ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
२५४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१८ यदि बीजस्याङ्कुरः स्वभावस्तर्हि अङ्कुर एव न बीजं स्यात् किञ्चित् विपर्ययो वा स्यात्, — इति किं कारणं किं वा कार्यम्; अथ अन्यद्बीजमङ्कुरोऽन्यः, तर्हि न परस्परात्मकत्वं, भेदाभेदौ हि एकदैकविषयौ विरुद्धावेव ॥ १७ ॥ नन्वेवमपि बीजमङ्कुरादिविचित्रमवभातं दीर्घदीर्घपरामर्शशालिभिः स्रोतोवदविच्छिन्नस्व- रूपमेव निर्बाधं प्रत्यवमृश्यत । तथा च क्व गतं बीजम्, —इति प्रश्ने वक्तारो भवन्ति, न कुत्रचित् यदि बीज का अङ्कुर ही स्वभाव है, तब तो अङ्कुर ही मानना चाहिए फिर बीज कुछ भी नहीं हुआ—या तो फिर बीज को ही मान ला; अङ्कुर की क्या आवश्यकता है ? इसलिए न तो कोई कारण है और न कोई कार्य ही है। यदि बीज अन्य है और अङ्कुर अन्य है, तब तो परस्पर एकता ही सिद्ध नहीं होती है, भेद और अभेद ये दोनों एक काल में एक विषय में नहीं हो सकते; क्योंकि इन दोनों की आपस में विरुद्ध स्वभावता है। अन्धकार और प्रकाश के समान ॥ १७ ॥ शङ्का करते हैं कि एक ही वस्तु क्रम की विचित्रता से भिन्न-भिन्न हो जाती है। वह बीज-अङ्कुरादि की विचित्रता से अवभासित होकर दीर्घ-दीर्घ परामर्शों से शोभनेवाली धारा के समान अविच्छिन्नरूप से निर्बाध परामृष्ट हुआ करती है। तो फिर बीज कहाँ चला गया, ऐसा कारणपूर्वक ही कार्य की उत्पत्ति देखी गयी है, कार्य का सम्बन्ध जिस कारण के साथ रहता है उसी से कार्य होता है। ‘शक्तस्य शक्यकरणात्’अर्थात् जो कारण जिस कार्य के उत्पादन करने में समर्थ होता है वही शक्य कहलाता है जैसे घटात्मक कार्य के उत्पादन में शक्त मिट्टीरूप कारण ही अपने घटात्मक शक्य कार्य का कारण होता देखा जाता है। सर्वथा यदि उसे असत् मानते हो तो कारण निरूपित-शक्ति कार्य में कैसे रहेगी, इसलिए भी उत्पत्ति के पूर्व कार्य सत् था । ‘कारण भावाच्च’ अर्थात् घटरूप कार्य के साथ मिट्टीरूप कारण का तादात्म्य रहता है, इसलिए कार्य-कारणभाव की अभिन्नता रहने से कार्य उत्पत्ति के पूर्व में सद्रूप में अवस्थित था; क्योंकि इन दोनों की परस्पर अभेदता सिद्ध ही है। जैसे कि पशु से पशु की ही उत्पत्ति देखी जाती है एवं तण्डुल से तण्डुलों की ही उत्पत्ति होती है; इसलिए जब आपका कारण सत् हैं तो कार्य भी स्वयं सत् हो ही जाता है एवं प्रकाश को दिखाने के लिए दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं समझी जाती, वह तो स्वयं सिद्ध ही है। असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः । असंबद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥ यदि कार्य असत् है तो सत् कारण से उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता, और असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति मानने पर व्यवस्था ही नहीं बनेगी अर्थात् तन्तुओं से पट ही होता है घट नहीं होता, क्यों ? ऐसे प्रश्नों के उत्तर में समाधान यही है कि अनर्गल बकनेवालों की बात ही न सुनी जाये । निरात्मकत्वात् सर्वेषामसतामविशिष्टता । विशेषणं च भिन्नं ते सत्त्वमभ्युपगम्यताम् ॥ यदि घट कपालात्मक नहीं है और ऐसे घट की उत्पत्ति कपालों से देखी जाती है, तो केवल घट की ही क्यों ? पट की भी उत्पत्ति होनी चाहिए, जबकि अकपालरूपता तो दोनों की समान ही है; इसलिए ऐसी आपत्ति न हो इसके लिए कार्य को कारणात्मना प्रथमतः ही विद्यमान मानना चाहिए ।
अ.-२, आ.-४, का.-१८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५५ गतमङ्कुरात्मना वर्तते, अङ्कुरीभूतमयमङ्कुरस्तत्, — इत्येवं प्रधानं महदादिधरान्तीभूतं यावद्वितती- भूतमन्तस्सर्गप्रलयपरस्परात्मतां प्राप्तम्, — इति विततग्राहिणी प्रतीतिः; भागाभिनिवेशवशात् तु कार्यकारणतापरिकल्पनं तस्यैव भावस्य विशसनप्रायम्, — इत्याशङ्क्याह— एकात्मनो विभेदश्च क्रिया कालक्रमानुगा । तथा स्यात्कर्तृतैवैवं तथापरिणमत्तया ॥ १८ ॥ इह दीर्घदर्शिना प्रत्यक्षानुमानागमान्यतमप्रमाणमूलां प्रत्यभिज्ञामाश्रित्य तदेवेदं सुख- दुःखमोहसाम्यमनन्तप्रकारवैषम्यावलम्बनेन विश्वीभूतम्, — इति समर्थ्यते । तत्र प्रत्यभिज्ञानबलेन यदेकात्मकमेकस्वभावं तस्य यो भेदोऽन्यान्यरूपता इयमेव सा क्रियोच्यते, यतः काललक्षणेन क्रमेणानुगता, ते हि अन्यान्यस्वभावा युगपत् न भान्ति, पूर्वापरीभूतरूपतैव च क्रियोच्यते; यत एवं क्रिया 'तथा' इति तेन प्रकारेण प्रधानादेः क्रियाविशेषलक्षणेन कर्तृतैव स्यात्, न तु शुष्कं कारणतामात्रं, यतो हेतोः 'तथा' इति तेन तेन महदादिप्रकारेण सततमेव क्रमिकां तथाभासन- रूपां परिणामलक्षणां क्रियामाविशतः परिणमत्ता किंचिद्रूपं परिवर्ज्य त्यक्त्वा व्यावर्य्यमनुवर्त- यितव्यं च व्यवस्थाप्य निवर्त्यमानतृतीयरूपप्रह्वता प्रधानादेस्तया हेतुभूतया ॥ १८ ॥ प्रश्न करने पर उत्तर न देनेवाला कहता है कि कहीं पर भी नहीं चला गया है। वह तो अङ्कुररूप में परिणित हो गया है। जब यही बीज अङ्कुरित हो जाता है तब उसको अङ्कुर शब्द से कहा जाता है। इस प्रकार एक प्रकृति जिसे प्रधान कहते हैं वह महत्तत्त्व, पञ्चतन्मात्र, पञ्चमहाभूत होता हुआ पृथ्वी तक जितने भी इस संसार में प्राणी [ सर्ग ] हैं सृष्टि-स्थिति-प्रलयरूप में रहने- वाला संसार बन जाता है। यही विस्तार ग्राहिणी प्रतीति कहलाती है, इसी में विभाग की कल्पना करने पर उसी में कार्य-कारणभाव की कल्पना होती है उसी भाव की विलीन अवस्था को ही कहा जाता है। इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं— एक पदार्थ का भिन्न-भिन्नरूप होना काल के क्रम से होनेवाली क्रिया तो है और कर्तृता भी उसी के परिणाम स्वरूप हो जाने से मानी जाती है ॥ १८ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमशास्त्र के द्वारा इन प्रमाणों में से किसी एक प्रमाण को मूल में रख कर पहचान होती है। उसके आश्रय से वही यह वस्तु है—ऐसा कह कर सुख, दुःख एवं मोहादि अनन्त प्रकार के अवलम्बन से संसार बन जाता है, इसका महर्षि कपिलमुनि ने समर्थन किया है। इसी कारण इन लोगों के दर्शन को परिणामवादी दर्शन कहा जाता है। क्रिया का निर्वचन करते हैं कि क्रिया क्या वस्तु है ? उसमें प्रत्यभिज्ञान के बल से जो एकरूप, एक स्वभाव- वाला पदार्थ भासता है उसका जो दूसरे-दूसरे रूपों में बोध होता है, वही एकप्रकार से क्रिया है; क्योंकि वह कालरूप से क्रमशः उसमें व्याप्त रहती है। वे क्रिया-पदार्थ एकरूप में परस्पर नहीं भासते हैं और पूर्वापरीभाव ही तो क्रिया है; जबकि ऐसी क्रिया है तभी तो, उस क्रिया का प्रधान आदि में भी क्रिया के विशेष लक्षण से कर्तृता हो सकती है। केवल शुष्क कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि जिस प्रधान आदि हेतु के द्वारा उन-उन महदादि परिणाम के प्रकार से निरन्तर क्रमरूप से भासित होना, परिणामरूप क्रिया में प्रवेश कर परिणत होना, अपने पूर्वरूप को छोड़कर आगे आनेवाले परिणामरूप को रख कर होनेवाले तृतीयरूप में मिल जाना ही प्रधानादि की हेतुता है ॥ १८ ॥
