भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

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२५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१९ ननु प्रधानं परिणामक्रियायां कर्तृरूपमियता समर्थितम्,—इति को दोषो, न हि पुरुष- वदस्याकर्तृत्वमिष्यत ? इत्याशङ्क्याह— न च युक्तं जडस्यैवं भेदाभेदविरोधतः । आभासभेदादेकत्र चिदात्मनि तु युज्यते ॥ १९ ॥ एवमित्यभिन्नरूपस्य धर्मिणः सततप्रवहद्बहुतरधर्मभेदसंभेदस्वातन्त्र्यलक्षणं परिणमनक्रिया- कर्तृत्वं यदुक्तं तत् प्रधानादेर्न युक्तं जडत्वात्, जडो हि नाम परिनिष्ठितस्वभावः प्रमेयपदपतितः स च रूपभेदाद्भिन्नो व्यवस्थापनीयो नीलपीतादिवत्, एकस्वभावत्त्वाच्चाभिन्नो नीलवत्, न तु स एव स्वभावो भिन्नश्चाभिन्नश्च भवितुमर्हति विधिनिषेधयोरेकत्रैकदा विरोधात् । कश्चित् स्वभावो भिन्नः कश्चित् त्वभिन्नः,—इति चेत्, द्वौ तर्हि इमौ स्वभावावेकस्य स्वभावस्य भवेताम्, न चैवं युक्तं—'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना सर्ववस्तुषु ।' इति न्यायात् एवं जडस्य 'इदम्' इति परिनिष्ठिताभासतया सर्वतः परिच्छिन्नरूपत्वेन प्रमेयपदपतितस्य नायं स्वभावभेद एकत्वे सत्युपपद्यते । यत्तु प्रमेयदशापतितं न भवति किं तु चिद्रूपतया प्रकाशपरमार्थरूपं चिदेकस्वभावं स्वच्छं, तत्र भेदाभेदरूपतोपलभ्यते; अनुभवादेव हि स्वच्छस्यादर्शादेरखण्डितस्वस्वभावस्यैव पर्वतमत्तङ्गजादिरूपसहस्रसंभिन्नं वपुरुपपद्यते । न च रजतद्विचन्द्रादि यथा शुक्तिकैकचन्द्रस्वरूप- अच्छा तो, परिणामरूप क्रिया में प्रधान प्रकृति को कर्तारूप से समर्थन किया गया है— इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर देते हैं— इस प्रकार जडभाव का कर्तृत्व नहीं बन सकता है। भेद और अभेद की एक में सत्ता नहीं बन सकती; क्योंकि आभास का भेद होता है, किन्तु चिदात्मा में एकत्र दोनों का आभास हो सकता है ॥ १९ ॥ इस प्रकार अभिन्नरूप धर्मी का (निरन्तर) प्रवाह में बहुत प्रकार के भिन्न-भिन्न धर्म भेदवाले अपने-अपने लक्षण के परिणाम स्वरूप क्रियाओं के कर्ता आपने प्रधान-प्रकृति को बना रखा है, वह नहीं हो सकता है; क्योंकि प्रधान जड है और वह एक निश्चित परिच्छिन्न स्वभाव- वाला कहलाता है एवं अपने स्वरूप के भेद से ही भिन्न-भिन्न नील-पीतादि के समान व्यवस्थित होता है । एक स्वभाववाला होने से अपने आप में अभिन्न ही रहता है, नील के समान । वह एक स्वभाववाला भिन्न और अभिन्न ये दोनों एक बार विधि-निषेध के समान विरोधी होने से एक जगह नहीं रह सकते । किसी का स्वभाव भिन्न होता है तो किसी का अभिन्न होता है, ऐसा यदि कहो तो ये दोनों एक स्वभाव के ही हैं, यह नहीं हो सकता । 'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना सर्ववस्तुषु ।' अर्थात् सभी वस्तुओं में भेद और अभेद की व्यवस्था ही उच्छिन्न हो जायेगी इस न्याय से । इस प्रकार 'इदम्' जड का यह स्वभाव है—ऐसा निश्चित स्वरूप से, सर्वत्र परिच्छिन्न रूप में प्रमेयपदवी को प्राप्त होकर एकता में स्वभावभेद नहीं बन सकता है [ जड अनेक रूप नहीं हो सकता है। प्रमेय स्वरूप होने से नीलादि के जैसा ] जो कि प्रमेय दशा में नहीं आता, वही चेतनरूप होने से प्रमेयार्थ रूप में प्रकाशित होकर स्वच्छ चेतनस्वभावरूप में रहता है। उस दशा में भेद और अभेद ये दोनों रूपों में उपलब्ध होते हैं। जैसे— स्वच्छ दर्पण में पर्वत, हाथी आदि सहस्र प्रकार के रूप प्रतिबिम्बित होते हैं। शुक्तिका में