ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-४, का.-२१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५९ प्रकाशाभेदेनैव सत् प्रकाशपरमार्थेनैव भेदेन प्रकाशयति महेश्वरः,—इति तदेवास्यातिदुर्घट- कारित्वलक्षणं स्वातन्त्र्यमैश्वर्यमुच्यते । आभासभिन्नयोरिति क्रियापेक्षा संबन्धसामान्ये षष्ठी, पश्चाद्वयोचितं विभज्यते । आभासेन भिन्नौ जडाजडाभासौ, जडो घटादिः कर्मरूपश्चिदाभासः कर्तृरूपः,—इति तयोः क्रिया, एकस्य क्रियमाणत्वमपरस्य कर्तृत्वं न भवेत् । चिकीर्षारूपेण निर्मातव्यभाववर्गभेदपरामर्शात्मना विना, एका चासौ क्रिया कथं भिन्नयोः स्वभावभूता भवेत् । कार्यकारणताप्रस्तावात् कर्तृकर्मणो उक्ते, कारकान्तराण्यपि तु एककर्तृत्वानुप्रवेशीनि पर- मार्थतोऽन्यथा करणादौ भिन्ने कारकत्राते कथमभिन्ना सा । यदि वा आभासेन यौ भिन्नौ जडचेतनौ तयोर्या चिकीर्षा एकस्यैष्यमाणतापरापरस्यैषितृता तत्स्वभावमेकत्वपरामर्शं विना,—इति । यद्वा आभासभिन्नयोः 'अहमिदम्' इति यः परामर्श एकविश्रान्तिरूपश्चिकीर्षात्मा तं विना,— इति । आभासभिन्नयोरेकपरामर्शं विना चिकीर्षालक्षणा कथं क्रिया,—इति वा । एवं क्रियां वा चिकीर्षां वा परामर्शं वा अपेक्ष्य षष्ठी नित्यसापेक्षत्वाच्च समासः ॥ २० ॥ एतत् उपसंहरति— इत्थं तथा घटपटाद्याभासजगदात्मना । तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ॥ २१ ॥ यतो न जडस्य कारणता न कर्तृता, तथानीश्वरस्य चेतनस्यापि,—इत्यनेनैव हेतुप्रकारेणेदं नहीं होता है किन्तु प्रकाश परमार्थ से भिन्न होता हुआ भी महेश्वर से प्रकाशित रहता है, उसी को महेश्वर का अति दुर्घटकारी स्वातन्त्र्य ऐश्वर्य कहा जाता है। 'आभासभिन्नयोः' इसमें जो षष्ठी विभक्ति है वह सम्बन्ध सामान्य में चिकीर्षा की अपेक्षा करके हुई है बाद में कर्ता एवं कर्म के द्वारा विभक्त होती है । आभास से जड और अजड का भेद प्रतीत होता है । जड घटादि पदार्थ कर्मरूप है और चिदाभास कर्तारूप है । कर्म और कर्ता इन दोनों की क्रिया में एक की क्रिय- माणता रहती है दूसरे में कर्तृत्व क्यों नहीं रहेगा ? निर्माण होनेवाले भाववर्ग के भेद से परामर्श- रूपी चिकीर्षारूप के बिना, एक ही क्रिया कैसे भिन्नरूपों में भासित होकर उसका स्वभाव ग्रहण करेगी ? कार्य और कारण के प्रस्ताव से कर्म और कर्ता के विषय में कह दिया । अन्य कारक तो एक ही कर्ता में रहने के कारण परमार्थतः करणादि कारक के भेद होने पर भी कार्य-कारणता कैसे भिन्न हो सकती है। यदि आभास से भिन्न जड और चेतन है तो उनकी जो करने की इच्छा है—वह तो, अभीष्ट किसी दूसरे में एक स्वभाव के इष्ट परामर्श के बिना नहीं हो सकती अथवा भिन्न आभासों का 'अहमिदम्' जो यह परामर्श है, वह एक विश्रान्ति चिकीर्षा के बिना असंभव ही है। भिन्न आभासों का एक परामर्श के बिना चिकीर्षारूप क्रिया भी तो कैसे हो सकती है, इसी प्रकार क्रिया या चिकीर्षा अथवा परामर्श इन्हीं तीनों को अपेक्षा से षष्ठी विभक्ति होती है और नित्य सापेक्ष होने के कारण समास भी हो जाता है ॥ २० ॥ अब इसका उपसंहार किया जाता है। इस प्रकार वैसा घट-पटादि सारे विश्व के आभासरूप जगत् स्वरूप में रहने की इच्छा रखनेवाले भगवान् की इच्छा में ही हेतुता, कर्तृता और क्रिया रहती है ॥ २१ ॥ जडभाव में न तो कारणता रहती है और न कर्तृता ही रहती है। इस प्रकार असमर्थ- शाली चेतन जीव की भी कर्तृता एवं हेतुता सिद्ध होती है। इसलिए जो वैसा कर सकता है उसी