भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२० वस्तुतो जीवादिर्यस्याविद्या भवेत् । अनिर्वाच्येयमविद्या,–इति चेत्, कस्य अनिर्वाच्या,–इति न विद्मः; स्वरूपेण च भाति, न चानिर्वाच्या,–इति किमेतत् ?; युक्त्या नोपपद्यते,–इति चेत् संवेदनतिरस्कारिणी का खलु युक्तिर्नाम अनुपपत्तिश्च भासमानस्य कान्या भविष्यति । सद्‌रूपमेव ब्रह्माभिन्नं चकास्त्यविकल्पेन, विकल्पबलात्तु भेदोऽयम्,–इति चेत्, कस्यायं विकल्पनव्यापारो नाम ? ब्रह्मणश्चेत् अविद्यायोगो न च अन्योऽस्ति; अविकल्पकं च सत्यं विकल्पकमसत्यम्,–इति कुतो विभागो भासमानत्वस्याविशेषात् । भासमानोऽपि भेदो बाधितः,–इति चेत्, अभेदोऽपि एवं भेदभासनेन तस्य बाधात् । विपरीतसंवेदनोदय एव हि बाधो नान्यः कश्चित् । बाधोऽपि च भासमानत्वादेव सन् नान्यतः,–इति भेदोऽपि भासमानः कथमविद्या । भासनमवधीर्य आगमैक- प्रमाणकोऽयमभेदः,–इति चेत् आगमोऽपि भेदात्मक एवावस्तुभूतः प्रमातृप्रमाणप्रमेयविभागश्च,– इति न किंचिदेतत् । तस्मात् वास्तवं चिदेकत्वमभ्युपगम्यापि तस्य कर्तृत्वलक्षणाभिन्नरूपसमा- वेशात्मिका क्रिया नोपपद्यते; परामर्शलक्षणं तु स्वातन्त्र्यं यदि भवति तदोपपद्यते सर्वम् । परामर्शो हि चिकीर्षारूपेच्छा, तस्यां च सर्वमन्तर्भूतं निर्मातव्यमभेदकल्पेनास्ते,–इत्युक्तं ‘स्वामिनश्चात्म- संस्थस्य....।’ (१।५।१०) इत्यत्र । तेन स्वात्मरूपमेव विश्वं सत्यरूपं प्रकाशात्मतापरमार्थमनुटित- अविद्यारूप में कैसे हो सकता है और कोई दूसरा जीवादि तो है नहीं, जिसको कि अविद्या लगे । यह अविद्या अनिर्वचनीयरूपा है । यदि ऐसी बात है तो यह किसके लिए अनिर्वचनीयरूपा है । यह नहीं बता सकते हैं और जो स्वरूप से भासता है, उसे अनिर्वचनीय कैसे कहा जायेगा— यही तो बेतुकी बात कह रहे हो ? यह युक्ति से नहीं सिद्ध हो रहा है । ऐसा यदि कहो तब ज्ञान को छिपानेवाली जो अविद्या है—वही यह है । इसमें युक्ति और अनुपपत्ति क्या कहते हो जो वस्तु भासित हो रही है, इसके लिए युक्ति और अनुपपत्ति क्या दिखाई जाय । वह सद्रूप है जो ब्रह्म से अभिन्न है और अविकल्प के लिए क्या युक्ति और अनुपपत्ति हो सकती है । विकल्प के बल से यह भेद होता है, यदि यह भी कहो तो, यह विकल्प फिर किसका व्यापार है ? यदि ब्रह्म को मानते हो, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अन्य (जीवादि) संभव नहीं है और कोई अन्य जीव भी तो यहाँ पर नहीं है । अविकल्प सत्य होता है एवं विकल्प असत्य होता है । अविशेषरूप में भासित होने से इसका विभाग ही कैसे हो सकेगा ? यदि कहो कि भासमान होता हुआ भी भेद बाधित हो जायेगा तब तो अभेद भी भेदाभास से बाधित हो जायेगा; क्योंकि विपरीत ज्ञान का उदय होना ही बाध कहलाता है, दूसरी अन्य कोई वस्तु नहीं होती और बाध भी भासित होने के कारण सत्य ही है, दूसरे कारण से नहीं है,–इसलिए भासमान होता हुआ भेद भी कैसे अविद्या का विषय होता है ? प्रकाशित होने का तिरस्कार करके आगम को प्रमाण मान कर इसको अभेद कहेंगे; यदि ऐसा मानते हो, तो आगम भी भेदात्मक होकर अवस्तु हो जायेगा । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि के विभाग भी अवस्तु हो जाने से यह कुछ नहीं है । इसलिए एक चेतन प्रमाण को मान करके भी उसकी कर्तृत्वरूपा अभिन्न आवेश में होनेवाली क्रिया नहीं बैठती है; यदि परामर्शरूप स्वातन्त्र्य होता है तो सब कुछ बैठ जायेगा । परामर्श को ही चिकीर्षारूपा इच्छा कही जाती है और उसमें अभेद तुल्य रहता है वह निर्माण है—ऐसा कहा भी गया है 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य....।' (१-५-१०) । अर्थात् अपने आप में रहनेवाले स्वामी का । इसलिए स्वात्मरूप सत्यस्वरूप विश्व का ही प्रकाश परमार्थ है, जिसका प्रकाश कभी नष्ट