर्तृवादसमर्थनेन ? इत्याशङ्क्याह— परस्परस्वभावत्वे कार्यकारणयोरपि । एकत्वमेव भेदे हि नैवान्योन्यस्वरूपता ॥ १७ ॥ कि विकल्प से भी यह क्रियाकारकभाव व्यवहार में आता हुआ वस्तुनिष्ठ नहीं होता; क्योंकि विकल्प तो वस्तु से अनुप्राणित रहता है । इसलिए विकल्प अनुभव के अनुसार ही होता है और वह अनुभव अनुसारिता वस्तु में उत्पन्न होने के कारण यहाँ नहीं है; क्योंकि वस्तु के अनुसार होनेवाला अनुभव होता है और वस्तु अपने में ही रहती है—ऐसा हमने कहा है । इसलिए बीज के रहने पर अङ्कुर होता है और वह्नि के रहने पर धूम होता है, यह सब स्वतन्त्र चेतन के प्रमाता मानने पर संघटित हो सकता है, नहीं तो, नहीं हो सकता ॥ १६ ॥ अच्छा तो, प्रयोज्य एवं प्रयोजक सत्तारूप लक्षण को अपेक्षा यदि बीज अङ्कुरादि को अपने में ही रहने पर नहीं बन सकता है, तो कार्य-कारणभाव का तादात्म्य माननेवाले सांख्यों के सिद्धान्त में तो हो सकता है । इससे फिर चैतन्य के ऊपर विश्वास रखनेवाले कर्तृत्ववाद का समर्थन करने से क्या प्रयोजन ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— कार्य-कारणभाव में भी परस्पर स्वभावरूपता होने पर भी एकता ही रहती है; भेद रहने पर परस्पर स्वरूपता नहीं रहती है ॥ १७ ॥ १. सांख्य लोग सत् से सत् की उत्पत्ति मानते हैं इसलिए कारण के व्यापार से पूर्व कार्य को सत् दिखाया है इसको सिद्ध करने के लिए पांच हेतु देते हैं— असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ 'असदकरणात्' असत् कार्य का कोई भी कारण नहीं होता है जैसे आकाश-कुसुम, वन्ध्यापुत्र आदि तथा संसार में असत् कार्य का कोई कारण भी देखने में नहीं आता है अर्थात् कारण के व्यापार के बाद में कार्य को किस प्रकार सत् माना जाता है उसी प्रकार उसके पूर्व भी कार्य सत् ही रहता है। जैसे तिलरूप कारण के भीतर तैलरूप कार्य विद्यमान रहता हुआ भी तिलरूप कारण के पीसनारूप व्यापार की आवश्यकता रहती है । 'उपादानग्रहणात्' अर्थात् उपादान-कारण का ग्रहण अर्थात् कार्य के साथ उसका सम्बन्ध होने के कारण कार्य सत् ही है । जैसे तैलरूप कार्य से सम्बद्ध रखता हुआ भी तिलरूप कारण अपने तैलरूप कार्य का उत्पादक होता है । असत् कार्य का सम्बन्ध कभी भी कारण के साथ हो नहीं सकता है इसलिए उत्पत्ति के पूर्व भी कार्य को सत् ही मानना चाहिए । 'सर्वसंभवाभावात्' अर्थात् सभी कार्यों की उत्पत्ति सभी कारणों से नहीं होती है, अपि तु