२५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१९ ननु प्रधानं परिणामक्रियायां कर्तृरूपमियता समर्थितम्,—इति को दोषो, न हि पुरुष- वदस्याकर्तृत्वमिष्यत ? इत्याशङ्क्याह— न च युक्तं जडस्यैवं भेदाभेदविरोधतः । आभासभेदादेकत्र चिदात्मनि तु युज्यते ॥ १९ ॥ एवमित्यभिन्नरूपस्य धर्मिणः सततप्रवहद्बहुतरधर्मभेदसंभेदस्वातन्त्र्यलक्षणं परिणमनक्रिया- कर्तृत्वं यदुक्तं तत् प्रधानादेर्न युक्तं जडत्वात्, जडो हि नाम परिनिष्ठितस्वभावः प्रमेयपदपतितः स च रूपभेदाद्भिन्नो व्यवस्थापनीयो नीलपीतादिवत्, एकस्वभावत्त्वाच्चाभिन्नो नीलवत्, न तु स एव स्वभावो भिन्नश्चाभिन्नश्च भवितुमर्हति विधिनिषेधयोरेकत्रैकदा विरोधात् । कश्चित् स्वभावो भिन्नः कश्चित् त्वभिन्नः,—इति चेत्, द्वौ तर्हि इमौ स्वभावावेकस्य स्वभावस्य भवेताम्, न चैवं युक्तं—'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना सर्ववस्तुषु ।' इति न्यायात् एवं जडस्य 'इदम्' इति परिनिष्ठिताभासतया सर्वतः परिच्छिन्नरूपत्वेन प्रमेयपदपतितस्य नायं स्वभावभेद एकत्वे सत्युपपद्यते । यत्तु प्रमेयदशापतितं न भवति किं तु चिद्रूपतया प्रकाशपरमार्थरूपं चिदेकस्वभावं स्वच्छं, तत्र भेदाभेदरूपतोपलभ्यते; अनुभवादेव हि स्वच्छस्यादर्शादेरखण्डितस्वस्वभावस्यैव पर्वतमत्तङ्गजादिरूपसहस्रसंभिन्नं वपुरुपपद्यते । न च रजतद्विचन्द्रादि यथा शुक्तिकैकचन्द्रस्वरूप- अच्छा तो, परिणामरूप क्रिया में प्रधान प्रकृति को कर्तारूप से समर्थन किया गया है— इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर देते हैं— इस प्रकार जडभाव का कर्तृत्व नहीं बन सकता है। भेद और अभेद की एक में सत्ता नहीं बन सकती; क्योंकि आभास का भेद होता है, किन्तु चिदात्मा में एकत्र दोनों का आभास हो सकता है ॥ १९ ॥ इस प्रकार अभिन्नरूप धर्मी का (निरन्तर) प्रवाह में बहुत प्रकार के भिन्न-भिन्न धर्म भेदवाले अपने-अपने लक्षण के परिणाम स्वरूप क्रियाओं के कर्ता आपने प्रधान-प्रकृति को बना रखा है, वह नहीं हो सकता है; क्योंकि प्रधान जड है और वह एक निश्चित परिच्छिन्न स्वभाव- वाला कहलाता है एवं अपने स्वरूप के भेद से ही भिन्न-भिन्न नील-पीतादि के समान व्यवस्थित होता है । एक स्वभाववाला होने से अपने आप में अभिन्न ही रहता है, नील के समान । वह एक स्वभाववाला भिन्न और अभिन्न ये दोनों एक बार विधि-निषेध के समान विरोधी होने से एक जगह नहीं रह सकते । किसी का स्वभाव भिन्न होता है तो किसी का अभिन्न होता है, ऐसा यदि कहो तो ये दोनों एक स्वभाव के ही हैं, यह नहीं हो सकता । 'भेदाभेदव्यवस्थैवमुच्छिन्ना सर्ववस्तुषु ।' अर्थात् सभी वस्तुओं में भेद और अभेद की व्यवस्था ही उच्छिन्न हो जायेगी इस न्याय से । इस प्रकार 'इदम्' जड का यह स्वभाव है—ऐसा निश्चित स्वरूप से, सर्वत्र परिच्छिन्न रूप में प्रमेयपदवी को प्राप्त होकर एकता में स्वभावभेद नहीं बन सकता है [ जड अनेक रूप नहीं हो सकता है। प्रमेय स्वरूप होने से नीलादि के जैसा ] जो कि प्रमेय दशा में नहीं आता, वही चेतनरूप होने से प्रमेयार्थ रूप में प्रकाशित होकर स्वच्छ चेतनस्वभावरूप में रहता है। उस दशा में भेद और अभेद ये दोनों रूपों में उपलब्ध होते हैं। जैसे— स्वच्छ दर्पण में पर्वत, हाथी आदि सहस्र प्रकार के रूप प्रतिबिम्बित होते हैं। शुक्तिका में
अ.-२, आ.-४, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५७ तिरोधानेन वर्तते, तथा दर्पणे पर्वतादि; दर्पणस्य हि तथावभासे दर्पणतैव सुतरामुन्मीलति 'निर्मलोऽयमुत्कृष्टोऽयं दर्पण' इत्यभिमानात् । न हि पर्वतो बाह्यस्तत्र संक्रामति स्वदेशत्यागप्रसङ्गा- दस्य, न चास्य पृष्ठेऽसौ भाति दर्पणानवभासप्रसङ्गात्, न च मध्ये निबिडकठिनसंप्रतिघस्वभावस्य तत्रानुप्रवेशसंभावनाभावात्, न पश्चात् तत्रादर्शनात् दूरतयैव च भासनात्, न च तन्निपतनोत्फलित- प्रत्यावृत्ताश्चाक्षुषा मयूखाः पर्वतमेव गृह्णन्ति, बिम्बप्रतिबिम्बयोरुभयोरपि पर्वतपार्श्वगतदर्पणाव- भासेऽवलोकनात् । तस्मात् निर्मलतामाहात्म्यमेतत् यदनन्तावभाससंभेदश्चैकता च । गिरिशिखरो- परिवर्तनैश्चकत्रैव बोधे नगरगतपदार्थसहस्राभासः,–इति चिद्रूपस्यैव कर्तृत्वमुपपन्नम्, अभिन्नस्य भेदावेशसहिष्णुत्वेन क्रियाशक्त्यावेशसंभवात् ॥ १९ ॥ नन्वेतावता विज्ञानमेव ब्रह्मरूपमिमां विश्वरूपतावैचित्रीं परिगृह्णातु किमीश्वरतापरि- कल्पनया ? इत्याशङ्क्याह— वास्तवेऽपि चिदेकत्वे न स्यादाभासभिन्नयोः । चिकीर्षालक्षणैकत्वपरामर्शं विना क्रिया ॥ २० ॥ चिद्रूपस्यैकत्वं यदि वास्तवं भेदः पुनरयमविद्योपप्लवात्,—इत्युच्यते कस्यायमवि- द्योपप्लवः,—इति न संगच्छते । ब्रह्मणो हि विद्यैकरूपस्य कथमविद्यारूपता, न चान्यः कश्चिदस्ति रजत, एक चन्द्रमा में दो चन्द्रमा जैसे एक शुक्तिका और एक चन्द्रमा के स्वरूप को तिरोहित कर प्रतिभासित नहीं होता है । उसी प्रकार दर्पण में पर्वत, शिखर, नदी, हाथी आदि; क्योंकि दर्पण का उसी प्रकार आभास करना अपना स्वभाव ही उन्मीलित होता है । जैसा कि दर्पण के विषय में कहा गया है । 'यह निर्मल दर्पण बहुत ही उत्कृष्ट स्वच्छ है' दर्पण में पर्वत बाहर से जाकर उसमें नहीं बैठता है । ऐसा होता तो बाहर में पर्वत नहीं रहता; क्योंकि पीछे रहता तो दर्पण का ही भान नहीं रहता और न बीच में ही बैठता है । अत एव दर्पण एक पतली सी वस्तु है, उसके बीच में कोई पदार्थ कैसे रह सकेगा और न दर्पण पर पड़े हुए चाक्षुष से टकरा जाने पर लौटी हुई ज्योति पर्वत को ग्रहण करती है; क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्ब ये दोनों तो पर्वत के पास में रखनेवाले दर्पण में ही दिख पड़ते । इसीलिए दर्पण की निर्मलता का माहात्म्य यह है कि अनन्त प्रकार की परछाईं पड़ना और एक-सा मालूम होना । इसी प्रकार पर्वत के शिखर पर रहनेवाले एक ही ज्ञान से नगर में रहनेवाले हजारों पदार्थों का अवभास कर लेना, यह चेतन के बिना नहीं हो सकता । इसलिए सब चेतनरूप कर्ता के ही भेद आवेश को सहनेवाली क्रिया-शक्ति का अभिन्न आवेश ही संभव है ॥ १९ ॥ अच्छा तो, इतने प्रबन्ध से विज्ञानरूप ब्रह्म को इस विश्वरूप की विचित्र-चित्ररूपता करनेवाला मान लिया जाय तो फिर ईश्वर की कल्पना करने की क्या आवश्यकता है ? ऐसी आशङ्का कर उत्तर देते हैं— वास्तव में चेतन के एक होने पर भी भिन्न-भिन्न आभासों का चिकीर्षारूप एकमात्र परामर्श के बिना क्रिया नहीं होगी ॥ २० ॥ यदि चेतनरूप एकात्मा वस्तुतः सत्य है और भेद अविद्या के व्यापार से होता है तो यह अविद्या का उपद्रव किसका है, यह नहीं ठीक से बैठ रहा है, क्योंकि ब्रह्म तो विद्यारूप है । वह ३३
२५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२० वस्तुतो जीवादिर्यस्याविद्या भवेत् । अनिर्वाच्येयमविद्या,–इति चेत्, कस्य अनिर्वाच्या,–इति न विद्मः; स्वरूपेण च भाति, न चानिर्वाच्या,–इति किमेतत् ?; युक्त्या नोपपद्यते,–इति चेत् संवेदनतिरस्कारिणी का खलु युक्तिर्नाम अनुपपत्तिश्च भासमानस्य कान्या भविष्यति । सद्रूपमेव ब्रह्माभिन्नं चकास्त्यविकल्पेन, विकल्पबलात्तु भेदोऽयम्,–इति चेत्, कस्यायं विकल्पनव्यापारो नाम ? ब्रह्मणश्चेत् अविद्यायोगो न च अन्योऽस्ति; अविकल्पकं च सत्यं विकल्पकमसत्यम्,–इति कुतो विभागो भासमानत्वस्याविशेषात् । भासमानोऽपि भेदो बाधितः,–इति चेत्, अभेदोऽपि एवं भेदभासनेन तस्य बाधात् । विपरीतसंवेदनोदय एव हि बाधो नान्यः कश्चित् । बाधोऽपि च भासमानत्वादेव सन् नान्यतः,–इति भेदोऽपि भासमानः कथमविद्या । भासनमवधीर्य आगमैक- प्रमाणकोऽयमभेदः,–इति चेत् आगमोऽपि भेदात्मक एवावस्तुभूतः प्रमातृप्रमाणप्रमेयविभागश्च,– इति न किंचिदेतत् । तस्मात् वास्तवं चिदेकत्वमभ्युपगम्यापि तस्य कर्तृत्वलक्षणाभिन्नरूपसमा- वेशात्मिका क्रिया नोपपद्यते; परामर्शलक्षणं तु स्वातन्त्र्यं यदि भवति तदोपपद्यते सर्वम् । परामर्शो हि चिकीर्षारूपेच्छा, तस्यां च सर्वमन्तर्भूतं निर्मातव्यमभेदकल्पेनास्ते,–इत्युक्तं ‘स्वामिनश्चात्म- संस्थस्य....।’ (१।५।१०) इत्यत्र । तेन स्वात्मरूपमेव विश्वं सत्यरूपं प्रकाशात्मतापरमार्थमनुटित- अविद्यारूप में कैसे हो सकता है और कोई दूसरा जीवादि तो है नहीं, जिसको कि अविद्या लगे । यह अविद्या अनिर्वचनीयरूपा है । यदि ऐसी बात है तो यह किसके लिए अनिर्वचनीयरूपा है । यह नहीं बता सकते हैं और जो स्वरूप से भासता है, उसे अनिर्वचनीय कैसे कहा जायेगा— यही तो बेतुकी बात कह रहे हो ? यह युक्ति से नहीं सिद्ध हो रहा है । ऐसा यदि कहो तब ज्ञान को छिपानेवाली जो अविद्या है—वही यह है । इसमें युक्ति और अनुपपत्ति क्या कहते हो जो वस्तु भासित हो रही है, इसके लिए युक्ति और अनुपपत्ति क्या दिखाई जाय । वह सद्रूप है जो ब्रह्म से अभिन्न है और अविकल्प के लिए क्या युक्ति और अनुपपत्ति हो सकती है । विकल्प के बल से यह भेद होता है, यदि यह भी कहो तो, यह विकल्प फिर किसका व्यापार है ? यदि ब्रह्म को मानते हो, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अन्य (जीवादि) संभव नहीं है और कोई अन्य जीव भी तो यहाँ पर नहीं है । अविकल्प सत्य होता है एवं विकल्प असत्य होता है । अविशेषरूप में भासित होने से इसका विभाग ही कैसे हो सकेगा ? यदि कहो कि भासमान होता हुआ भी भेद बाधित हो जायेगा तब तो अभेद भी भेदाभास से बाधित हो जायेगा; क्योंकि विपरीत ज्ञान का उदय होना ही बाध कहलाता है, दूसरी अन्य कोई वस्तु नहीं होती और बाध भी भासित होने के कारण सत्य ही है, दूसरे कारण से नहीं है,–इसलिए भासमान होता हुआ भेद भी कैसे अविद्या का विषय होता है ? प्रकाशित होने का तिरस्कार करके आगम को प्रमाण मान कर इसको अभेद कहेंगे; यदि ऐसा मानते हो, तो आगम भी भेदात्मक होकर अवस्तु हो जायेगा । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि के विभाग भी अवस्तु हो जाने से यह कुछ नहीं है । इसलिए एक चेतन प्रमाण को मान करके भी उसकी कर्तृत्वरूपा अभिन्न आवेश में होनेवाली क्रिया नहीं बैठती है; यदि परामर्शरूप स्वातन्त्र्य होता है तो सब कुछ बैठ जायेगा । परामर्श को ही चिकीर्षारूपा इच्छा कही जाती है और उसमें अभेद तुल्य रहता है वह निर्माण है—ऐसा कहा भी गया है 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य....।' (१-५-१०) । अर्थात् अपने आप में रहनेवाले स्वामी का । इसलिए स्वात्मरूप सत्यस्वरूप विश्व का ही प्रकाश परमार्थ है, जिसका प्रकाश कभी नष्ट
