ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५५ गतमङ्कुरात्मना वर्तते, अङ्कुरीभूतमयमङ्कुरस्तत्, — इत्येवं प्रधानं महदादिधरान्तीभूतं यावद्वितती- भूतमन्तस्सर्गप्रलयपरस्परात्मतां प्राप्तम्, — इति विततग्राहिणी प्रतीतिः; भागाभिनिवेशवशात् तु कार्यकारणतापरिकल्पनं तस्यैव भावस्य विशसनप्रायम्, — इत्याशङ्क्याह— एकात्मनो विभेदश्च क्रिया कालक्रमानुगा । तथा स्यात्कर्तृतैवैवं तथापरिणमत्तया ॥ १८ ॥ इह दीर्घदर्शिना प्रत्यक्षानुमानागमान्यतमप्रमाणमूलां प्रत्यभिज्ञामाश्रित्य तदेवेदं सुख- दुःखमोहसाम्यमनन्तप्रकारवैषम्यावलम्बनेन विश्वीभूतम्, — इति समर्थ्यते । तत्र प्रत्यभिज्ञानबलेन यदेकात्मकमेकस्वभावं तस्य यो भेदोऽन्यान्यरूपता इयमेव सा क्रियोच्यते, यतः काललक्षणेन क्रमेणानुगता, ते हि अन्यान्यस्वभावा युगपत् न भान्ति, पूर्वापरीभूतरूपतैव च क्रियोच्यते; यत एवं क्रिया 'तथा' इति तेन प्रकारेण प्रधानादेः क्रियाविशेषलक्षणेन कर्तृतैव स्यात्, न तु शुष्कं कारणतामात्रं, यतो हेतोः 'तथा' इति तेन तेन महदादिप्रकारेण सततमेव क्रमिकां तथाभासन- रूपां परिणामलक्षणां क्रियामाविशतः परिणमत्ता किंचिद्रूपं परिवर्ज्य त्यक्त्वा व्यावर्य्यमनुवर्त- यितव्यं च व्यवस्थाप्य निवर्त्यमानतृतीयरूपप्रह्वता प्रधानादेस्तया हेतुभूतया ॥ १८ ॥ प्रश्न करने पर उत्तर न देनेवाला कहता है कि कहीं पर भी नहीं चला गया है। वह तो अङ्कुररूप में परिणित हो गया है। जब यही बीज अङ्कुरित हो जाता है तब उसको अङ्कुर शब्द से कहा जाता है। इस प्रकार एक प्रकृति जिसे प्रधान कहते हैं वह महत्तत्त्व, पञ्चतन्मात्र, पञ्चमहाभूत होता हुआ पृथ्वी तक जितने भी इस संसार में प्राणी [ सर्ग ] हैं सृष्टि-स्थिति-प्रलयरूप में रहने- वाला संसार बन जाता है। यही विस्तार ग्राहिणी प्रतीति कहलाती है, इसी में विभाग की कल्पना करने पर उसी में कार्य-कारणभाव की कल्पना होती है उसी भाव की विलीन अवस्था को ही कहा जाता है। इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं— एक पदार्थ का भिन्न-भिन्नरूप होना काल के क्रम से होनेवाली क्रिया तो है और कर्तृता भी उसी के परिणाम स्वरूप हो जाने से मानी जाती है ॥ १८ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमशास्त्र के द्वारा इन प्रमाणों में से किसी एक प्रमाण को मूल में रख कर पहचान होती है। उसके आश्रय से वही यह वस्तु है—ऐसा कह कर सुख, दुःख एवं मोहादि अनन्त प्रकार के अवलम्बन से संसार बन जाता है, इसका महर्षि कपिलमुनि ने समर्थन किया है। इसी कारण इन लोगों के दर्शन को परिणामवादी दर्शन कहा जाता है। क्रिया का निर्वचन करते हैं कि क्रिया क्या वस्तु है ? उसमें प्रत्यभिज्ञान के बल से जो एकरूप, एक स्वभाव- वाला पदार्थ भासता है उसका जो दूसरे-दूसरे रूपों में बोध होता है, वही एकप्रकार से क्रिया है; क्योंकि वह कालरूप से क्रमशः उसमें व्याप्त रहती है। वे क्रिया-पदार्थ एकरूप में परस्पर नहीं भासते हैं और पूर्वापरीभाव ही तो क्रिया है; जबकि ऐसी क्रिया है तभी तो, उस क्रिया का प्रधान आदि में भी क्रिया के विशेष लक्षण से कर्तृता हो सकती है। केवल शुष्क कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि जिस प्रधान आदि हेतु के द्वारा उन-उन महदादि परिणाम के प्रकार से निरन्तर क्रमरूप से भासित होना, परिणामरूप क्रिया में प्रवेश कर परिणत होना, अपने पूर्वरूप को छोड़कर आगे आनेवाले परिणामरूप को रख कर होनेवाले तृतीयरूप में मिल जाना ही प्रधानादि की हेतुता है ॥ १८ ॥