ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१८ यदि बीजस्याङ्कुरः स्वभावस्तर्हि अङ्कुर एव न बीजं स्यात् किञ्चित् विपर्ययो वा स्यात्, — इति किं कारणं किं वा कार्यम्; अथ अन्यद्बीजमङ्कुरोऽन्यः, तर्हि न परस्परात्मकत्वं, भेदाभेदौ हि एकदैकविषयौ विरुद्धावेव ॥ १७ ॥ नन्वेवमपि बीजमङ्कुरादिविचित्रमवभातं दीर्घदीर्घपरामर्शशालिभिः स्रोतोवदविच्छिन्नस्व- रूपमेव निर्बाधं प्रत्यवमृश्यत । तथा च क्व गतं बीजम्, —इति प्रश्ने वक्तारो भवन्ति, न कुत्रचित् यदि बीज का अङ्कुर ही स्वभाव है, तब तो अङ्कुर ही मानना चाहिए फिर बीज कुछ भी नहीं हुआ—या तो फिर बीज को ही मान ला; अङ्कुर की क्या आवश्यकता है ? इसलिए न तो कोई कारण है और न कोई कार्य ही है। यदि बीज अन्य है और अङ्कुर अन्य है, तब तो परस्पर एकता ही सिद्ध नहीं होती है, भेद और अभेद ये दोनों एक काल में एक विषय में नहीं हो सकते; क्योंकि इन दोनों की आपस में विरुद्ध स्वभावता है। अन्धकार और प्रकाश के समान ॥ १७ ॥ शङ्का करते हैं कि एक ही वस्तु क्रम की विचित्रता से भिन्न-भिन्न हो जाती है। वह बीज-अङ्कुरादि की विचित्रता से अवभासित होकर दीर्घ-दीर्घ परामर्शों से शोभनेवाली धारा के समान अविच्छिन्नरूप से निर्बाध परामृष्ट हुआ करती है। तो फिर बीज कहाँ चला गया, ऐसा कारणपूर्वक ही कार्य की उत्पत्ति देखी गयी है, कार्य का सम्बन्ध जिस कारण के साथ रहता है उसी से कार्य होता है। ‘शक्तस्य शक्यकरणात्’अर्थात् जो कारण जिस कार्य के उत्पादन करने में समर्थ होता है वही शक्य कहलाता है जैसे घटात्मक कार्य के उत्पादन में शक्त मिट्टीरूप कारण ही अपने घटात्मक शक्य कार्य का कारण होता देखा जाता है। सर्वथा यदि उसे असत् मानते हो तो कारण निरूपित-शक्ति कार्य में कैसे रहेगी, इसलिए भी उत्पत्ति के पूर्व कार्य सत् था । ‘कारण भावाच्च’ अर्थात् घटरूप कार्य के साथ मिट्टीरूप कारण का तादात्म्य रहता है, इसलिए कार्य-कारणभाव की अभिन्नता रहने से कार्य उत्पत्ति के पूर्व में सद्रूप में अवस्थित था; क्योंकि इन दोनों की परस्पर अभेदता सिद्ध ही है। जैसे कि पशु से पशु की ही उत्पत्ति देखी जाती है एवं तण्डुल से तण्डुलों की ही उत्पत्ति होती है; इसलिए जब आपका कारण सत् हैं तो कार्य भी स्वयं सत् हो ही जाता है एवं प्रकाश को दिखाने के लिए दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं समझी जाती, वह तो स्वयं सिद्ध ही है। असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः । असंबद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥ यदि कार्य असत् है तो सत् कारण से उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता, और असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति मानने पर व्यवस्था ही नहीं बनेगी अर्थात् तन्तुओं से पट ही होता है घट नहीं होता, क्यों ? ऐसे प्रश्नों के उत्तर में समाधान यही है कि अनर्गल बकनेवालों की बात ही न सुनी जाये । निरात्मकत्वात् सर्वेषामसतामविशिष्टता । विशेषणं च भिन्नं ते सत्त्वमभ्युपगम्यताम् ॥ यदि घट कपालात्मक नहीं है और ऐसे घट की उत्पत्ति कपालों से देखी जाती है, तो केवल घट की ही क्यों ? पट की भी उत्पत्ति होनी चाहिए, जबकि अकपालरूपता तो दोनों की समान ही है; इसलिए ऐसी आपत्ति न हो इसके लिए कार्य को कारणात्मना प्रथमतः ही विद्यमान मानना चाहिए ।