अ.-२, आ.-४, का.-२१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५९ प्रकाशाभेदेनैव सत् प्रकाशपरमार्थेनैव भेदेन प्रकाशयति महेश्वरः,—इति तदेवास्यातिदुर्घट- कारित्वलक्षणं स्वातन्त्र्यमैश्वर्यमुच्यते । आभासभिन्नयोरिति क्रियापेक्षा संबन्धसामान्ये षष्ठी, पश्चाद्वयोचितं विभज्यते । आभासेन भिन्नौ जडाजडाभासौ, जडो घटादिः कर्मरूपश्चिदाभासः कर्तृरूपः,—इति तयोः क्रिया, एकस्य क्रियमाणत्वमपरस्य कर्तृत्वं न भवेत् । चिकीर्षारूपेण निर्मातव्यभाववर्गभेदपरामर्शात्मना विना, एका चासौ क्रिया कथं भिन्नयोः स्वभावभूता भवेत् । कार्यकारणताप्रस्तावात् कर्तृकर्मणो उक्ते, कारकान्तराण्यपि तु एककर्तृत्वानुप्रवेशीनि पर- मार्थतोऽन्यथा करणादौ भिन्ने कारकत्राते कथमभिन्ना सा । यदि वा आभासेन यौ भिन्नौ जडचेतनौ तयोर्या चिकीर्षा एकस्यैष्यमाणतापरापरस्यैषितृता तत्स्वभावमेकत्वपरामर्शं विना,—इति । यद्वा आभासभिन्नयोः 'अहमिदम्' इति यः परामर्श एकविश्रान्तिरूपश्चिकीर्षात्मा तं विना,— इति । आभासभिन्नयोरेकपरामर्शं विना चिकीर्षालक्षणा कथं क्रिया,—इति वा । एवं क्रियां वा चिकीर्षां वा परामर्शं वा अपेक्ष्य षष्ठी नित्यसापेक्षत्वाच्च समासः ॥ २० ॥ एतत् उपसंहरति— इत्थं तथा घटपटाद्याभासजगदात्मना । तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ॥ २१ ॥ यतो न जडस्य कारणता न कर्तृता, तथानीश्वरस्य चेतनस्यापि,—इत्यनेनैव हेतुप्रकारेणेदं नहीं होता है किन्तु प्रकाश परमार्थ से भिन्न होता हुआ भी महेश्वर से प्रकाशित रहता है, उसी को महेश्वर का अति दुर्घटकारी स्वातन्त्र्य ऐश्वर्य कहा जाता है। 'आभासभिन्नयोः' इसमें जो षष्ठी विभक्ति है वह सम्बन्ध सामान्य में चिकीर्षा की अपेक्षा करके हुई है बाद में कर्ता एवं कर्म के द्वारा विभक्त होती है । आभास से जड और अजड का भेद प्रतीत होता है । जड घटादि पदार्थ कर्मरूप है और चिदाभास कर्तारूप है । कर्म और कर्ता इन दोनों की क्रिया में एक की क्रिय- माणता रहती है दूसरे में कर्तृत्व क्यों नहीं रहेगा ? निर्माण होनेवाले भाववर्ग के भेद से परामर्श- रूपी चिकीर्षारूप के बिना, एक ही क्रिया कैसे भिन्नरूपों में भासित होकर उसका स्वभाव ग्रहण करेगी ? कार्य और कारण के प्रस्ताव से कर्म और कर्ता के विषय में कह दिया । अन्य कारक तो एक ही कर्ता में रहने के कारण परमार्थतः करणादि कारक के भेद होने पर भी कार्य-कारणता कैसे भिन्न हो सकती है। यदि आभास से भिन्न जड और चेतन है तो उनकी जो करने की इच्छा है—वह तो, अभीष्ट किसी दूसरे में एक स्वभाव के इष्ट परामर्श के बिना नहीं हो सकती अथवा भिन्न आभासों का 'अहमिदम्' जो यह परामर्श है, वह एक विश्रान्ति चिकीर्षा के बिना असंभव ही है। भिन्न आभासों का एक परामर्श के बिना चिकीर्षारूप क्रिया भी तो कैसे हो सकती है, इसी प्रकार क्रिया या चिकीर्षा अथवा परामर्श इन्हीं तीनों को अपेक्षा से षष्ठी विभक्ति होती है और नित्य सापेक्ष होने के कारण समास भी हो जाता है ॥ २० ॥ अब इसका उपसंहार किया जाता है। इस प्रकार वैसा घट-पटादि सारे विश्व के आभासरूप जगत् स्वरूप में रहने की इच्छा रखनेवाले भगवान् की इच्छा में ही हेतुता, कर्तृता और क्रिया रहती है ॥ २१ ॥ जडभाव में न तो कारणता रहती है और न कर्तृता ही रहती है। इस प्रकार असमर्थ- शाली चेतन जीव की भी कर्तृता एवं हेतुता सिद्ध होती है। इसलिए जो वैसा कर सकता है उसी
२६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२१ जातं,—य एव तथाचिकीर्षुस्तस्यैव सा चिकीर्षा बहिष्पर्यन्ततां प्राप्ता 'क्रिया' इत्यभिधीयते, सैव च कर्तृता तदेव हेतुत्वं नान्यत् किंचित् । तेन 'घटस्तिष्ठति' इत्ययमर्थः—घटात्मना तिष्ठासुः स्वातन्त्र्यात् स्थानमभ्युपगच्छन् न तु तद्रूपमसहमानो यो महेश्वरः प्रकाशः स तिष्ठते—इति । घटपटाद्याभासरूपं यत्किल जगत् तदात्मना यः 'तथा' इति तेन तेन तज्जगद्गतजन्मस्थित्यादि- भावविकारतद्भेदक्रियासहस्ररूपेण यः स्थातुमिच्छुः स्वतन्त्रः, तस्य या एवमिति विचित्ररूपेच्छा सैव क्रिया,—इति संबन्धः । तेन महेश्वर एव भगवान् विश्वकर्ता,—इति शिवम् ॥ २१ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणं नाम चतुर्थमाह्निकम् ॥ ४ ॥ भगवान् की इच्छा बाहर में करने तक क्रिया कही जाती है, वही कर्तृता है एवं उसे ही हेतुता कहते हैं इससे दूसरे किसी को नहीं कहते । 'घटः तिष्ठति' इसका अर्थ यह है कि घटरूप में रहने की इच्छा रखनेवाले भगवान् अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से घटरूप में जो प्रकाश है, उसी रूप में महेश्वर हो जाता है । घट-पटादि जितना भी आभासरूप जगत् दिखायी दे रहा है उन-उन रूपों से युक्त जगत् में होनेवाले जन्म-स्थिति-प्रलय आदि भाव-पदार्थों के विकार और उसके भेद हजारों क्रियारूप में रहने का इच्छुक स्वतन्त्र भगवान् है । मैं ऐसा हो जाऊं; ऐसी जो विचित्ररूप बनने की इच्छा है, वही क्रिया है, यह संबन्ध सिद्ध हुआ । इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर ही इस विश्व का एकमात्र कर्ता है ॥ २१ ॥ चतुर्थ आह्निक समाप्त इतिसर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता द्वितीयक्रियाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति द्वितीयः क्रियाधिकारः समाप्तः
अथ तृतीयः आगमाधिकारः अथ तृतीये आगमाधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् यं प्राप्य सर्वागमसिन्धुसङ्घः पूर्णत्वमभ्येति कृतार्थतां च । तं नौम्यहं शांभवतत्त्वचिन्तारत्नौघसारं परमागमब्धिम् ॥ श्रीमत्सदाशिवोदारप्रारम्भं वसुधान्तकम् । यदन्तर्भाति तत्त्वानां चक्रं तं संस्तुमः शिवम् ॥ एवमधिकारद्वयेन ज्ञानक्रियास्वरूपं वितत्य निर्णीतम्, अथेद्ं वक्तव्यं क्रिया नाम विश्वपदार्थावभासनलक्षणा,—इत्युक्तं समनन्तरमेव, के च ते विश्वे पदार्थाः,—इति । तत्राभास- रूपा एव जडचेतनलक्षणाः पदार्थास्ते च कियता रूपेण संगृह्यन्ते, नहि प्रत्यक्षं मायाप्रमातुः सर्वत्र समस्त आगमशास्त्ररूपो नदी समूह जिसको प्राप्त होकर पूर्णता और कृतार्थता का अनुभव करने लगता है उस शाम्भवतत्त्व चिन्तामणिरत्नों के सारभूत परम आगमरूप सागर महेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ । जिसके गर्भ में सदाशिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त तत्त्वों का समुदाय झलकता है, उस परमशिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार ज्ञानाधिकार और क्रियाधिकार इन दोनों के द्वारा ज्ञान का स्वरूप तथा क्रिया का स्वरूप विस्तारपूर्वक बता दिया गया । अब यह कहना होगा कि क्रिया विश्व के समस्त पदार्थ- तत्त्व को अवभासित करनेवाली होती है, इसलिए यह ‘विश्ववैचित्र्यचित्रस्य समभित्तिलोपमे’ इत्यादि (२।३।१५) में कह भी दिया गया है । वे पदार्थतत्त्व कितने और कौन-कौन से हैं, ये आभास- रूप जड-चेतनलक्षणवाले पदार्थ हैं वे किस रूप से संगृहीत किये गये हैं, माया प्रमाता देहादि अहंभाववाले होने के कारण सर्वत्र प्रत्यक्षरूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं अर्थात् प्रत्यक्ष का विषय १. यान्युक्तानि पुराण्यमूनि विविधैर्भेदैर्देहेष्वन्वितं रूपं भाति परप्रकाशनिबिडं देवः स एकः शिवः । तत्स्वातन्र्त्त्यवशात्पुनः शिवपदाद्भेदे विभाते परं यद्रूपं बहुधानुगामि तदिदं तत्त्वं विभोः शासने ॥ जिसके भीतर तृण से लेकर ब्रह्मपर्यन्त तत्त्वसमूह भासित होता है। यह सारा का सारा संसार ही परम शिव का प्रकाश है। इस प्रकार विविध भेदों से युक्त प्राणियों के अनेक शरीर कहे हुए हैं, उन सबों में जो सर्वोत्तम निबिड घनरूप पर प्रकाश भासित होता है उसी के [ परम स्वातन्त्र्य के कारण ] उस परम शिव तत्त्व से भेद दिखने पर भी उन सबों में भी जो सामान्यरूप से तत्त्व भासता है । वही परम शिव तत्त्व है यही प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का सिद्धान्त है ।
