भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

अ.-२, आ.-४, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५७ तिरोधानेन वर्तते, तथा दर्पणे पर्वतादि; दर्पणस्य हि तथावभासे दर्पणतैव सुतरामुन्मीलति 'निर्मलोऽयमुत्कृष्टोऽयं दर्पण' इत्यभिमानात् । न हि पर्वतो बाह्यस्तत्र संक्रामति स्वदेशत्यागप्रसङ्गा- दस्य, न चास्य पृष्ठेऽसौ भाति दर्पणानवभासप्रसङ्गात्, न च मध्ये निबिडकठिनसंप्रतिघस्वभावस्य तत्रानुप्रवेशसंभावनाभावात्, न पश्चात् तत्रादर्शनात् दूरतयैव च भासनात्, न च तन्निपतनोत्फलित- प्रत्यावृत्ताश्चाक्षुषा मयूखाः पर्वतमेव गृह्णन्ति, बिम्बप्रतिबिम्बयोरुभयोरपि पर्वतपार्श्वगतदर्पणाव- भासेऽवलोकनात् । तस्मात् निर्मलतामाहात्म्यमेतत् यदनन्तावभाससंभेदश्चैकता च । गिरिशिखरो- परिवर्तनैश्चकत्रैव बोधे नगरगतपदार्थसहस्राभासः,–इति चिद्रूपस्यैव कर्तृत्वमुपपन्नम्, अभिन्नस्य भेदावेशसहिष्णुत्वेन क्रियाशक्त्यावेशसंभवात् ॥ १९ ॥ नन्वेतावता विज्ञानमेव ब्रह्मरूपमिमां विश्वरूपतावैचित्रीं परिगृह्णातु किमीश्वरतापरि- कल्पनया ? इत्याशङ्क्याह— वास्तवेऽपि चिदेकत्वे न स्यादाभासभिन्नयोः । चिकीर्षालक्षणैकत्वपरामर्शं विना क्रिया ॥ २० ॥ चिद्रूपस्यैकत्वं यदि वास्तवं भेदः पुनरयमविद्योपप्लवात्,—इत्युच्यते कस्यायमवि- द्योपप्लवः,—इति न संगच्छते । ब्रह्मणो हि विद्यैकरूपस्य कथमविद्यारूपता, न चान्यः कश्चिदस्ति रजत, एक चन्द्रमा में दो चन्द्रमा जैसे एक शुक्तिका और एक चन्द्रमा के स्वरूप को तिरोहित कर प्रतिभासित नहीं होता है । उसी प्रकार दर्पण में पर्वत, शिखर, नदी, हाथी आदि; क्योंकि दर्पण का उसी प्रकार आभास करना अपना स्वभाव ही उन्मीलित होता है । जैसा कि दर्पण के विषय में कहा गया है । 'यह निर्मल दर्पण बहुत ही उत्कृष्ट स्वच्छ है' दर्पण में पर्वत बाहर से जाकर उसमें नहीं बैठता है । ऐसा होता तो बाहर में पर्वत नहीं रहता; क्योंकि पीछे रहता तो दर्पण का ही भान नहीं रहता और न बीच में ही बैठता है । अत एव दर्पण एक पतली सी वस्तु है, उसके बीच में कोई पदार्थ कैसे रह सकेगा और न दर्पण पर पड़े हुए चाक्षुष से टकरा जाने पर लौटी हुई ज्योति पर्वत को ग्रहण करती है; क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्ब ये दोनों तो पर्वत के पास में रखनेवाले दर्पण में ही दिख पड़ते । इसीलिए दर्पण की निर्मलता का माहात्म्य यह है कि अनन्त प्रकार की परछाईं पड़ना और एक-सा मालूम होना । इसी प्रकार पर्वत के शिखर पर रहनेवाले एक ही ज्ञान से नगर में रहनेवाले हजारों पदार्थों का अवभास कर लेना, यह चेतन के बिना नहीं हो सकता । इसलिए सब चेतनरूप कर्ता के ही भेद आवेश को सहनेवाली क्रिया-शक्ति का अभिन्न आवेश ही संभव है ॥ १९ ॥ अच्छा तो, इतने प्रबन्ध से विज्ञानरूप ब्रह्म को इस विश्वरूप की विचित्र-चित्ररूपता करनेवाला मान लिया जाय तो फिर ईश्वर की कल्पना करने की क्या आवश्यकता है ? ऐसी आशङ्का कर उत्तर देते हैं— वास्तव में चेतन के एक होने पर भी भिन्न-भिन्न आभासों का चिकीर्षारूप एकमात्र परामर्श के बिना क्रिया नहीं होगी ॥ २० ॥ यदि चेतनरूप एकात्मा वस्तुतः सत्य है और भेद अविद्या के व्यापार से होता है तो यह अविद्या का उपद्रव किसका है, यह नहीं ठीक से बैठ रहा है, क्योंकि ब्रह्म तो विद्यारूप है । वह ३३