२६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-१ क्रमते, अनुमानमप्येवं, नहि यद्यदस्ति तत्र तत्र लिङ्गव्याप्त्यादिग्रहणसंभवः । आगमस्त्वपरि- च्छिन्नप्रकाशात्मकमाहेश्वरविमर्शपरमार्थः किं न पश्येत्, —इति तदनुसारेण पदार्थनिर्णयं विश्वं- प्रमेयीकरणप्रतिलब्धतद्विश्वोत्तीर्णप्रमातृपदहृदयङ्गमीकरणाभिप्रायेण निरूपयितुमाचार्य आगमा- धिकारं तृतीयमारभते । तत्र श्लोकैकादशकेन 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' इत्यादिना 'स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः' इत्यन्तेनागमसिद्धं शिवादिधरणोपान्तमेकैकाभासरूपतात्मकं दर्शनान्तरे 'सामान्यम्' इति यद्वयव- हृतं, यस्य सामानाधिकरण्ययोगादनन्तस्वलक्षणावभासनव्यूहविशेषपूर्वकंः समस्तोऽयं शरीर- भुवनादिविभवः, तं परमेश्वरागमसिद्धं युक्त्याप्यनुगतं प्रतीकस्तस्तत्त्वग्रामं दर्शयति, — इत्याह्निक- तात्पर्यम् । तत्राधिकारसंगतिं योजयन् पूर्वपक्षप्रतिक्षेपं चोपसंहरन् शिवतत्त्वस्वरूपमेव दर्शयितुमाह— नहीं है और न तो अनुमान प्रमाण से भी उसका ग्रहण हो सकता है, जो जो वस्तु है उस उसमें हेतु और व्याप्तिज्ञान संभव नहीं हो सकता है। किन्तु आगमशास्त्र तो अपरिच्छन्न प्रकाशात्मक, माहेश्वर विमर्शरूप, परमार्थ होने के कारण क्या नहीं देख लेता है ? इसलिए आगम के अनुसार पदार्थों के निर्णय करने के लिए आचार्य आगमाधिकार नामक तृतीय अधिकार प्रारम्भ करते हैं; क्योंकि सभी पदार्थों का ज्ञान हो जाने पर ही पदार्थों के ऊपर जो प्रमातृपद है उसका हृदयङ्गम होना संभव है । इस आह्निक में ग्यारह श्लोकों के द्वारा 'एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः' यहाँ से लेकर 'स्थूलसूक्ष्मत्व- भेदतः' वहाँ तक आगमशास्त्र में सिद्ध पदार्थतत्त्व जो शिव आदि से लेकर पृथिवी पर्यन्त हैं, वे सब के सब आभासरूप से ही मात्र झलकते हैं जब कि अन्य दर्शन में इसे 'सामान्यम्' ऐसा कह कर व्यवहार किया गया है; जिसका यह सारा का सारा शरीर, भुवनादि ऐश्वर्य-वैभव माना जाता है । जो कि सामानाधिकरण्य [ घट-पटादि ] रूपों में असंख्य प्रकार से विशेषता को लिए हुए स्वलक्षणसमुदाय के रूप में अवभासित होते हैं, परमेश्वर आगम से सिद्ध होता हुआ भी युक्ति के द्वारा अनुगत होता है, प्रतीकरूप से उस तत्त्वसमूह को दिखाते हैं, इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । अधिकार सङ्गति को जोड़ते हुए पूर्वपक्ष के द्वारा दिये गये आक्षेप का निराकरण और उपसंहार करते हुए शिवतत्त्व के स्वरूप को दिखाने के लिए अब कहते हैं— १. प्रकृत प्रसंग के अनुसार प्रत्यभिज्ञा के स्वरूप के विषय में विवेचन करना चाहिए, और विश्व को प्रमेयरूप में प्रकाशित करना इस स्थल में उपयोगी नहीं दिखता इसी कारण 'विश्व' ऐसा कहा जाता है; क्योंकि विश्व को प्रमेयीकरण करने में प्रमेय पद से उत्तीर्ण होकर, अन्तःकरण में पूर्णभाव प्राप्त कर लेना ही सत्य प्रमातृत्ता को हृदयङ्गम किया हुआ माना जायेगा । इस विषय में स्पन्द शास्त्र भी कह रहा है— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ किसी भी वस्तु-पदार्थ को देखने की उत्कट इच्छा का होना ही 'दिदृक्षा' कहा जाता है । इस देखनेवाली उत्कट इच्छा की दशा में अवस्थित होकर, जब साधक समस्त भाव-पदार्थों में अपने स्वरूप से व्याप्त होकर स्थित होता है तब अपने स्वभाव स्वरूप [ तत्त्व ] स्पन्द की अनुभूति कर लेता है । इस विषय में विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती है ।
अ.-३, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६३ एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा । मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥ १ ॥ एवमिति, यतः परदर्शनोक्तः कार्यकारणभावो जडरूपप्रतिष्ठो न कथंचिदुपपन्नः, किन्तु चिद्रूप एवान्तर्बहिरात्मना प्रकाशपरमार्थेनापि वपुषा तदाभासरूपेण वर्तमानः कालक्रममाक्षिपन् क्रियाभिधीयते तस्य प्रमातुरेव ज्ञानशक्तिवपुषो धर्मः; 'तत्' इति तस्मादवियुक्तं ज्ञानं क्रिया च । इस प्रकार बाह्य और आन्तरवृत्ति ही क्रमिक अवभास [ कालक्रम ] का आक्षेप करती हुई क्रिया कही गयी है । इसीलिए परस्पर अवियुक्त ज्ञान और क्रिया ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का धर्म माना जाता है ॥ १ ॥ 'एवमिति' यह जो श्लोक में दिया गया है इससे द्योतित होता है कि अन्य दर्शन में कहा गया कार्य-कारणभाव जडरूप होने के कारण किसी तरह भी उपपन्न नहीं होता, किन्तु भीतर और बाहर में चिद्रूप ही सर्वत्र व्याप्त है, परमार्थ प्रकाश उस धर्मिरूप आभास से विद्यमान रहता है जो क्रमिक अवभास कालक्रम का आक्षेप करता हुआ क्रियारूप बन जाता है अर्थात् उसीको क्रिया कहा जाता है उस ज्ञान-शक्तिवपु प्रमाता का ही धर्म है, 'तत्' शब्द जो श्लोक में दिया है यह बताता है कि इसलिए ज्ञान और क्रिया ये दोनों परस्पर एक दूसरे अविभक्त मिले हुए रहते हैं । १. परम शिव ही दूसरों को प्रकाशित करनेवाले होते हैं उनकी उन्मुखरूपता इच्छा ही क्रिया शुद्ध विद्या विमर्शमयी है जब वे शिव ज्ञान मात्र से, बिना किसी अन्तर किये भी विश्व का अपने आप में ही अपने से निर्माण कर सर्जन करते हैं तब अन्तर भाव के उद्रेक से ज्ञान-शक्तिरूप सदाशिव में अवस्थित हो जाते हैं, किन्तु जब बाहर में सृष्टि की रचना की प्रधानता से सर्जन करते हैं तब बहिर्भाव के उद्रेक से क्रिया-शक्तिरूप ईश्वर में क्रिया-शक्तिरूप से अवस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार विवेचन किया भी गया है— उत्तरोत्तरमवग्रहग्रहैः पश्यतोऽप्यधरमुत्तरस्य यः । साधनस्य निजभावनामहो हेतुरत्र भवतो मरीचयः ॥ जो उत्तरोत्तर पृथक्ता को द्योतन करनेवाली अवग्रह-शक्ति के द्वारा ऊपर नीचे देखनेवाले साधक की अपनी भावना से ग्रहण करने पर आपकी रश्मियों का ही इसमें कारण दिखता है । इस प्रकार आगम शास्त्र में भी इस पर उल्लेख किया गया है— तस्मिन्नैश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुमता सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ परमेश्वर उसी ईश्वर तत्त्व में अवस्थित रहते हैं । शिव की इच्छा-शक्ति से ही अनुमत होकर वे सभी जगत् के उत्पादक बनते हैं । २. ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध अवियुक्त रहता है; क्योंकि वह आन्तर तत्त्व का प्रकाश करनेवाली होने से ज्ञान-शक्ति कहलाती है और बाह्यरूप से पदार्थों का क्रमशः विस्तार करती है इसलिए क्रिया-शक्ति है इस विषय में आगम शास्त्र का भी प्रमाण है—
२६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ ज्ञानं विमर्शानुप्राणितं, विमर्श एव च क्रियेति । न च ज्ञानशक्तिविहीनस्य क्रियायोगः,—इति तदेतदवियुक्तज्ञानक्रियारूपं, क्रियाद्वारेण सकलतत्त्वराशीगतसृष्टिसंहारशतप्रतिबिम्बनसहिष्णु यत् तदुपदेशभावनादिषु तथाभासमानमनाभासरूपमपि वस्तुतः, शिवतत्त्वम्,--इत्युक्तं भवति ॥ १ ॥ नन्वेवंभूतं शिवतत्त्वं चेत् तर्हि ततोऽनतिरिच्यमानमिदं विश्वम्,—इति किमन्यत् तत्त्वं स्यात् । एकवित्तत्त्वविश्रान्तौ च तत्त्वानां कथं क्रमो भवेत्, देशकालाभेदात् ? एवमेवैतत्— किन्त्वान्तरदशोद्रेकात्सादाख्यं तत्त्वमादितः । बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥ २ ॥ यद्यप्येकमेव शिवतत्त्वं तथापि तदीयमेव स्वातन्त्र्यं स्वात्मनि स्वरूपभेदं तावत्प्रतिबिम्ब- कल्पतया दर्शयति । स्वरूपवैचित्र्यमयो हि असौ; ततश्चान्तरी ज्ञानरूपा या दशा तस्या उद्रेका- ज्ञान तो विमर्श से अनुप्राणित अर्थात् जीवित है और विमर्श ही क्रिया है । इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान-शक्ति से रहित क्रियायोग नहीं बन सकता है, ज्ञान और क्रियारूप का अवियुक्तरूप से बना रहना ही सभी पदार्थों का पारमार्थिकवपु कहा जाता है, जो क्रिया द्वारा सम्पूर्ण तत्त्वराशि से होनेवाले सृष्टि-संहार सैकड़ों प्रतिबिम्ब का सहिष्णु है वही उपदेश भावनादि में तथा भासमान- रूप भी वस्तुतः शिव तत्त्व ही है—ऐसा कहा है ॥ १ ॥ 'ननु' कह कर शङ्का की जाती है कि यदि ऊपर में कहा गया है—ऐसा ही शिवतत्त्व है तब तो यह सारा का सारा विश्व शिवतत्त्व से भिन्न ही नहीं हुआ, अपितु अभिन्नरूप से इस तत्त्व में रह गया, इससे भिन्न अन्य तत्त्व क्या होगा ? एक चिद्रूप तत्त्व में विश्रान्ति हो जाने पर पदार्थों का क्रम कैसे बैठेगा ? क्योंकि इसमें तो देश-काल का अभेद हो जाता है, यह तो ऐसा ही दिखायो देता है— किन्तु आन्तर अवस्था के उद्रेक होने से पूर्व अवस्था में सदाशिव तत्त्व रहता है । बाहर में पदार्थ तत्त्वों का विस्तार होने पर तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है ॥ २ ॥ यद्यपि शिवतत्त्व एक ही रहता है तथापि भिन्न-भिन्न विशेषताएँ लिये हुए, उन्हीं की स्वातन्त्र्य-शक्ति अपने आत्मस्वरूप में स्वरूपों का भेद संपादन करती हुई प्रतिबिम्ब के समान उन उन रूपों के भेदों को अभिव्यक्त करती है । जिसमें स्वरूप का वैचित्र्यभाव झलकता हो, वही देश-काल क्रम कहलाता है; क्योंकि मूर्त्ति क्रिया का वैचित्र्यभाववाला तो यह है; इसलिए भीतरी ज्ञानरूपा जो दशा है उस दशा के उद्रेक होने पर सादाख्य तत्त्व रहता है अर्थात् सदाशिव एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् । ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ॥ एवं भूतमिदं वस्तु भवत्विति यदा पुनः । जाता तदेव तत्तत्कुर्वत्यत्र क्रियोच्यते ॥ इस प्रकार यह ज्ञेय पदार्थ है, इससे भिन्न किसी रूप में नहीं भासित होता, इस प्रकार निश्चित बोध हो जाता है। जगत् का ज्ञान कराती है इसलिए ज्ञान-शक्ति कहलाती है । यह वस्तु ऐसी ही स्वरूपवाली है और जब पुनः प्रकाशित हो जाती है तब वही उस उस प्रकार से क्रिया बन जाती है ।
अ.-३, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २६५ भासने 'सादाख्यं' सदाख्यायां भवम्; यतः प्रभृति सैदिति प्रख्या, सदाख्यायाञ्च सदाशिवशब्द- रूपाया इदं वाच्यं तत्त्वम् । सृष्टिक्रमोपदेशादौ प्रथममुचितं तत्सादाख्यं तत्त्वम् । 'बहिर्भावस्य' क्रियाशक्तिमयस्य 'परत्वे' उद्रेक.भासे सति 'पारमेश्वरं' परमेश्वरशब्दवाच्यमीश्वरतत्त्वं नाम । ततश्च सादाख्यस्य पश्चादुचितावभासनम् । एतदुक्तं भवति-इह तस्य भावस्तत्त्वम्, - इति भिन्नानां वर्गाणां वर्गीकरणनिमित्तं यदेकमविभक्तं भाति तत्तत्त्वं, यथा गिरिवृक्षपुरप्रभृतीनां तत्त्व में होनेवाले भावतत्त्व को सादाख्य तत्त्व से कहा जाता है; क्योंकि इन सभी पदार्थों की सत्ता सदा प्रतिज्ञापन होती है इसी कारण वे सभी तत्त्व सदाशिव शब्द का वाच्य हो जाते हैं । इदन्ता के उन्मेष अवस्था में भी इनकी शिवरूपता सदा बनी रहती है, चाहे फिर स्फुट होकर बाहर में अभिव्यक्त हो गये हो इससे क्या होता है ? इसी कारण 'सदा' शब्द से कहा गया है । सृष्टि क्रम के उपदेशादि देने में प्रथम तत्त्व तो सदाशिव ही रहता है-ऐसा कहना युक्तियुक्त बैठता भी है । 'बहिर्भावस्य' इस वाक्य से द्योतित होता है कि 'इदम्' अंश क्रिया-शक्ति से युक्त होकर बाहर की ओर प्रस्फुट होता है; क्योंकि इसमें क्रिया-शक्ति की प्रधानता है-ऐसा अवभासन होने पर 'पारमेश्वरं' परमेश्वर शब्द का वाच्य ईश्वर तत्त्व कहलाता है अर्थात् बाहर में तत्त्व की अभिव्यक्ति होने पर ईश्वर तत्त्व प्रधान हो जाता है । इसलिए सदाशिव तत्त्व के बाद ठीक भासित होनेवाला ईश्वर तत्त्व है, यह कहा जाता है कि उसका भाव रहता है और उसका रहना ही तत्त्व माना जाता है, भिन्न-भिन्न वर्गों के वर्गीकरण में जो निमित्त है, जो कि एक ही में अवियुक्तरूप से मिला हुआ भासता है वस्तुतः उसीका नाम तत्त्व है । जैसा कि पर्वत, वृक्ष, नगर १. इदंभाव के प्रतिबोध करने की इच्छा सदाशिव तत्त्व व सादाख्य तत्त्व में रहती है । इस सदाशिव तत्त्व की अवस्था में इच्छा का प्राधान्य रहता है । इस अवस्था में 'अहम्' 'मैं हूँ' ऐसा प्रतिज्ञापन होता है इसीलिए यह सादाख्य तत्त्व कहा जाता है । सद् शब्द का अर्थ है होना तथा होने में इदंभाव की प्रतीति होती है इस अवस्था में 'अहम् इदम्' 'मैं यह हूँ' ऐसा निश्चित एक अनुभव हृदय में होता है किन्तु इदमंश अभी अस्फुट दशा में पड़ा हुआ है । 'अहम्' में इसकी प्रधानता बनी हुई है । सदाशिव में उन्मेष का अभाव है किन्तु निमेष अवस्थावाले सदाशिव तत्त्व है, इस विषय में कहा भी गया है कि 'ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः' किन्तु इदम् अंश को अपना ही अंश मानता है । प्रधानता तो अहम् की रहती है जैसे कुंभकार के मन में छोटे-बड़े आकार-प्रकारवाले अनेक प्रकार के मृत्पात्र निर्माण करते समय एक अस्फुट धुँधलो प्राथमिक अवस्था विशेष रहती है उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में भी विश्व अस्फुट अवस्था में अवस्थित रहता है । २. जिसका मतङ्ग संहिता में भी उल्लेख किया गया है- तत्त्वं यद्वस्तुरूपं स्यात्स्वधर्मप्रकटात्मकम् । तत्त्वं वस्तुपदं व्यक्तं स्फुटमाम्नायदर्शने ॥ यदच्युतं स्वकाद्वृत्तात्तत्तं चात्मवशं गतम् । ततमन्थेन नो तस्मात्तत्तत्त्वं तत्त्वसंततौ ॥ जो अपने धर्म को प्रकट करनेवाला पदार्थरूप तत्त्व है वही आम्नाय-वेद में प्रत्यक्ष स्फुटरूप से व्यक्त वस्तु तत्त्व कहलाता है । जो अपने वृत्त से च्युत नहीं होता है तथा अपने में प्रतिष्ठित भी है और किसी अन्य से प्रकाशित नहीं है, वही तत्त्वसंतति में तत्त्व कहलाता है । ३४
२६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-२ नदीसरःसागरादीनां च पृथिवीरूपत्वमब्रूपत्वं चेति । ततश्च शुद्धचैतन्यवर्गो यो मन्त्रमहेश्वराख्यः, तस्य प्रथमसृष्टावस्माकमन्तःकरणैकवेद्यमिव ध्यामलप्रायमुन्मीलितमात्रचित्रकल्पं यद्भावचक्रं, संहारे च ध्वंसोन्मुखतया तथाभूतमेव चकास्ति प्रतिबिम्बप्रायतया, तस्य चैतन्यवर्गस्य तादृशि भावराशौ तथाप्रथनं नाम यच्चिद्विशेषत्वं तत्सदाशिवतत्त्वम् । मन्त्रेश्वरादिरूपस्य तु चैतन्यराशेः स्फुटीभूतमस्मद्बहिष्करणसरणिसंप्राप्तभाववर्गप्रतिमं विश्वं प्रतिबिम्बतया भाति, तस्य तु तत् तथाप्रथनमेश्वरतत्त्वम् । यस्तु सदाशिवभट्टारक ईश्वरभट्टारकश्च ध्येयोपास्यादिरूपतया स इत्यादिकों का तथा सरिता, सरोवर, सागर आदि की पृथिवीरूपता और जलरूपता होना । इसलिए जो शुद्ध चैतन्यवर्ग मन्त्र महेश्वर है, उसकी पहले-पहल सृष्टि हम लोगों के अन्तःकरण द्वारा वेद्य के जैसी अस्फुटरूप में, चित्रकार के मन में चित्र खींचने के पूर्व रूपरेखा धुँधली-सी रहती है, उसी प्रकार सदाशिव तत्त्व में ध्यामल अर्थात् हल्की सी धुँधली रूपरेखा अव्यक्तरूप से रहती है । संहार काल में भी पदार्थों की ध्वंस उन्मुखता हो जाने से उसी प्रकार प्रायः प्रतिबिम्ब- रूप से भासते हैं उस चैतन्यवर्ग का वैसा पदार्थ राशि में भासित होनारूप जो वैशिष्ट्य है वही सदाशिव तत्त्व है । किन्तु मन्त्रेश्वररूप चैतन्यराशि का स्फुट दशा में हम लोगों की बाहरी इन्द्रियों के मार्ग से संप्राप्त जो पदार्थसमूह के सदृश जगत् है उसमें प्रतिबिम्बरूप से भासता है उसका वैसा फैलाव होना ही तो ईश्वर तत्त्व कहलाता है । किन्तु सदाशिवभट्टारक और ईश्वरभट्टारक तो ध्येय-उपास्यादिरूपता से प्रकाशित होते हैं । ब्रह्मा, विष्णु के तुल्य सदाशिव भट्टारक एवं ईश्वरभट्टारक को भिन्न भिन्न ही समझना चाहिए । इनमें नाम की समानता को लेकर भ्रमित नहीं होना होगा । [ सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक अर्थात् भट्टारक, भट्ट और भट्टार ये शब्द परस्पर एकार्थक होते हैं, भट् धातु से तन् प्रत्यय होकर भट्ट शब्द निष्पन्न हुआ है । भ्वादिगण में पठित भट् धातु का पोषण अर्थ होता है [ भट् भृतौ ] । भट्ट का अर्थ है पोषण करनेवाला स्वामी अर्थात् ईश्वर । इन शब्दों का प्रयोग प्रायः श्रेष्ठ लोगों के लिए अथवा ब्राह्मण और राजा-महाराजाओं के लिए आदर देने के रूप में आते हैं यहाँ प्रकृत प्रसङ्ग में भट्टारक शब्द अपने से जो पूज्य है उसके लिए लगाया गया है और सदाशिव सब के पूज्य एवं स्वामी भी है । कुछ लोगों का कहना १. संहार दशा में तो प्रायः जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्शित चित्र की प्रथम एक धुँधली सी रूपरेखा रहती है, अनन्तर उसका अधिक स्पष्टरूप उभरने लगता है और रंग देने पर इससे भी अधिक चित्र अभिव्यक्त होने लगता है, उसी प्रकार सदाशिव दशा में भी सारा का सारा विश्व अस्फुट दशा में अवस्थित रहता है और ईश्वररूप उन्मेष अवस्था में विकसित हो जाता है । जैसा कि सरोवर का कमल । 'अहम् इदम्' यह सदाशिव का प्रत्यवमर्श है तथा ईश्वर का प्रत्यवमर्श है 'इदम् अहम्' है । २. इस विषय में आगम भी कहता है— तस्मिन्नेवेश्वरे तत्त्वे संस्थितः परमेश्वरः । शिवेच्छानुगताः सर्वे जगतः प्रभविष्णवः ॥ उसी ईश्वर तत्त्व में बैठा हुआ परमेश्वर है । शिव की इच्छा-शक्ति से अनुगत होकर जगत् के उत्पादक, पालक इत्यादि होते हैं ।
अ.-३, आ.-१, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६७ ब्रह्मविष्णुतुल्यः पृथगेव मन्तव्यो न तु नामसारूप्याद्भ्रमितव्यम् । यदाहुरेके 'ब्रह्मविष्णुरुद्रा अपि तत्त्वमध्ये किं न गणिताः' इति ॥ २ ॥ नामधेयान्तरमप्यत्र तत्त्वद्वये दर्शयति— ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः । यस्योन्मेषादुदयो जगतः, —इत्यत्र ईश्वरतत्त्वमेवोन्मेषशब्देनोक्तम् । विश्वस्य हि स्फुटत्वं बाह्यत्वमुन्मेषणं, निमेषणं त्वस्फुटत्वापादनमन्तरूपतोद्रेचनम्, —इति निमेषः सदाशिवतत्त्वं यतो जगतः प्रलयः, —इति शुद्धोऽयं स्पन्दः परमेश्वरस्याचलस्याप्यप्ररूढरूपान्तरापत्तिलक्षणः किञ्चिच्चलनात्मकतया स्फुटैकरूपत्वात् । परमेश्वरस्य हि परमार्थत एताः शक्तयो यस्तत्त्वग्रामः, है कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को भी इन तत्त्वों के बीच में क्यों नहीं गिन लेते हो ? ॥ २ ॥ दूसरे नाम भी इन्हीं दोनों तत्त्वों में गतार्थ होते हैं— बाहर का उन्मेष ईश्वरतत्त्व है और भीतर का निमेष सदाशिवतत्त्व है । जिसके उन्मेष से इस जगत् की उत्पत्ति होती है । इस स्थल में ईश्वरतत्त्व को ही उन्मेष शब्द से कहा गया है; क्योंकि विश्व का बाहर में स्फुटरूप से व्यक्त होना ही उन्मेष माना जाता है । एवं अस्फुटरूप से अन्त.करण में सम्मिलित कर लेने का नाम ही निमेष है, निमेष ही सदा- शिव तत्त्व कहलाता है जिससे जगत् का प्रलय होता है । इस प्रकार यह शुद्ध स्पन्द है जो अचल परमेश्वर का दूसरा रूप न होना स्वरूप माना जाता है किञ्चित् चलनात्मकरूप से स्फुरित होने १. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभा सततं स्युर्जंस्यापरिपन्थिनः ॥ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण इन तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृतितत्त्व हैं इससे निकले हुए नील-सुखादि-गुण-स्पन्दों अनन्त प्रवाह सामान्य-स्पन्द पर ही आश्रित रहते हैं ऐसी परिस्थिति में वे निरन्तररूप में प्रवाहमान होते रहने पर भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी नहीं बन सकता है; क्योंकि चिति-शक्ति को हृदयंगम करनेवाले के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाता है चिद्रूप का आवरण न कोई है और न कोई हो ही सकता है । प्रतिष्ठित एवं अप्रतिष्ठितरूप से स्पन्द दो प्रकार के होते हैं । प्रतिष्ठित स्पन्द सारे विश्व वैचित्र्य का एकमात्र कारण है एवं विराट्-चेतना होने के कारण, नामरूपात्मक सारे पदार्थों के भी मूल कारण हैं । अप्रतिष्ठित स्पन्दन माया तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक अनेक भेदों से मिला हुआ रहता है यद्यपि अनेक भेद-उपभेद से युक्त होते हुए भी एकत्व में ही अवस्थित रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि विश्व का कोई भी पदार्थ, चाहे प्रस्तर खण्ड ही क्यों न हो, वस्तुतः उसका सम्बन्ध विराट् स्वरूप के प्रवाह से ही रहता है, शैवाद्वैत दर्शन में स्पन्दों की प्रवाहमानता की प्रक्रिया इस प्रकार है— तेन आहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता......। बाहर में उन्मुख होकर, सर्वप्रथम, प्राण अर्थात् सूक्ष्म प्राणना अर्थात् विश्वचेतनता के रूप में परिणत हो जाती है । संवित् प्रकाश स्वरूपवाली तो है ही परन्तु इसका विमर्शरूप भी रहता है । शास्त्रीय भाषा में इस विमर्शमय प्रकाश को आनन्द-शक्ति से कहा गया है । जैसा कि—आनन्द शक्ति सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते । संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाश परमार्थ कम् । तन्मेयमात्मनः प्रोज्झ्य विविक्तं भासते नभः ॥ ( तं० ) संवित् वेद्य-विषय को अपने से भिन्न कर गगन सदृश स्वयं अवस्थित रहती है ।
२६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-३ काचित् तु शक्तिरन्यबहुतरशक्तिक्रोडीकारं कुर्वती निकटत्वादुपास्या घटस्येव घटत्वात्मिका, काचिदन्यापेक्षिणी स्वरूपमात्रनिष्ठा दूरा घटस्येव सत्तात्मिका । एवं निमेषोन्मेषशक्ती एव सदाशिवेश्वरौ तयोस्त्वधिष्ठातृदेवते अपि तथानामे । अथ तदधिष्ठातृदेवताद्वयगतं करणं विद्यातत्त्वमाह— सामानाधिकरण्यं च सद्विद्याहमिदन्धियोः ॥ ३ ॥ प्रकाशस्य यदात्ममात्रविश्रान्तमनन्योन्मुखस्वात्मप्रकाशताविश्रान्तिलक्षणो विमर्शः सोऽ'हम्' इति उच्यते; यस्त्वन्योन्मुखः स 'इदम्' इति स च स्वप्रकाशमात्रे पुनरनन्योन्मुखरूपे विश्राम्यति परमार्थतः । तत्राद्ये विमर्शोऽपि शिवतत्त्वं, द्वितीये विद्येशता, मध्यमे तु रूपे 'अहमिदम्' इति समधृततुलापुटन्यायेन यो विमर्शः स सदाशिवनाथ ईश्वरभट्टारके च, इदंभावस्य तु ध्यामला- ध्यामलतातकृतो विशेषः । ये एते 'अहम्' इति 'इदम् इति धियौ तयोर्मायाप्रमातरि पृथगधिकरण- त्वम् 'अहम्' इति ग्राहके 'इदम्' इति च ग्राह्ये, तन्निरासेनै कस्मिन्नेवाधिकरणे यत्संगमनं संबन्ध- के कारण । परमार्थतः जितने भी तत्त्वसमूह हैं वे सब के सब परमेश्वर की ही सारी शक्तियाँ हैं । कोई शक्ति तो दूसरी अनेकों शक्तियों को अपने में सम्मिलित करके निकटवर्ती होने के कारण उपासना करने योग्य बन जाती है । जैसे घट की घटत्वात्मिका-शक्ति । कोई तो किसी अन्य की अपेक्षा रखती हुई केवल स्वरूप में ही रहनेवाली होती है जबकि अत्यन्त दूर में रहने के कारण घट की सत्तारूप शक्ति के समान होती है । इस प्रकार निमेषरूप और उन्मेषरूप ये ही दो शक्तियाँ सदाशिव और ईश्वर हैं उनकी अधिष्ठातृदेवता-शक्ति भी दो नाम रूपवाली कहलाती है । अब उसके अधिष्ठातृ देवता दोनों के कारण विद्यातत्त्व कहते हैं— 'अहम् और इदम्' इन दोनों प्रकार की बुद्धियों का सामानाधिकरण्य सद्विद्या तत्त्व में होता है ॥ ३ ॥ प्रकाश का अपने स्वरूप में केवल विश्राम लेना और किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखता हुआ अपने स्वात्मरूप मात्र में विश्रान्ति लेनेवाला स्वभाव विमर्श का है उसे 'अहम्' विमर्श से कहा जाता है; किन्तु जो किसी अन्य की अपेक्षा रखता है वह तो 'इदम्' है, परमार्थतः उसकी भी विश्रान्ति अनन्योन्मुख स्वरूपवाले स्वप्रकाश मात्र में हो जाती है । प्रथम 'अहम्' विमर्श में शिवतत्त्व रहता है, द्वितीय में विद्येश्वरता, किन्तु मध्यमरूप में तो 'अहमिदम्' 'सम- धृततुलापुटन्यायेन' विमर्श होता है, वह सदाशिव भट्टारक और ईश्वर भट्टारक इन दोनों में रहते हैं, इदम् अंश का तो कुछ ध्यामल [ धुँधला ] और अध्यामल रूपता को लिए हुए वैशिष्ट्य रहता है । जो 'अहमिदम्' ये दो तत्त्व हैं इनमें अहम् अंश एक तत्त्व है, दूसरा इदम् अंश है { इन दोनों तत्त्वों की बुद्धि माया प्रमाता में भिन्न-भिन्न अधिकरणता को रखती हुई दो भागों में -विभक्त हो जाती है, 'अहम्' अंश का ग्राहक [ प्रमाता ] में विमर्श होता है और 'इदम्' अंश का १. जब मध्यमकोटि में विश्रान्ति लेते हैं तब 'अहमिदम्' ग्राहक [ प्रमाता ] में ग्राह्य [ प्रमेय ] का प्रक्षेप होता है इसलिए ध्यामल ग्राह्य अंश का विमर्श सदाशिवनाथ में 'अहमिदम्' इस रूप से होता है, 'इदमहम्' इस का ग्राह्य [ प्रमेय ] में प्रस्फुटित होने पर 'अहम्' इस अंश के प्रक्षेप से सामानाधिकरण्य विमर्श ईश्वरभट्टारक में होता है ।
अ.-३, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २६९ स्वरूपप्रथनं तत् सती शुद्धा विद्या; अतोऽशुद्धविद्यातो माया प्रमातृगताया अन्यैव । तत्र यदा 'अहम्' इत्यस्य यदधिकरणं चिन्मात्ररूपं तत्रैवेदमंशमुल्लासयति तदा तस्यास्फुटत्वात् सदाशिवता 'अहमिदम्' इति । 'इदमहम्' इति तु इदमित्यंशे स्फुटीभूतेऽधिकरणे यदाहमंशविमर्शं निषिञ्चति तदेश्वरता, — इति विभागः ॥ ३ ॥ ननु कस्मादियं शुद्धा विद्या ? इत्याह— इदं भावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्तवलोकनात् ॥ ४ ॥ अवलोकनं प्रथनं वेदनं विद्या, यथावस्तुत्वं वस्त्वनुसारित्वं च; तस्याः शुद्धिरविपरीतता । वेद्यदशां चोपगतवतामङ्गीकृतवताम्, अत एवेदमित्येवंभूतेनोचितेन परामर्शेनोपपन्नानां परामृश्य- मानानां भावानां 'बोध' एव प्रकाशात्मा साररूपं वस्तु, प्रकाशश्चानन्योन्मुखविमर्शात्माहमिति । तदेषां यदेव पारमार्थिकं रूपं तत्रैव प्ररूढत्वात् अहमित्यस्य शुद्धवेदनरूपत्वम् ॥ ४ ॥ ग्राह्य [ प्रमेय ] में विमर्श होता है । इद दोनों तत्त्वों के द्वित्व को छोड़ देने पर एक ही अधिकरण [ स्व-स्वरूपाख्य ] में जिसका सम्बन्ध स्वरूप फैलता है—ऐसी अवस्था में विद्यातत्त्व की प्रधानता रहती है; इसलिए माया प्रमाता में रहनेवाली अशुद्ध विद्या से तो इस तत्त्व को सर्वथा भिन्न ही समझना चाहिए । शुद्धविद्या में जब 'अहम्' इस अंश का, जो अधिकरण चिन्मात्ररूप है उसीमें 'इदम्' इस अंश को उल्लसित करता है तब उसको अस्फुटता रहने के कारण सदाशिवता, 'अहमिदम्' यह विमर्श होता है । 'इदमहम्' इसरूप में तो इदन्तांश के प्रस्फुटित होने पर जब अहम् अंश के विमर्श को सींचता है तब ईश्वरता होती है, 'इदमहम्' इस अवस्था में ईश्वर तत्त्व रहता है, इन दोनों तत्त्वों का यही विभाग है ॥ ३ ॥ अब शङ्का होती है कि यह कैसे शुद्ध विद्या कही जाती है ? इस आशङ्का का समाधान करते हैं— इदन्ता परामर्श से उपपन्न वेद्यदशा को स्वीकार किये गये परामृश्यमान पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध-ज्ञान हो जाने के कारण शुद्ध विद्या कहलाती है ॥ ४ ॥ वस्तु के अनुसार अवलोकन करना, प्रथन करना और ज्ञान करना ही विद्या कहा जाता है, जैसी वस्तु है उसके अनुरूप उसे जान लेना, उससे विपरीत अर्थ में न समझना ही विद्यातत्त्व है । वेद्यभूमि को प्राप्त हुए अर्थात् अङ्गीकार किये गये, अत एव इदंभाव के समुचित प्रत्यवमर्श से उपपन्न परामृश्यमान पदार्थों का 'बोध' ज्ञान ही प्रकाश स्वरूप वस्तुतत्त्व है, वह प्रकाश ही किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला विमर्शात्मा 'अहम्' कहलाता है । जो इनका पारमार्थिकरूप है उसी में बढ़ जाने के कारण 'अहम्' इस अंश की शुद्ध संवेदनरूपता मानी जाती है ॥ ४ ॥ १. 'अहम् और इदम्' इन दोनों तत्त्वों का परामर्श अर्थात् प्रत्यवमर्श शुद्धविद्या में एक समानरूप से होता है । यथा 'समधृततुलापुटन्यायेन' जैसे तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहते हैं । इस में क्रिया-शक्ति की प्रधानता रहती है और इस अवस्था में अहम् एवं इदम् दोनों का विमर्श इस तरह समानरूप से अभि- व्यक्त होता है कि यद्यपि इस समय में भी अहम् और इदम् दोनों एक समान हैं फिर भी दोनों की
२७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-५ अधिष्ठातृरूपाद्देवताद्वयात् तत्त्वद्वयं विभक्तम्,—इत्येतद्भङ्ग्या प्रतिपादयत्यागमव्यव- हारेण— अत्रापरत्वं भावानामनात्मत्वेन भासनात् । परताहन्तयाच्छादात्परापरदशा हि सा ॥ ५ ॥ परत्वं पूर्णत्वमनन्यापेक्षाहमिति, ‘अपरत्वम्’ अपूर्णतान्यापेक्षेदमिति; अत्र च तत्त्वद्वये भावानां ध्यामलाध्यामलरूपाणामुभयांशस्पर्शात् परापरत्वमिति । वेद्यभावनिष्ठा दशा तत्त्वस्वरूपा तदवभासयितृमन्त्रेश्वरादिशुद्धप्रमातृसंवेद्यवस्तुसारा । या तु तन्निष्ठसंवेदनदशा सा शुद्धा विद्या, तत्प्रमातृवर्गाधिष्ठातृत्वं श्रीसदाशिवेश्वरभट्टारकरूपता,—इति संक्षेपः ॥ ५ ॥ अधिष्ठातृरूप से दोनों देवताओं के दोनों तत्त्व विभाजित कर दिये गये, [ समान नामवाले होते हुए भी दो तत्त्वों में विभक्त रहना ही है ] अब आगम व्यवहार से प्रतिपादन करते हैं— अपरत्व पदार्थों को अनात्मकरूप से प्रकाशित करता है । परत्व अर्थात् प्रकृष्ट स्वतन्त्रदशा अहन्तारूप से आच्छादित करने के कारण परदशा और अपरदशा में भासित करता है ॥ ५ ॥ परत्व परिपूर्णभाव का नाम है, अपने आपको प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रखनेवाला अहम् परामर्श है; ‘अपरत्वम्’ परापेक्षी इदंभाव को अपरत्व कहते हैं, जिसको सदैव दूसरे की अपेक्षा रखनी पड़ती है, इसी कारण यह इदंभाव अपूर्ण रहता हुआ परापेक्षी सर्वदा बना रहता है । ये दोनों तत्त्व ध्यामल एवं अध्यामल रूपों में पदार्थों का उभय अंश स्पर्श करते हुए परत्व एवं अपरत्वरूप से रहते हैं; वेद्यभाव में रहनेवाली अवस्था यथार्थरूप से उन-उन पदार्थभावों को अवभासित करनेवाले मन्त्रेश्वर इत्यादि शुद्धप्रमाताओं के रूप में संवेद्य वस्तुसार अर्थात् अपरत्व है । किन्तु उन संवेदनरूप ज्ञानों में रहनेवाली अवस्था है वही शुद्धविद्या कहलाती है, उन-उन प्रमातृवर्ग के अधिष्ठातृदेव श्री सदाशिवभट्टारक और ईश्वर- भट्टारकरूप ही है । इसका इतना ही मात्र सार है ॥ ५ ॥ भिन्नता एक प्रकार से विशेषता को लेती हुई प्रतीत होती है । उस अवस्था में विमर्श भेदाभेदरूप से होता है । जैसा कि इदम् अंश का अहम् अंश से भेद प्रतीत होता है, तथापि अहम् अंश इदम् को अपना एक भाग मानता है । इससे अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य दिखायी देता है । शिवतत्त्व ‘अहम्’ इस अंश का प्रत्यवमर्श है; सदाशिव तत्त्व में ‘अहमिदम्’ प्रत्यवमर्श है; ईश्वरतत्त्व में ‘इदमहम्’ प्रत्यवमर्श रहता है । इन सभी में ‘अहम्’ शिवतत्त्व की प्रधानता मानी जाती है । शुद्धविद्या में दोनों तत्त्वों के प्रत्यवमर्श समानरूप से [ अहं च इदं च ] यह प्रत्यवमर्श भेददशा और अभेददशा के मध्य का है । इसी कारण इसे परदशा एव अपरदशा से भी कहते हैं । इसे शुद्धविद्या अथवा सद्विद्या के नाम से भी कहते हैं; क्योंकि ‘इदंभावोपन्नानां वेद्यभूमिपेयुषाम् । भावानां बोधसारत्वात्......’ ॥ इस अवस्था में समस्त वस्तुओं के वास्तविक सम्बन्ध का विमर्श हो जाता है और सब विमर्श भी मानसिक होता है, इसी कारण शुद्धध्वा कहा जाता है; क्योंकि इस अवस्था में परमेश्वर का स्वरूप स्वच्छ ही रहता है अर्थात् माया से धूसरित नहीं होता ।
अ.-३, आ.-१, का-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७१ एवमेकेषां मते 'अहम्' इत्याच्छादको यो भागः, तत्प्रथाप्रधाना शुद्धविद्या । अन्ये तु मन्यन्ते, —योऽसाविदंभाग आच्छादनीयस्तस्य यदवभासनं तत्प्रधाना शुद्धविद्या । अन्यथा हि स इदमंशः केन भास्यतां मायायास्तत्राभावात् भावे वा प्ररोहप्रसङ्गात्; अत एवैयं प्ररोहासहिष्णुं यत इदन्तां भासयति ततः शुद्धाभासनाच्च विद्येति । तत एवाप्ररूढमायाकल्पत्वात् महामायेयं श्रीरौरवादिगुरुभिरुपदिष्टा, तदेतदाह— भेदधीरेव भावेषु कर्तुर्बोधात्मनोऽपि या । मायाशक्त्येव सा विद्येत्यन्ये विद्येश्वरा यथा ॥ ६ ॥ मायाप्रमातरि शून्यादिरूपेऽप्यनुल्लसिते, चिन्मात्र एव प्रमातरि कर्तरि च सति चिदेक- रूपेष्वपि भावेषु यदचिद्रूपतया तदप्रकाशनलक्षणं स्वातन्त्र्यं सा शुद्धविद्या माया शक्त्या तुल्या, वेद्यभागे भेदप्रकाशनात् । न च मायैव, ग्राहकस्य चिन्मात्रभागे तावद्विपर्यासनात्, येन प्रकारेण विद्येश्वरा भगवन्तोऽनन्ताद्या वर्तन्ते । ते हि शुद्धचिन्मात्रगृहीताहंभावाः स्वतस्तु भिन्नं वेद्यं पश्यन्ति, यथा द्वैतवादिनामीश्वरः । एवं ग्राहकेऽशतश्चैतन्यरूपात् परमार्थरूपे ग्राह्यविपर्यासिनशक्तिः इस प्रकार कोई तो कहते हैं कि 'अहम्' यह जो आच्छादक भाग है, [ समस्त वेद्यपदार्थों को अपने में आत्मसात् कर लेना और दूसरों की आकांक्षा न रखने के कारण अद्वैतरूप से पूर्ण रहना ही आच्छादक 'अहम्' परामर्श है।] उसको विस्तार करनेवाली शुद्धविद्या कहलाती है । किन्तु इस विषय में दूसरे लोग भी कहते हैं—जो वह इदंभाग आच्छादनीय है उसका आभासन करना है जिसमें शुद्धविद्या का प्राधान्य माना जाता है। नहीं तो, शुद्धविद्या के बिना उस इदंभाग किससे आभासित होगा; क्योंकि मायाप्रमाता का उसमें रहना संभव नहीं है जिससे इदंभाग भासित हो सके । यदि वह रहता तो उसीका विस्तार होता इसलिए विस्तार को न सहनेवाली इदन्ता को जिससे आभासित करती है अर्थात् इदन्ता को प्रकाशित करनेवाली होने से और शुद्ध आभास से आभासित होनेवाली होने के कारण शुद्धविद्या है। इसलिए अप्ररूढ माया के सदृश होने के कारण इसको श्री रौरवादि गुरुजनों ने भी महामाया कहा है, इसको दिखाते हैं— बोधात्मा कर्ता को भेदबुद्धि हो पदार्थों में माया-शक्ति के जैसी भासती है। वही शुद्धविद्या है जैसे कुछ विद्येश्वर लोग [ विद्येश्वर-शक्ति ] शुद्धविद्या मानते हैं ॥ ६ ॥ माया प्रमाता में शून्यादिरूप प्रमाता अनुल्लसित होते हैं, चिन्मात्र ही प्रमाता के कर्ता रहने पर चिद्रूप के साथ पदार्थों की एकता भी हो जाती है जिसका अचिद्रूप से प्रकाशन नहीं होता है वही स्वातन्त्र्यरूप [ भेद प्रकाशरूप माया-शक्ति के जैसा ] शुद्धविद्या है जो कि माया- शक्ति के जैसी रहती है, इससे वेद्य अंश में भेद का प्रकाश होता है। वह माया नहीं है; क्योंकि ग्राहक [ प्रमाता ] के चिन्मात्र भाग में कुछ भी तो उलटा-पलटा नहीं कर सकती, जिस प्रकार से भगवान् विद्येश्वर अनन्तादि हैं, वे लोग शुद्ध संविद्रूप चिन्मात्र में अहंभाव को गृहीत किये हुए अपने से भिन्न वेद्य वस्तु को देखते हैं। जैसे द्वैतवादियों का ईश्वर अर्थात् द्वैत सिद्धान्त को माननेवाले अपने से सर्वथा भिन्न ही ईश्वर को मानते हैं। इस प्रकार ग्राहक [ ज्ञाता ] में चैतन्य अंश से परमार्थरूप ग्राह्य में जो विपरीत भाव का भर देनेवाली शक्ति है वही विद्येश्वरों की
२७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-७ शुद्धविद्या विद्येश्वराणाम् ॥ ६ ॥ परे प्राहुः—भगवतः परमशिवस्याप्ररूढभेदावभासनं सदाशिवेश्वरता । तत्रास्फुटत्वे इच्छाशक्तिरीश्वरस्य व्यापार्यते, स्फुटत्वे ज्ञानशक्तिः, प्ररूढे तु भेदे ग्राह्यविपर्यासैऽपि ग्राहक- चिन्मात्रतायां विद्येश्वरेषु क्रियाशक्तिः, ग्राहकग्राह्यविपर्यासद्वयप्ररूढौ तु मायाशक्तिः, सा च पशुप्रमातृषु, ग्राहकग्राह्योभयविपर्याससंस्कारे तु अविनिवृत्तेऽपि यदेतत् वस्तुपरमार्थप्रथनं तत्र विद्याशक्तिव्यापारो योगिज्ञानिप्रभृतिष्वपशुप्रमातृषु; तदेतद्दर्शयति— तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका । विद्याशक्तिः..................................... 'पशुभावे' विपर्यासैकरसत्वलक्षणे पाशनीयत्वेऽस्वतन्त्रे दृश्यद्रष्टृदर्शनभेदे सत्यपि जाते शुद्धविद्या है ॥ ६ ॥ दूसरे लोगों का कहना है कि भगवान् परम् शिव का अप्ररूढरूप से भेदपूर्वक भासित होना ही सदाशिवता और ईश्वरता मानी जाती है। उसमें अस्फुट दशा रहने पर ईश्वर की इच्छा- शक्ति व्यापार करती है तथा स्फुट होने पर ज्ञान-शक्ति व्यापार करती है, भेद की प्ररूढदशा में तो ग्राह्य [ प्रमेय ] का विपर्यास हो जाने पर भी ग्राहक [ प्रमाता ] की शुद्धचिन्मात्रता में विद्येश्वर लोगों की क्रिया-शक्ति का व्यापार रहता है, ग्राह्य और ग्राहक इन दोनों का विपर्यास प्ररूढ हो जाने पर तो माया-शक्ति व्यापार करती है और वह विशेषरूप से पशुप्रमाताओं में, ग्राह्य एवं ग्राहक इन दोनों के विपर्यास संस्कार में तो अविनिवृत्त होने पर भी, जिस वस्तु परमार्थ का फैलाव अर्थात् प्रकाश, उन पशुप्रमाताओं से व्यतिरिक्त योगिजनों में विद्या-शक्ति व्यापार करती है, इसको दिखाते हैं— उस ऐश्वर्य स्वभाववाले परम शिव का पशुरूप में प्रकाश करनेवाली विद्या-शक्ति मानी जाती हैं............। 'पशुभावे' जो श्लोक में निर्देश है इससे यह व्यक्त होता है कि जिसका विपर्यास कर देना मात्र स्वरूप है जो कि पाश बद्ध एवं अस्वतन्त्र है उसमें दृश्य, द्रष्टा के भेद दिखाने पर भी पहले १. परमेश्वर के स्वातन्त्र्य से उपजीवित होनेवाली विद्येश्वर-शक्ति शुद्धविद्या कहलाती है। इसलिए विद्येश्वर लोगों ने दीक्षा-दान अर्चनादि से ही इसकी प्राप्ति की है। जिसमें 'अहम्' और 'इदम्' अंश इन दोनों का ज्ञान भिन्न-भिन्न रहता है। यद्यपि भेद का आरम्भ यहाँ से हो होता है तथापि भेद के भीतर अभेद अवस्थित रहता है। इस तत्त्व में क्रिया की प्रधानता होती है। 'मन्त्र' इस तत्त्व का प्रमाता है। इसमें प्रत्यवमर्श 'इदं च अहं च' इस रूप से होता है। विश्व भिन्न है, किन्तु सर्वथा भिन्न नहीं है। इसी कारण इस दशा को 'शुद्धविद्या' कहते हैं। जब कि विद्येश्वर लोग साक्षात् प्रमाता हो होते हैं। इस पर कहा भी है—अधिकारं न चेत्कुर्याद्विद्येशः स्यात्तनुक्षये। यदि अधिकार न करे, तो विद्येश्वर लोग शरीर के क्षीण हो जाने पर शिवस्वरूप हो जाते हैं विद्यातत्त्व में रहने के कारण ईश्वर, सर्वज्ञ इत्यादि विद्येश्वरों को समझे जाते हैं। जैसे पार्थिव ब्रह्माण्ड के अधिपत्ति ब्रह्मा, प्राकृत में विष्णु, मायोय में रुद्र ये कोई दूसरे-दूसरे तत्त्व नहीं हैं तथा परस्पर भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं—ऐसा समझना भी नहीं चाहिए।
अ.-३, आ.-१, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३ पूर्वोक्तयुक्तिबलेन यदेतदैश्वर्यमुक्तं तस्य या प्रकाशिका परमेश्वरशक्तिः—यद्वशात् केचिदेव ता युक्तीरादृत्य तदाश्वस्तहृदयाः कृतिनो भवन्ति—सा विद्याशक्तिः । अयमेव षडर्धसारादिदृष्टोऽप्य- स्याचार्यस्य हृदयमावर्जयति पक्षः, 'अन्ये' इत्यनुक्तेः । एतदानन्तर्यौचित्येन च मायातत्त्वनिरू- पणात् । तदाह— ・・・・・・・・・・・・तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ॥ ७ ॥ मायाशक्तिः पुनरचिद्रूपे शून्यादौ प्रमातृताभिमानं प्ररूढं दधती भावानपि चिन्मयान् भेदेनाभिमानयन्ती सर्वथैव स्वरूपं तिरोधत्ते आवृणुते विमोहिनी सा । तिरोधानमत्र न विलय- रूपं मन्तव्यं, यत् कृत्यपञ्चकमध्य आगमेषु गण्यते, दीक्षितस्यापि गुरुमन्त्रादिनिन्दनप्रायमपि त्वावरणमेव ॥ ७ ॥ तिरोधानमावरणरूपं स्फुटयति— भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षिते । शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृम्भते ॥ ८ ॥ कही हुई युक्ति के बल से ऐश्वर्य कहा गया है । उसका प्रकाश करनेवाली पारमेश्वरी-शक्ति है, जिसके सामर्थ्य से कोई-कोई जन ही उन युक्तियों का आदर कर, आश्वस्त हृदय होकर कृतकृत्य [ निष्कल-प्रमाता ] हो जाते हैं—वही विद्या-शक्ति है । यही पक्ष त्रिक शास्त्र के द्वारा देखा गया है जो कि आचार्य के हृदय को अत्यधिक आकर्षित करनेवाला है जिस कारण से 'अन्ये' ऐसा कहा नहीं है । इसके अनन्तर ही मायातत्त्व का निरूपण करना उचित माना जाता है । इसके लिए कहते हैं— ・・・・・'इसी को तिरोधान करनेवाली माया-शक्ति के नाम से कहा जाता है ॥ ७ ॥ अचिद्रूप शून्यादि में प्ररूढरूप से प्रमातृता का अभिमान बढ़ाती हुई, भाव-पदार्थों को भी भेदपूर्वक चिन्मयरूप में करती हुई सब प्रकार से संवित् स्वरूप को आवृत्त कर देनेवाली माया- शक्ति समस्त-प्रपञ्चजाल को विमुग्ध कर डालती है । इसमें तिरोधान कर देने का अर्थ विलयरूप नहीं लेना होगा कि जिसमें समस्त वस्तु-पदार्थ क्षत-विक्षत हो जायें, किन्तु विशेषरूप में जिस परम चिद्रूप में लय अर्थात् अपने स्वरूप में आत्मसात् कर लेना है, जिसकी गणना आगमों में कृत्यपञ्चक के मध्य संहार शब्द से की गयी है । दीक्षा से दीक्षित हुए लोगों का भी गुरु मन्त्रादि के विषय में निन्दादि करना केवल आवरण ही माना जाता है ॥ ७ ॥ उसी आवरणरूप तिरोधान को स्पष्ट करते हैं— किन्तु एकरस चिद्रूप में भेदपूर्वक बोध होने पर अनात्मतत्त्व में अहंरूप से प्रतीति होने लगती है । शून्य, प्राण, बुद्धि अथवा शरीरादि प्रमाताओं में माया-शक्ति का उल्लास उद्गम होता है ॥ ८ ॥ ३५